20.7.17

ब्रह्माण्ड के बारे में जानकारी // Information about the Universe




हम जिस ब्रह्मांड में आवास करते हैं ,आज हम सभी को उसकी विशालता का अनुमान हैं । आज हम जानते हैं कि जिस जिस पृथ्वी पर हम आवास एवं विचरण करते हैं ,वह ब्रह्माण्ड तथा सौरमंडल का एक छोटा-सा भाग हैं । पृथ्वी सौर -परिवार का एक सदस्य हैं ,जिसका मुखिया सूर्य हैं । सूर्य पृथ्वी पर जीवो के शक्ति का एक प्रमुख स्रोत हैं । सौरमंडल का स्वामी होने के बावजूद सूर्य भी विशाल आकाशगंगा-दुग्धमेखला नाम की मंदाकिनी का एक साधारण और औसत तारा हैं । सूर्य 25 Km/S की गति से आकाशगंगा के केंद्र के चारो तरफ परिक्रमा करता हैं । आकाश-गंगा की एक परिक्रमा को पूरी करने में सूर्य को लगभग 25 करोड़ साल लगते हैं । 25 करोड़ साल की इस लम्बी आवधि को ब्रह्माण्ड-वर्ष या कॉस्मिक-इयर (Cosmic-Year) के नाम से जाना जाता हैं । पृथ्वी पर मनुष्य के सपूर्ण अस्तित्व-काल में सूर्य ने आकाश-गंगा की एक भी परिक्रमा पूरी नही की हैं । परन्तु कुछ चमकते पिंडो को ही देखकर मनुष्य की उत्कंठा शांत नही हुई । आज से सदियों पूर्व जब आज की तरह वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान उपलब्ध नही था ,फिर भी हमारे पूर्वजो ने उच्चस्तरीय वैज्ञानिक खोजें की । इनमे आर्यभट ,टालेमी ,अरस्तु,पाईथागोरस ,भास्कर इत्यादि खगोल-विज्ञानियों का नाम अग्रणी हैं । इन खगोल-वैज्ञानिको ने सूर्य,पृथ्वी,चन्द्रमा ,ग्रहों,उपग्रहों के गति का जो अध्ययन किया ,वह आज भी तथ्यपरक एवं सटीक हैं । इस आधार पर हम यह कह सकते हैं ,कि खगोलशास्त्र विज्ञान की सबसे पुरानी शाखा हैं । विज्ञान एवं तकनीकी विकास जितनी अधिक होती गयी ,उतनी ही मनुष्य की उत्सुकता बढ़ती चली गई । पहले इस शाखा को बहुत कम महत्व दिया जाता था क्योंकि ब्रह्माण्ड-विज्ञान के अध्ययन करने से न तो भौतिक लाभ होता था और न ही कोई आर्थिक मदद । लेकिन जैसाकि हम जानते हैं ,कि ब्रह्माण्ड मन्दाकिनियो का अत्यंत विराट एवं विशाल समूह हैं । यहाँ पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हैं कि इतना विराट ब्रह्माण्ड कब ? कैसे ? और किससे उत्पन्न हुआ ? ब्रह्माण्ड इतना विशाल क्यों हैं ? यह कितना विशाल हैं ? क्या यह गतिशील हैं या स्थिर ? ब्रह्माण्ड में कुल कितना द्रव्यमान हैं ? क्या इसका कुल द्रव्यमान सीमित हैं या अनंत ? ब्रह्माण्ड कब तक फैलता रहेगा ? ब्रह्माण्ड का भविष्य क्या होगा ? इसका अंत कैसे होगा ? वैगरह-वैगरह ।ब्रह्माण्ड से समन्धित उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर पाना हमेशा से ही कठिन रहा हैं ! कोई यह नही बता सकता कि ब्रह्माण्ड का पहले जन्म हुआ या फिर उसके जन्म देने वाला का ? यदि पहले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ तो उसके जन्म से पहले उसका जन्म देने वाला कहाँ से आया ? आपके समक्ष प्रस्तुत इस लेख में इन्ही मूल-प्रश्नों के उत्तर ढूढने की एक सामान्य तथा छोटी सी कोशिश की गई हैं ।
 ब्रह्माण्ड क्या हैं ?


वास्तविकता में ब्रह्माण्ड के विषय में वैज्ञानिको को भी बहुत कम जानकारी हैं । ब्रह्माण्ड के बारे में बहुत कुछ अनुमानों के आधार पर वैज्ञानिकों ने अपने मत प्रस्तुत कियें हैं । रात में आकाश की ओर देखे तो दूर-दूर तक हमे तारें ही तारें दिखाई देते हैं दरअसल यही आसमान ब्रह्माण्ड का एक छोटा -सा भाग हैं । पूरा ब्रह्माण्ड हमे दिखाई दे ही नही सकता ,इतना असीम कि हमारी नज़रे वहाँ तक पहुँच ही नही सकती । विश्व-प्रसिद्ध खगोलशास्त्री फ्रेड-होयल के अनुसार ब्रह्मांड सब-कुछ हैं । अर्थात् अंतरिक्ष,पृथ्वी तथा उसमे उपस्थित सभी खगोलीय पिण्डो,आकाशगंगा ,अणु और परमाणु,आदि को समग्र रूप से ब्रह्माण्ड कहते हैं । सब-कुछ समेट लेना ब्रह्माण्ड का एक विशेष गुणधर्म हैं । ब्रह्मांड से समन्धित अध्ययन को ब्रह्माण्ड-विज्ञान (Cosmology) कहते हैं । ब्रह्मांड इतना विशाल हैं कि इसकी हम कल्पना नही नही कर सकते ,अरबो-खरबों किलोमीटर लम्बा-चौड़ा मालूम होता हैं । ब्रह्माण्ड की दूरियाँ इतनी अधिक होती हैं ,कि उसके लिए हमे एक विशेष पैमाना निर्धारित करना पड़ा-प्रकाश बर्ष । दरअसल प्रकाश की किरणें एक सेकेंड में लगभग तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करती हैं । इस वेग से प्रकाश-किरणें एक बर्ष में जितनी दूरी तय करती हैं ,उसे एक प्रकाश-बर्ष कहते हैं । इसलिए एक प्रकाश-बर्ष 94 खरब,60 अरब,52 करोड़ ,84 लाख ,5 हजार किलोमीटर के बराबर होती हैं । सूर्य हमसे 8 मिनट और 18 प्रकाश सेकेंड दूर हैं । तारों ,ग्रहों और आकाशगंगाओं की दूरिया नापने के लिये एक और पैमाने का इस्तेमाल होता हैं ,जिसे पारसेक कहते हैं । एक पारसेक 3.26 प्रकाश-बर्षों के बराबर हैं । सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी को एस्ट्रोनोमीकल-यूनिट या खगोलीय इकाई कहते हैं ।
आधुनिक खगोलशास्त्र की शुरुवाती दो अवधारणाऍ
आधुनिक खगोलशास्त्र के विकास में जिन दो शुरुवाती ब्रह्मांडीय सिधान्तो ने योगदान दिया हैं ,उनका संक्षिप्त विवरण निम्न हैं –
पहला भूकेंद्री सिधांत(Geocentric theory ) :- सन् 140 ई ० में टालेमी ने ब्रह्माण्ड का अध्ययन किया और निष्कर्ष में उन्होंने भू-केंद्री सिधांत प्रतिपादित किया । इस सिधांत के अनुसार पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में स्थित हैं एवं सूर्य तथा अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं ।
दूसरा सूर्यकेंद्र सिधांत ( Heliocentric theory ):- सन् 1543 में पोलैंड के पादरी एवं खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस (1473-1543 ) ने सूर्यकेंद्री सिधांत का प्रतिपादन किया । इस सिधांत के अनुसार सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हैं तथा पृथ्वी सहित अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं । जोकि हमारे सौर-मंडल के लिये सत्य हैं !
जिस समय कोपरनिकस ने उपरोक्त सिधांत (सूर्य-केंद्री ) दिया था ,उस समय शायद पूरे विश्व (भारत तथा कुछ अन्य देशों को छोड़कर )में टालेमी और अरस्तु के सिधांतो का बोलबाला था । टालेमी के सिधान्तो को धार्मिक रूप से भी अपना लिया गया था । अत: धार्मिक-प्रताड़ना के डर से कोपरनिकस ने अपने इस सिधांत को उन्होंने अपने अंतिम दिनों में पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया । बाद में चर्च ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया ,तथा इन विचारों को प्रचारित तथा प्रसारित करने से मनाकर दिया गया । बाद में किसी तरह से एक रोमन प्रचारक ज्योदार्न ब्रूनो को कोपरनिकस की पुस्तक हाथ लग गयी और उसका अध्ययन किया और कोपरनिकस के सिधांत का समर्थन भी । ब्रूनो ने इस सिधांत का प्रचार पूरे रोम में कर दिया । कट्टरपंथी एवं धार्मिक रुढ़िवादियों के लिए यह असहनीय था । अंतत: ब्रूनो को रोम में जिन्दा जला दिया गया ! ”क्या-क्या सितम न सहे इन्होने सत्य की खातिर ”
आइन्स्टाइन ने अंतरिक्षीय अवधारणा को बदला बीसवी सदी तक आइन्स्टीन से पहले समय को ‘निरपेक्ष ‘ माना जाता था ! आइन्स्टाइन ने निरपेक्ष समय की अवधारणा को भी अस्वीकार कर दिया ! उनका तर्क यह था की सभी प्रेक्षको का अपना ‘अब’ होता हैं ! समय निरपेक्ष हैं जिस समय प्रेक्षक ‘अब’ कहता हैं वह सारे ब्रह्मांड के लिए लागू नही होता हैं ! एक ही ग्रह पर स्थित दो प्रेक्षक घड़ी मिलाकर या संकेत द्वारा अपनी निर्देश-पद्धति में समानता ला सकते हैं ,लेकिन यह बात उनके सापेक्ष एक गतिशील प्रेक्षक के विषय में लागू नही हो सकती !
यदि आप एक अंतरिक्ष-यात्री हैं और आप पृथ्वी की घड़ियो के मुताबिक 50 साल की अंतरिक्ष-यात्रा पर जाये और इतनी तेज़ गति से यात्रा करे कि अंतरिक्ष-यान के घड़ियो के अनुसार केवल एक महिना ही लगे तो जब आप अंतरिक्ष यात्रा से वापस लौटकर आओगे तब आप एक महीना ही ज्यादा बड़े लगेंगे । लेकिन पृथ्वी के लोग 50 साल बड़े हो जायेंगे । कल्पना कीजिये कि स्पेस-ट्रेवल पर जाते वक्त आप 30 साल के हो और आप छोटा बच्चा छोड़कर जायें तो लौटने पर सापेक्षता-सिधांत के मुताबिक आपका पुत्र (बच्चा ) आपसे उम्र में 20 साल बड़ा होगा । यह बात हमे बहुत अजीब लगता हैं क्योंकि यह सामान्य -बुद्धि के विपरीत हैं !
स्थैतिक-ब्रह्माण्ड की अवधारणा
हम देखते हैं ,कि आकाश में न तो फैलाव होता और न ही संकुचन तो हम आकाश को स्थिर आकाश कहते हैं जोकि पूरे ब्रह्माण्ड के लिए लागू हैं । क्या सचमुच में यह पूरे ब्रह्माण्ड के लिए लागू हैं ? परन्तु इसका अर्थ हैं कि ब्रह्माण्ड का आकार सीमित हैं तथा इसका कुल द्रव्यमान निश्चित एवं सीमित हैं ।इस आधार पर कोई व्यक्ति यह मानेगा कि ब्रह्माण्ड का आकार बड़ा हैं इसलिए इसका द्रव्यमान अनंत हैं । न्यूटन ने आकाश में साफ़-साफ़ अपने जगह पर स्थिर देखकर स्थिर ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की ,लेकीन तारों को अपनी जगह स्थिर रहने का कारण वे खोज नही पाए । लेकिन ठहरिये ! यदि हम ब्रह्माण्ड को स्थिर (सीमित ) मान लें ,तो ब्रह्माण्ड के सीमा का अंत कहाँ पर हैं ? इसके सीमा के अंत के पार क्या हैं ? तो ब्रह्माण्ड के परिभाषा के अनुसार ”सबकुछ समेट लेना ब्रह्माण्ड का गुणधर्म हैं ” इसके हिसाब से इसके सीमा के अंत के पार को भी हमे ब्रह्माण्ड में शामिल कर लेना चाहिए ?
इन सबके बावजूद सर्वकालीन महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन (Albert Einstein) ने स्थिर तथा सीमित ब्रह्माण्ड की परिकल्पना को नही नाकारा ! और उन्होंने इस बात पर यह तर्क दिया ,कि ब्रह्माण्ड का द्रव्यमान समयानुसार अपरिवर्तित मिनटरहता हैं । आइन्स्टीन को अपने गुरुत्व-क्षेत्र सिधांत में स्थिर ब्रह्माण्ड का कोई संकेत न मिलने के बावजूद उसके समर्थन में उन्होंने अपने ही समीकरण को संसोधित कर डाला ,उन्होंने समीकरण में ब्रह्माण्डीय-नियतांक जोड़कर उसे परिवर्तित कर दिया ताकि उनके द्वारा जोड़ा गया ब्रह्माण्डीय नियतांक आकर्षण बल के विपरीत प्रतिकर्षण का काम करके ब्रह्माण्ड को स्थिर रख सके । बाद में उन्होंने स्वयं इसे गलत माना !
प्रसारी ब्रह्माण्ड


सन् 1922 में रुसी खगोलशास्त्री और गणितज्ञ अल्कजेण्डर फ्रीडमैन ने अपने सैधांतिक खोजो के आधार पर पता लगाया कि आइन्स्टीन का स्थिर ब्रह्माण्ड की अवधारणा आस्वीकार्य हैं , परन्तु उन्होंने ब्रह्माण्ड के गतिशील होने की बात रखी और उन्होंने तर्क दिया कि ब्रह्माण्ड का स्थैतिक अवस्था में रहना नामुमकिन हैं । उन्होंने पाया कि आइन्स्टीन के समीकरणों के अनुसार ब्रह्माण्ड का द्रव्यमान बढ़ना चाहिये या घटना चाहिये पर यह समयानुसार सुनिश्चित नही रह सकता । उन्होंने पाया कि आइन्स्टीन का समीकरण स्थिर-ब्रह्माण्ड के समर्थन में कोई भी संकेत नही देता हैं । अत: फ्रीडमैन ने यह निष्कर्ष निकाला कि हमारा ब्रह्माण्ड स्थिर नही ,गतिशील हैं ।
फ्रीडमैन के खोज के लगभग 7 वर्ष बाद ,एडविन पी० हब्बल ने 1929 में ब्रह्माण्ड के विस्तारित होने के पक्ष में प्रभावी तथा रोचक सिधांत रखा । हब्बल ने ही हमे बताया कि ब्रह्माण्ड में हमारी आकाशगंगा की तरह लाखोँ अन्य आकाशगंगाएं भी हैं ! उन्होंने अपने प्रेक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला कि आकाशगंगाएं ब्रह्माण्ड में स्थिर नही हैं ,जैसे-जैसे उनकी दूरी बढ़ती जाती हैं वैसे ही उनके दूर भागने की गति तेज़ होती जाती हैं । इस तथ्य को एक ही तरह समझाया जा सकता हैं -यह मानकर कि आकाशगंगाएं बहुत बड़े वेग यहाँ तक प्रकाश तुल्य वेग के साथ हमसे दूर होती जा रही हैं ।
आकाशगंगाएं दूर होती जा रही हैं ,तथा ब्रह्माण्ड फ़ैल रहा हैं । यह डॉपलर प्रभाव द्वारा ज्ञात किया गया हैं । सभी आकाशगंगाओं के वर्ण-क्रम की रेखाएँ लाल सिरे की तरफ सरक रही हैं यानी वे पृथ्वी से दूर होती जा रही हैं ,यदि आकाशगंगाएं पृथ्वी के समीप आ रही होती हैं ,तो बैगनी-विस्थापन होता हैं । अत: आज अनेकों तथ्य यह इंगित कर रहे हैं ,कि ब्रह्माण्ड प्रकाशीय-वेग के तुल्य विस्तारमान हैं ठीक उसी प्रकार जिस तरह हम गुब्बारे को फुलाते हैं तो उसके बिंदियो के बीच दूरियों को हम बढ़ते देखते हैं । सन् 2011 में नोबेल-पुरस्कार से सम्मानित तीन खगोल-वैज्ञानिकों (साउल पर्लमुटर(Saul Perlmutter) ,एडम रीज (Adam G. Riess) और ब्रायन स्कमिड्ट( Brian P. Schmidt) ने निष्कर्ष निकाला ,कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति में त्वरण आ रहा हैं ! यानी ब्रह्माण्ड समान नही बल्कि त्वरित गति से फ़ैल रहा हैं । इसके त्वरित होने का मुख्य कारण श्याम ऊर्जा हैं ! यानी श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार को गति प्रदान कर रही हैं !
हब्बल के निष्कर्ष के अनुसार किसी आकाशगंगा का वेग निम्न सूत्र द्वारा निकाला जा सकता हैं –
आकाशगंगा का वेग = ह्ब्बल-स्थिरांक x दूरी ( V=H d )
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई ? इस प्रश्न के उत्तर स्वरूप वैज्ञानिको की अनोखी मान्यता हैं (यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का सबसे ज्यादा माना जाने वाला सिधांत हैं ) । इस सिधांत को महाविस्फोट का सिधांत या बिग-बैंग के नाम से जाना जाता हैं । इस सिद्धांत का प्रतिपादन जार्ज लेमितरे (georges lemitre) नामक एक खगोलशास्त्री ने किया था । सिधान्त के अनुसार , प्रारम्भिक रूप से एक सेंटीमीटर के आकार की एक अत्यंत ठोस और गर्म गोली थी । अचानक एक विस्फोट के कारण यह सम्पूर्ण तक विस्फोटित होती चली गई । यह हमारा ब्रह्माण्ड उसी गोली में निहित था । इस महाविस्फोट से अत्याधिक गर्मी और सघनता फैलती चली गई । कुछ वैज्ञानिक मानते है ,यह महाविस्फोट 15 अरब वर्ष पूर्व हुआ था । इसी से सारे मूलभूत कणों(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) ,उर्जा की उत्पत्ति हुई थी । यह मत भी प्रकट किया गया कि मात्र एक सेकेंड के दस लाखवे भाग में इतना बड़ा विस्फोट हुआ और अरबो किलोमीटर तक फैलता चला गया । उसके बा। द से इसका निरन्तर विस्तार होता रहा और इसका विस्तार कहाँ तक हुआ यह अनुमान लगाना सम्भव नहीं हैं ?? ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम हीलियम तथा हाइड्रोजन तत्वों का निर्माण हुआ यही कारण हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में 90 प्रतिशत हाइड्रोजन तथा 8 प्रतिशत हीलियम पाया जाता हैं शेष 2 प्रतिशत में अन्य सभी तत्व आते हैं । लेकिन हमारे पास बिग-बैंग को मानने के क्या सबूत हैं ? इसका सबसे बड़ा सबूत हैं हब्बल का नियम यानीं सभी आकाशगंगाए हमसे दूर होती जा रही हैं ,इसलिए अतीत में पूरे ब्रह्माण्ड का समस्त द्रव्य एक ही जगह पर एकत्रित रहा होगा । बिग-बैंग हमे यह नही समझता कि आकाशगंगाओं , ग्रहों तथा विशाल आकर के खगोलीय पिंडो की उत्पत्ति कैसे हुई ? खगोल-विज्ञानियों के अनुसार आकाशगंगाओं ,तारों,उल्कापिंडो इत्यादि की उत्पत्ति बिग-बैंग के लगभग एक करोड़ वर्ष बाद हुई । बिग-बैंग हमे यह भी नही समझाता कि यह महाविस्फोट आखिर क्यों हुआ ??ब्रह्माण्ड कब तक फैलता रहेगा ? उसका फैलाव उसे कहाँ तक ले जायेगा ?
वर्तमान में ब्रह्माण्ड के फैलाव तथा अंत के विषय में चार प्रमुख सम्भावनाएं व्यक्त की गई हैं ।
1) महा-विच्छेद ( The Big Rip ) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड तब तक विस्तारित होता रहेगा जब तक प्रत्येक परमाणु टूट कर इधर-उधर फ़ैल नही जायेगा । यह ब्रह्माण्ड के अंत का सबसे भयानक घटना होगी लेकिन ब्रह्मांड को इस अवस्था में देखने के लियें हम जीवित नही रहेंगे क्योंकि इस अवस्था तक पहुचने से पहले से हमारी आकाशगंगा ,ग्रह और हम नष्ट हो चुके होंगे । वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना आज से लगभग 23 अरब बाद होगी ।
2) महा-शीतलन (The Big Freeze) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड के विस्तार के कारण सभी आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर चले जायेगीं तथा उनके बीच कोई भी समंध नही रहेगा । इससे नयें तारों के निर्माण के लियें गैस उपलब्ध नही होगा ! इसका परिणाम यह होगा कि ब्रह्माण्ड में उष्मा के उत्पादन में अत्याधिक कमी आयेगी और समस्त ब्रह्माण्ड का तापमान परम-शून्य (Absolute Zero) तक पहुँच जायेगा । और महा-शीतलन के अंतर्गत हमारे ब्रह्माण्ड का अंत हो जायेगा । वैज्ञानिको के अनुसार यह ब्रह्माण्ड के अंत की सबसे अधिक सम्भावित अवस्था हैं कुछ भी हों लेकिन यह भी पूरी तरह से निश्चितता से नही कहा जा सकता कि इसी अवस्था से ब्रह्माण्ड का अंत होगा ।
3) महा- संकुचन(The Big Crunch) : इस सम्भावना के अनुसार एक निश्चित अवधि के पश्चात् इसके फैलाव का क्रम रुक जायेगा और इसके विपरीत ब्रह्माण्ड संकुचन करने लगेगा अर्थात् सिकुड़ने लगेगा और अंत में सारे पदार्थ बिग-क्रंच की स्थिति में आ जायेगा । उसके बाद एक और बिग-बैंग होगा और दूबारा ब्रह्माण्ड का जन्म होगा । क्या पता कि हमारा ब्रह्माण्ड किसी अन्य ब्रह्माण्ड के अंत के पश्चात् अस्तित्व में आया हो ?
4) महाद्रव -अवस्था(The Big Slurp) : इस सम्भावना के अनुसार ब्रह्माण्ड स्थिर अवस्था में नही हैं । और हिग्स-बोसॉन ने ब्रह्माण्ड को द्रव्यमान देने का काम किया हैं । जिससे यह सम्भावना हैं कि हमारे ब्रह्माण्ड के अंदर एक अन्य ब्रह्माण्ड का जन्म हो और नया ब्रह्माण्ड हमारे ब्रह्माण्ड को नष्ट कर देगा ।
क्या हमने उपरलिखित सभी प्रश्नो के उत्तर पा लिया है ? नहीं ! हम किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं ढ़ूंढ़ पायें है इससे यह साबित होता है कि ब्रह्माण्ड के बारे मे कोई भी सिद्धांत संपूर्ण नहीं हैं । 

कोई टिप्पणी नहीं: