19.7.17

"मयंक" के दोहे

रूपचंद शास्त्री मयंक 


भारत माता के लिए, हुए पुत्र बलिदान।
ऐसे बेटों पर सदा, माता को अभिमान।१।


दिल से जो है निकलती, वो ही करे कमाल।
बेमन से लिक्खी हुई, कविता बने बबाल।२।


राजनीति के खेल में, कुटिल चला जो चाल।
उसकी जय-जयकार है, उसका ही सब माल।३।


चलते-चलते सफर में, बन जाते संयोग।
मिलते हैं इसजगत में, सभी तरह के लोग।४।


फल-तरकारी खाइए, निखर जाएगा रंग।

तला-भुना खाकर नहीं, होता निर्मल अंग।५।




सीमित शब्दों में कहो, सीधी-सच्ची बात।

जली-कटी कहकर कभी, देना मत आघात।६।




उपादान के मर्म को, समझ लीजिए आज।
धर्म और सत्कर्म से, सुधरे देश-समाज।७।


अनाचार को देखकर, लोग हो रहे मौन।
नौका लहरों में फँसी, पार लगाये कौन।८।


करती हैं दो पंक्तियाँ, दिल पर करतीं वार।
होता दोहा छन्द है, दोधारी तलवार।९।


सदा कलम से हारती, तोप और तलवार।
सबसे तीखी विश्व में, शब्दों की है मार।१०।


जो दिल से निकलें वही, सच्चे हैं अशआर।
सच्चे शेरों से सभी, करते प्यार अपार। ११।


मानव दानव बन रहा, करता कृत्य जघन्य।
सजा मौत से कम नहीं, इनको हो अनुमन्य।१२।


जिसकी जैसी सोच है, वैसी उसकी होड़।
कोई मद्धिम चल रहा, कोइ लगाता दौड़।१३।


हास और परिहास से, मिलता है आनन्द।
लम्बे जीवन के लिए, सूत्र यही निर्द्वन्द।१४।


सोच-सोच में हो गई, अपनी उम्र तमाम।
बचा जरा सी ज़िन्दगी, कैसे होंगे काम।१५।


सावन सूखा हो रहा, नहीं बरसते नीर।
निर्धन, श्रमिक-किसान का, मन हो रहा अधीर।१६।


मिल जाता जब किसी को, उसके मन का मीत।
अंग-अंग में थिरकता, प्यारभरा संगीत।१७।
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