21.7.17

धर्म और राजनीति- लेखक भगत मुंशीराम




  वर्तमान समय में और विशेषकर भारत के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक नेतागण, इस बात की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए. यह इस लिए प्रबल समस्या बन गई है कि राजनीति के काम में सब जगह धर्मों के अनुयायी अपने-अपने धर्म को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करते हैं. ऐसा करने से उनके धर्म को बल मिलता है. और शक्ति से लोगों को विवश किया जाता है कि उनके धर्मों में अधिक से अधिक लोग आएं ताकि उस धर्म के अनुयायी अपनी इच्छा के अनुसार सरकार बना लें.
यह समस्या बहुत गम्भीर है. इसका समान बहुत जरूरी समझा जाता है. प्राचीन काल में राजा लोग अपनी राजनीति में उस वक्त के ऋषि-मुनियों से विचार-विमर्ष करते थे. इसी लिए वर्तमान समय में इस समस्या के समाधान के लिए किसी महापुरुष के साथ विचार-विमर्ष करना चाहिए जो धर्म, राजनीति के मन्तव्यों को जानता हो. यदि उन्हें जीवित महापुरुष न मिले तो बीते संतों महात्माओं के साहित्य द्वारा समस्या का समाधान करना चाहिए, जो मैं अपने भारत देश का वासी होने के कारण देशवासियों से सहानुभूति रखते हुए बता सकता हूँ कि मैंने जीवन में एक पूर्णपुरुष देखे हैं और उनकी संगत की जिनका नाम हुजूर परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज था. जो होशियारपुर शहर, पंजाब प्रान्त के रहने वाले थे. उनका साहित्य अब भी मानवता मन्दिर होशियारपुर या ''मानवता प्रचारक सभा, नई दिल्ली'' या हुजूर आनन्दराव जी महाराज, बी मैन सोसाईटी ''Be Man Society'', सिकन्दराबाद या अन्य पुराने प्रेमियों से मिल सकता है.
इनका साहित्य साधारण और यथार्थ शब्दों में लिखा हुआ है, जिससे किसी बात को ढूंढने के लिए अधिक कष्ट नहीं करना पड़ता. जो भाई इस समस्या का समाधान जानना चाहें वो उनकी निम्नलिखित पुस्तकें पढ़ें. 1. मनुष्य बनो 2. आजादी की कुंजी 3. विश्व शांति 4. विश्व धर्म 5. उन्नति मार्ग 6. बैसाखी के सत्संग, सत सनातन धर्म या मानव धर्म इत्यादि.
संभव है आप में से कोई प्रश्न करे कि आपने यह क्यों लिखा कि धर्म और राजनीति की समस्या के लिए कोई जीवित महापुरुष ढूंढा जाए, न मिले तो हुजूर परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज का साहित्य पढ़ा जाए? क्या उनका साहित्य पढ़ लेना ही काफी नहीं? उससे सब पता चल जाएगा. जब तुम्हें यकीन है कि उनका साहित्य यथार्थ है तो फिर इसके पढ़ने से यह समस्या हल हो जानी चाहिए. इसके उत्तर में मेरी प्रार्थना है कि मैंने जीवन का काफी समय उनकी संगत में गुजारा. हर रोज़ उनके वचन, दर्शन और उनके हुकुम का पालन किया करता था. इस लिए अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि उन्होंने धर्मों में नई जान डाली. वो 95 वर्ष की आयु तक जीवित रहे. अगस्त 1981 में उनका चोला छूटा. उन्होंने अपने जीवन के अनुभव के बाद धर्मों की शिक्षा को बदला. यह सब आपको उनके साहित्य से मिल जाएगा. शायद कई भाई आश्चर्य में आ जाएं कि धर्मों में नई जान कैसे डाली या नई रूह कैसे फूंकी गई. इस चीज को स्पष्ट करने के लिए यह वर्णन करना जरूरी है कि जितने भी धर्म पंथ हैं इन सब को चलाने वाले कोई न कोई ऋषि, मुनि, सन्त, अवतार, हज़रत, पीर, पैगम्बर, गुरु, सत्गुरु हुए हैं. उन्होंने अपनी शिक्षा वानियों द्वारा या साधारण तरीके से अपनी अपनी मुतवर्रिक पुस्तकें लिखीं जिसे अपने हर एक धर्म वाले पढ़ते हैं और उनके अच्छे संस्कार लेते हैं. इसके बाद सब ने मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारे बनाए ताकि उनमें बैठ कर वे अपने धर्म ग्रन्थों की बानियां पढें. इससे भी बहुत लाभ होता है जो आगे चल कर लिखा जाएगा.
मगर जब हुजूर परम दयाल जी महाराज बीते संतों, गुरुओं और पीर पैगम्बरों की बानियां सुन कर अपने सत्संगों में उनकी व्याख्या करते थे तो फरमाया करते थे कि मैं नहीं जानता कि इन बानियों के लिखने वालों का क्या भाव था. न ही मैं इन बानियों के शाब्दिक अर्थ करता हूँ. मैं तो वो कहता हूँ जो मेरे अपने अनुभव में आया. मैं सुन कर हैरान हुआ करता था. क्योंकि मेरा जन्म साधारण हिन्दू जाति में हुआ, वेद शास्त्र, उपनिषदें, गीता, रामायण, महाभारत या और ऋषियों मुनियों की बानियाँ पढ़ीं जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ. घरेलू और सामाजिक जीवन बिताने का मार्ग मिल गया. मन में लालसा उठा करती थी कि जो कुछ इन पवित्र ग्रन्थों में लिखा हुआ है, वो हालत मुझे भी मिले. मगर जब हुजूर परम दयाल जी महाराज के सत्संगों के वचन सुने तो विश्वास हो गया कि जो कुछ शास्त्रों में लिखा हुआ है यह बिल्कुल ठीक है. सिर्फ इतना अन्तर है कि वो बौद्धिक ज्ञान था. क्रियात्मक ज्ञान का पता हुजूर परम दयाल जी महाराज की संगत से लगा. इस अनुभव की बिना पर मैं यह लिखने का हक रखता हूँ कि उन्होंने धर्मों में नई जान डाली. उनको अपने गुरु महर्षि शिवव्रत लाल वर्मन जी महाराज की भी यही आज्ञा थी कि सब धर्म पंथ खत्म हो जाएंगे, चोला छोड़ने से पहले शिक्षा को बदल जाना. उनका चोला छूट जाने के बाद धर्म पुस्तकों में लिखी बानियों या उनके अपने साहित्य की व्याख्या उनकी तरह अपने अनुभव के आधार पर करने वाला कोई जीवित पुरुष ही हो सकता है. इस लिए सच्चाई को सामने रखते हुए यह निर्णय लिया कि कोई जीवित पुरुष मिले जिससे पूछा जाए कि धर्म और राजनीति क्या चीज है और इसके मिलाने में क्या हानि है, जैसे कि इस वक्त समझा जा रहा है.
अपने जीवन की दौड़ धूप के बाद और जो समझ मैंने गुरु महाराज से प्राप्त की उसके आधार पर लिखने का साहस करता हूँ कि धर्म तीन प्रकार के हैं.
1. जो धर्म हम सत्गुरु द्वारा धारण करते हैं, वो सब से अधिक महत्व का है. उसके वर्णन करने के लिए मैं आपको हुजूर परम दयाल फकीरचन्द जी महाराज के सत्गुरु महर्षि शिवव्रत लाल वर्मन जी महाराज जो उत्तर प्रदेश, जिला वाराणसी के रहने वाले थे, उनका एक शब्द आप की सेवा में रखता हूँ --
 

ऐ मुकद्‌दस सत्गुरु, नूरानी यजदानी है तू।
नूर का है देवता, रूहानी हक़्कानी है तू ।।
हादिये राहे हकीकत, रास्तों से बाखबर।
रहनुमा सच्चा है तू, रख हम को धर्म की राह पर ।।
तू उधर ले चल जिधर, राहत मिले फरहत मिले।
दूर रख उस राह से, जिस राह से कुलफत मिले ।।
पाप का टेढ़ा है रस्ता, उस से हम को दूर रख।
धर्म के रस्ते को रौशन, कर के चल पुरनूर रख ।।
हम शना ख्वां होंगे, मदहत सरा होंगे सभी।
होके ममनूने करम, इज़्ज़त करेंगे जीते जी ।।
मुकद्‌दस = पवित्र, यजदानी = कूटस्थ, हक़्कानी = शब्द सरूप, कुलफत = कष्ट, शना ख्वां घ=
प्रशंसा करने वाले, मदहत सरा = कृतज्ञ, ममनूने करम = कृतज्ञ।
इस शब्द में पवित्र विभूति सत्गुरु से प्रार्थना की गई. प्रार्थना करने से पहले या कुछ मांगने से पहले जिससे मांगा जाए, उसके गुणों का गान करना पड़ता है. इस तरह माँगने वाले को स्वाभाविक ही या मालिक की मौज से विश्वास हो जाता है कि जिस चीज़ की इच्छा मैं कर रहा हूँ, उससे मिल सकती है. इसी लिए सत्गुरु को पूजनीय लिखा है और साथ ही उसके गुण वर्णन किए हैं, कि आप प्रकाश स्वरूप हैं और कूटस्थ हैं ''जिस में तब्दीली नहीं होती, अटल हैं''. आप प्रकाश तक पहुँचाने के लिए आते हैं क्योंकि आप प्रकाश और शब्द मण्डल में वासा करते हैं. प्रकाश और शब्द में रहना ही रूहानियत है और वहाँ से सत अवस्था में सत्पुरुष बन कर आते हैं. आप हकीकत या जिस अवस्था से हम सब जीव आते हैं, उस को जानते हैं. वहाँ जाने के लिए जो रास्ता है उसको जानते हैं. आप सच्चे मार्गदर्शक हैं, गुरु हैं, इस लिए हमें धर्म की राह पर रखें या धर्म मार्ग पर हमें ले चलें. धर्म की राह पर ले जाने से हमें सुख और शांति मिलेगी. उस मार्ग से हमें दूर रखें जिस से कष्ट मिलता हो. जो रास्ता अपने प्रयत्न से तै किया जाता है, उसमें कष्ट उठाने पड़ते हैं, मगर इस राह पर सत्गुरु की दया ले जाती है. इसमें आराम और सुख मिलता है और उसी को धर्म की राह कहा गया है. क्योंकि वो धर्म सत्गुरु से धारण किया होता है इसलिए उसी के बस में होता है कि इसे कष्ट न उठाने पड़ें और आराम से इष्टपद पर पहुँच जाए. इसमें भी वही बात है कि पाप का रास्ता जिसे हम अपनी हिम्मत से तय करने की कोशिश करते हैं, उसे पाप का रास्ता कहा है और उससे दुख और कष्ट मिलते हैं. आपके बख़्शे हुए धर्म मार्ग में अपना मार्ग दर्शन कराएँ, उसको रोशन रखें (प्रकाशवान बनाए रखें), हम आपके गुणों का गान करेंगे और आपके कृतज्ञ होंगे, अहसानमन्द होंगे. यह धर्म जिस को प्राप्त हो जाता है, वो फिर जीवन भर सत्गुरु का अहसान मानता रहता है. आप की मेहरबानी (दया) पर शुक्रगुज़ार रहते हुए जीते जी आपके कृतज्ञ रहेंगे.
इस शब्द में यह दर्शाया गया है कि हर काम में कोई न कोई कारण होता है. इसमें इस मार्ग पर चलने से हमें सुख-शान्ति मिलती है. सुख और शान्ति का मिलना कारण है और धर्म की राह पर चलना या धर्म को धारण कर लेना शुभ और कल्याणकारी कर्म हैं. अगर आप ध्यान से पढ़ें तो पता चलेगा, इस शब्द में धर्म और राजनीति को एक कर दिया है. इस धर्म के धारण कर लेने से हमारा सुख और शान्ति का रास्ता रोशन हो गया और हमें अपना ज्ञान हो गया कि मैं कौन हूँ या स्वतन्त्रता, आज़ादी मिल गई. अपना राज्य हो गया या रामराज्य हो गया. अपने राज्य को चलाने के लिए जिस राजनीति का आश्रय लिया, कल्याणकारी कर्म का आश्रय लिया, अपना राज्य चलाने के लिए राजनीति है. वो क्या राजनीति है? सत्गुरु का शुक्रगुज़ार रहना, अहसान मानना जिससे हमारी स्वतन्त्रता कायम रहे और उसमें हम लीन हो जाएं और हमेशा के लिए अपने आधार जहाँ से हम आए हैं वहीं वासा पा जाएं. यही सच्ची शान्ति है, यही हकीकत है. तो इस धर्म में धर्म और राजनीति इकट्‌ठे ही काम करते हैं. आपस में मिले हुए हैं.
और सुनिये. कबीर साहिब का एक शब्द हम रोज सुनते हैं.
कोई बोले रामराम, कोई खुदाय
कोई सेवे गुसईयां, कोई अल्लाहे
आगे लिखते हैं
कारण करम करीम
किरपा धारे रहीम
रहीम या रहम करने वाला या दया करने वाला इन्सानी रूप में आया हुआ कोई बाहर का सत्गुरु ही हो सकता है. क्योंकि जब तक वो मालिक इन्सानी शक़्ल में नहीं आएगा उसमें रहम या दया पैदा करने वाली शक्ति जो सिर्फ शरीरधारी को मिलती है या शरीर की क्रिया का एक अंग है, पैदा नहीं हो सकती। 'कारण' पूर्ण शांति प्राप्त करना है.
'करम' धर्म है और करनी की क्रिया या शुभ कल्याणकारी क्रिया राजनीति है. इस लिए सब सन्तों ने धर्म और राजनीति को एक किया है, तब जाकर हमारा कल्याण हुआ और हमारी स्वतंत्रता सदा के लिए बनी रहती है. इस धर्म को प्राप्त करने के बाद सब यत्न ख़त्म हो जाते हैं. केवल सत्गुरु की दया रहती है. सब धर्म छूट जाते हैं सच्चा धर्म वही होता है जो धर्म को भी छु़ड़ा दे.
 

2. हम जिस माता-पिता के घर जन्म लेते हैं, वो किसी न किसी धर्म के होते हैं. यह धर्म बाहरी सांसारिक हैं. इनमें नाम, रूप और तरह-तरह के संस्कार जो माता-पिता या पुस्तकों के अध्ययन से, पवित्र ग्रन्थों से और पवित्र स्थानों से मिलते हैं, वो काम करते हैं. इनसे भी हमारा जीवन बनता है. जीवन के दिन आनन्द से गु़ज़ारने के लिए ये धर्म काम करते हैं. इनके कई नाम रखे गए हैं जो कि आपके सामने हैं. इन धर्मों को भी धीरे-धीरे हम अपने मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार में जगह देते हैं और संसार के काम अच्छे ढंग से करते रहते हैं. क्योंकि ये धर्म अलैहदा-अलैहदा हो गए, कई नाम रूप हो गए, इस लिए इन धर्मों के अनुयाइयों में भेदभाव आ गया. लड़ाई झगड़े होते हैं, कोई कहता है मेरा धर्म अच्छा है, कोई कहता है मेरा धर्म अच्छा है. आपस में बँट जाते हैं. इर्ष्या-द्वेष बढ़ जाता है. अपने-अपने धर्म को बड़ा बनाने के लिए देश, प्रांत, सूबों और तरह-तरह की भाषाओं का सहारा लेना पड़ता है. परिणाम यह होता है कि विश्व में नाना देश और प्रान्त बन जाते हैं. बोली के आधार पर या भाषा के आधार पर अपने धर्म की वृद्धि के लिए विश्व और राष्ट्र के टुकड़े कर देते हैं और वातावरण अशांत हो जाता है और इस वातावरण में रहने वाले सभी प्राणी अशांत हो जाते हैं. देश की स्वतंत्रता-आज़ादी को कायम रखना और देश वासियों के जीवन सुखी बनाने कठिन हो जाते हैं. ऐसा क्यों होता है?
क्योंकि उनको अभी तक विश्वास नहीं हुआ कि सभी धर्म सच्चे हैं, कोई भी बड़ा-छोटा नहीं है. सब धर्म-ग्रन्थों में जो कुछ लिखा हुआ है, हकीकत है मगर उस हकीकत को जीवित पुरुष ही बता सकता है. ये सब धर्म किसी न किसी समय के अनुसार बनाए गए, गलत नहीं हैं. इनकी बानियाँ केवल पढ़ने से समझ में नहीं आ सकतीं. हाँ इतना लाभ होता है कि लोगों को पेट पालने के लिए काम मिल जाता है. धर्म स्थानों में लोग आते-जाते रहते हैं. मगर इन बानियों को कोई सत्गुरु ही समझा सकता है, क्योंकि उसका अपना अनुभव होता है. अक़्ली ज्ञान से इन बानियों का अर्थ समझ में नहीं आ सकता. यह धर्म का दूसरा पहलू है. इस धर्म को राजनीति में नहीं मिलना चाहिए. इस समय यहाँ संकट आया हुआ है और कारण का पता नहीं लगता. नेतागण बहुत कोशिश कर रहे हैं. जो कुछ उनसे बन पड़ता है, अपनी हिम्मत के मुताबिक अपनी राजनीति को इस प्रकार के धर्मों से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं. इसी गलती के कारण भारत का पहले ही विभाजन हो चुका है. अब अपना राज्य है. राजनीतिज्ञ सोच-विचार कर चलें और देश को और टुकड़े होने से बचाएं. यह काम इस समय बहुत कठिन दिखाई पड़ रहा है, मगर घबराने की कोई जरूरत नहीं. हिम्मत से काम लेना चाहिए. सोच-विचार करते रहें. साधुसन्तों, महात्माओं से भी विचार-विमर्ष करें.
3. यह धर्म 'मानव धर्म' कहलता है. भिन्न-भिन्न धर्म के लोग दरअसल एक हैं और मानव हैं, इन्सान हैं. हुजूर परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज ने 1947 की घटनाओं से प्रभावित होकर विचार किया. कभी समय था हिन्दू मुसलमानों ने जामा मस्जिद दिल्ली में एक प्याले में पानी पिया और 1947 में देश के विभाजन के समय एक-दूसरे के सिर काटे. इसका इलाज ढूंढने के लिये उन्होंने अपनी योगविद्या का सहारा लिया. समाधि में गए और उनको अपने अन्दर से आवाज़ आई ''इन्सान बनो". इसके बाद उन्होंने 'इन्सान बनो' का काम किया. 'इन्सान' बनो मंदिर भी बनाया, जहाँ पर वो अन्त समय तक यह काम करते रहे. क्योंकि उनको यकीन हो गया कि कुदरत में इन धर्मों के झगड़ों से मानवजाति का विनाश होगा, समय की मांग है कि इन्सान 'इन्सान' बने. किसी भी धर्म को मानो. जिस धर्म में पैदा हुए, उस पर चलो. मगर सब धर्मों के लोग अपने आप को इन्सान समझें. उन्होंने मानवधर्म के प्रचार की ख़ातिर और भी कई सज्जनों को प्रेरणा दी और वो इस काम को कर रहे हैं. जिस तरह हर एक धर्म समय की परिस्थितियों के अनुसार बने, इसी तरह इस समय की परिस्थितियाँ मजबूर कर रही हैं कि लोग मानवता के झण्डे के नीचे आएं और एक प्लेट फार्म पर काम करें.
इन्सान संस्कारों का पुतला है. जिस तरह माँ-बाप, भाई-बन्धु समाज से संस्कार लेकर हम किसी न किसी धर्म के हो जाते हैं, इसी तरह अगर मानवता के संस्कार दिए जाएँ तो लोग मानवधर्म को समझ जाएंगे. मानव धर्म के नियम स्वाभाविक हैं. अपनी-अपनी भाषा में बोले जा सकते हैं, जिनमें से कुछ नियम नीचे दिए जाते हैं.
1. जियो और जीने दो.
2. किसी से ईर्ष्या-द्वेष न करो.
3. मानव, मानव की सेवा करे.
4. शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करें.
5. किसी के मन को न दुखाएँ, जिसे 'अहिंसा परमोधर्मः' भी कहते हैं.
6. शुभ विचार रखो.
इसी तरह नियम और भी जितने चाहो बना सकते हो, जिससे सब मानवजाति का कल्याण हो सके. हर एक इन्सान के लिए घरेलू, सामाजिक और देश के प्रति कुछ जिम्मेदारियाँ हैं. माँ-बाप, भाई-बहन, स्त्रीपुरुष और सम्बंधी, जाति-वर्ग और समाज व देश की जिम्मेदारियाँ निभाना भी मानवधर्म में आता है. यह भी कुदरती धर्म है.
अब हमारे देश में राजनीति के नेता चाहते हैं कि धर्म को राजनीति से अलग रखा जाए. क्या ऐसा करने से देश का कल्याण हो सकता है? जिस राजनीति में धर्म नहीं है, वह सच्चे अर्थ में शांति नहीं ला सकती. राजनीति में धर्म का होना जरूरी है और वो धर्म 'मानवधर्म' है. इसमें हिन्दू, मुसलमान, जैन, बौद्ध, ईसाई, सिख का कोई प्रश्न नहीं. मानवता के नियमों पर चल कर राष्ट्र की सेवा सच्चे अर्थ में की जा सकती है और देश के वासियों को सुखी बनाया जा सकता है. ऊपर लिखे नियम किसी खास धर्म के नहीं हैं गो सब धर्मों में इनका उल्लेख हो सकता है मगर कुदरती तौर पर यह मानवधर्म है. राजनीति में या सरकार के कामकाज में मानवधर्म के नियमों का पालन करना ही धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाना है. हमारे पिछले नेतागण धर्मनिरपेक्षता का अर्थ इसी रूप में लगाया करते थे.
अब सोचना है कि क्या हमारी सरकार, राजनीति में काम करने वाले लोग या दूसरे नाना धर्मों के अनुयायी इन नियमों पर चलते हैं. आप इस समय देखें इन्सान, इन्सान का सिर काट रहा है. हमारी प्रजातन्त्र प्रणाली में क्या हो रहा है. ये चुनाव पार्टी की बिना (आधार) पर किये जा रहे हैं. जब चुनाव होते हैं तो हर पार्टी अपना प्रापोगंडा करती है. एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं. हर पार्टी दूसरी पार्टी के दोष बताती है. पार्टियों में ईर्ष्या-द्वेष बढ़ जाता है. उनके एक-दूसरे के विरुद्ध ख्यालात ब्रह्मांड में रहते हैं. उनके ख्यालों में बड़ी भारी शक्ति है और वही एक दूसरे के विरुद्ध कहे गए ख्यालात भूमंडल में आकर लोगों के मनों पर प्रभाव डालते हैं. न्यूटन की थ्यूरी के अनुसार हाथ को हिलाओ तो उसका प्रभाव ऊपर के लोकों तक जाता है और फिर वहीं आ जाता है जहां से वो चला था. इसी तरह चुनाव के समय जो ख्यालात एक दूसरे के विरुद्ध छोड़े जाते हैं, ये हमें खा जायेंगे. हुजूर परम दयाल जी महाराज अपने साहित्य में लिख गए हैं और जब तक जीवित रहे समझाते रहे कि इस प्रकार की चुनाव प्रणाली मीठा ज़हर है. जितनी जल्दी हो सके इसको बदलना चाहिए. चुनाव के समय लोग लाऊड स्पीकर पर अपना प्रचार करते हैं. जुलूस निकालते हैं और नारे लगाते हैं. घर-घर जाते हैं. इस शोरोगुल का असर पढ़ने वाले बच्चों पर, बूढ़ों के आराम पर और साधन-अभ्यास करने वाले साधुओं पर पड़ता है. वो एकाग्र चित्त नहीं हो सकते. इसी तरह हम धर्म वाले जब त्यौहार मनाते हैं, तो बजाए अपने धर्म-स्थानों पर बैठकर अपने धर्म की बाबत लोगों को समझाएं, संकीर्णतावश जुलूस निकालते हैं, लाऊड स्पीकर और घंटे बजाते हैं. विद्यार्थियों पर और दूसरे लोगों के काम में गड़बड़ पैदा करते हैं. यह भी हिंसा है. यह राजनीति है जिसे तब्दील करना चाहिए.
 

मानवधर्म या इन्सानियत के विषय में कबीर साहिब फरमाते हैं --
अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बन्दे।
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले को मन्दे ।।
लोगा भरम न भूलो भाई।
ख़ालिक ख़लिक ख़लक में ख़ालिक पूर रहयो सब ठाई ।।
माटी एक अनेक भाँति कर साजी साजनहारे।
न कछु पोच माटी के भाँडे न कछु पोच कुम्हारे ।।
सब में सच्चा एको सोई तिस का किया सब कुछ होई।
हुकम पछाने सो ऐको जाने बन्दा कहिए सोई ।।
अल्लाह अलख न जाई लखया गुरु गुड़ दीना मीठा।
कहे कबीर मेरी संका नासी सर्व निरंजन डीठा ।।
अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बन्दे।
एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले को मन्दे ।।
सबसे पहले अल्लाह या अलख अवस्था से नूर या प्रकाश पैदा हुआ और प्रकाश से प्रकृति उत्पन्न हुई और जितने भी संसार के प्राणी हैं और इन्सान हैं सब कुदरत से बने. एक अल्लाह के बन्दे प्रकृति द्वारा उत्पन्न होकर इन्सानी शक़्ल में आ जाते हैं फिर मानव शरीर में ये कुदरती तत्त्व अलग-अलग गुण पैदा करते हैं. कोई भले, कोई मन्दे बन जाते हैं. अपने स्वभाव के मुताबिक काम करते हैं. इन्सान के अन्दर स्वाभाविक क्रिया होती रहती है. इसी का नाम मानवधर्म है. दर असल यह मानवधर्म भी इस नाम के साथ सीमित सा हो जाता है, है यह कुदरती धर्म. जब हम संस्कारों के प्रभाव से किन्हीं ख़ास हरकतों के साथ बंध जाते हैं, उस वक़्त जो हरकतें हम करते हैं वो कुदरती नहीं होतीं. वो बन्धन के वश में होती हैं. इस दुनिया के सभी धर्म संस्कारों के वश बँधे हुए हैं. एक आदमी अपना जीवन गुज़ारने के लिए स्वाभाविक ही कई बातें करता है. कुदरती तौर पर उसके अन्दर से जैसा वो बना हुआ है, वैसे विचार उठते हैं और उसी तरह की वो बातें करता है. जो आदमी स्वाभाविक बातें नहीं करता वो कभी अपना मुंह बनाता है, कई किस्म की शक़्लें बनाता है जिससे दूसरों को धोखा भी दिया जा सकता है. इसीलिए जो महापुरुष यह समझ जाता है कि इन्सान नूर से और कुदरत से पैदा हुआ वो किसी को किसी बन्धन में आ कर धोखा नहीं देता. इसी का नाम 'इन्सान बनो' है. इस शब्द में कबीर साहिब ने फरमाया है कि सब इन्सान हैं. लोग कुदरत से बने हैं.
लोगा भरम न भूलो भाई।
ख़ालक ख़लिक ख़लक में ख़ालिक पूर रहयो सब ठाई ।।
लोगों के बनाए हुए भ्रम वश इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि एक ख़ालिक सब ख़लकत में है. ख़ालक और ख़लकत सब ओतप्रोत है. ख़ालिक को ही अल्लाह कहा गया है.
माटी एक अनेक भाँति कर साजी साजनहारे।
न कछु पोच माटी के भांडे न कछु पोच कुम्हारे।।
उस बनाने वाले ने एक ही माटी से सब को बनाया है. दर असल क्या कुम्हार और क्या बर्तन एक ही माटी के हैं. जिस तरह कुम्हार एक मिट्‌टी से कई किस्म के बर्तन बनाता रहता है, इसी तरह सब इन्सान एक ही मिट्‌टी के हैं.
सब में सच्चा एको सोई तिस का किया सब कुछ होई।
हुकम पछाने सो एको जाने बन्दा कहिए सोई ।।
कबीर साहिब फरमाते हैं कि जिस को इस सृष्टि की या इस सृष्टि के बनने की या मौज मालिक की या हुक़्म की समझ आ जाती है, उस की नज़र में सब एक हो जाते हैं. उसे इन्सान कहा जाता है. उसके जितने कर्म या हरकतें हैं, उसको आप मानवधर्म कह लें. यह समझने और समझाने की बातें हैं.
अल्लाह अलख न जाई लखया गुरु गुड़ दीना मीठा।
कहे कबीर मेरी संका नासी सर्व निरंजन डीठा ।।
वो जो अल्लाह या अलख है, उसे कोई देख नहीं सकता. जब गुरु द्वारा धर्म प्राप्त हो जाता है, तो सब में उसी को देखने का ज्ञान अनुभव हासिल हो जाता है. ऐसे आदमी को कोई सत्गुरु कह ले, विवेकी कह ले, ज्ञानी कह ले. इस शब्द में कबीर साहिब ने इन्सानियत का यथार्थ रूप दिखाया है.
मैं इस लेख को लम्बा नहीं करना चाहता. आप हुजूर परम दयाल जी महाराज का साहित्य पढ़ कर इस धर्म के बारे सब ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. पुस्तकों के नाम ऊपर दिए जा चुके हैं. आख़िर में यह प्रार्थना करना चाहता हूँ कि मानवधर्म पर चलने से इन्सान की दीन और दुनिया बन जाती है. वो कैसे?
महर्षि शिवव्रत लाल वर्मन जी महाराज फरमा गए हैं कि रूहानियत से इन्सानियत बेहतर है. कैसे? इन्सानियत या मानवधर्म पर चलते चलते, ऊपर दिए गए नियमों का पालन करते-करते, मानवजाति के मनुष्यों या मानव की सेवा करते-करते, एक समय ऐसा आ जाता है कि इन्सान का मन निर्मल हो जाता है कि वो अपने आप स्वाभाविक ही इन्सानियत से निकल कर सुख-शान्ति हासिल कर सकता है. मानवजाति की सेवा, परोपकार या निःस्वार्थ कर्म के लिए सभी धर्मों में लिखा हुआ है, मगर संकीर्णता या यह अक़्ल जो किसी खास धर्म में दाखिल होने से मिल जाती है या पैदा हो जाती है वो हमें आगे नहीं जाने देती. इन्सानियत की राह पर चलने वाले फिर इन धर्मों-पंथों, जिन पर संसार के लोग चल रहे हैं यानी धर्म नम्बर दो, से बच सकते हैं और मानव जाति की सेवा करते-करते सीधे ही ऊँची अवस्था में पहुँच सकते हैं. रूहानियत में इन्सान 24 घंटे नहीं ठहर सकता मगर इन्सानियत के काम में हर वक़्त यह काम करता हुआ सच्ची शांति हासिल कर सकता है.
इसकी एक मिसाल मेरे पास है. जब हमारे देश भारत के पहले प्रधान मन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का देहान्त हुआ, अखबारों में छप गया. उस दिन सुबह जब हुजूर परम दयाल फकीर चन्द जी महाराज अपने घर 18 रेलवे मंडी, होशियारपुर से मानवता मन्दिर में आए, तो उनके सखा मास्टर मोहन लाल जी ने उनको बताया कि महाराज, पंडित जवाहर लाल नेहरू जी का निधन हो गया. वो सुन कर बहुत खुश हुए और कहा कि मास्टर जी, इस राज़ को जानना कठिन है. पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने बहुत ही लम्बे समय तक देश की या मानवजाति की सेवा की है. अब यह उस अवस्था में पहुँच गए जहाँ रूहानियत आ जाती है. अब यह मानवसेवा के योग्य नहीं रहे थे. यह है मानवसेवा.
हुजूर परम दयाल जी महाराज ने अपने साहित्य में लिखा है कि वो मालिक तो एक तत्त्व है, उसको किसी ने नहीं जाना. उसका कोई नाम नहीं. जिस नाम से किसी की मर्ज़ी हो, उसको बना ले. सभी सन्त, महात्मा, पीर, पैग़म्बर आख़िर में उसको बेअंत, बेअंत, बेअंत कह कर चले गए. किसी ने उसका पता नहीं पाया. उसके नाम पर या धर्मों के नाम पर लड़ाई झगड़ा करना व्यर्थ है. यह मानवधर्म की महानता है, कोई मामूली चीज नहीं है. यह धर्म सब धर्मों की जड़ है. इस लिए हमारे नाना विचारधारा रखने वाले जो इस वक़्त कोई कुछ विचार कर रहे हैं, कोई कुछ विचार कर रहे हैं, कोई कहता है धर्म राजनीति से अलग करें, कोई कहता है फलां धर्म राजनीति से अलग नहीं हो सकता, अपने-अपने धर्म राजनीति से जोड़ना चाहते हैं. कोई कहता है कि राजनीति में जब तक धर्म न हो, राजनीति किसी काम की नहीं. यह बड़ी भारी समस्या बनी हुई है कि धर्म को राजनीति से न जोड़ा जाए. उनके चरणों में प्रार्थना है कि मानवधर्म को राजनीति से जोड़ें और जो इस समय त्रुटियां हैं उनको दूर किया जाए.|
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