22.7.17

माला जपने के नियम और महत्व


    ‘माला’ शब्द से मंत्र जप का सहज स्फुरण होता है। धर्म कोई भी हो, देश कोई भी हो, जहाँ भी मंत्र जप या प्रभु का नाम स्मरण करने की रीति है, वहाँ माला का प्रचलन जरूर मिलता है। अध्यात्म साधनाओं का विशेषज्ञ देश कहे जाने वाले भारत में इसकी विविधता पर विशेष विचार किया गया है। लिंगपुराण (85/109-111) में प्राप्त विवरण के अनुसार अंगुलियों पर मंत्र जप से एक गुना, पर्व पर जपने से आठ गुना, पुत्रजीव (इंगुदीवृक्ष की तरह का एक वृक्ष) की माला से जपने पर दस गुना, शंख की माला से जपने पर सौगुना फल मिलता है। इसी तरह मूँगे की माला से जप करने पर हजार गुना, मणियों की तथा रत्नों की माला से जप करने पर दस हजार गुना, मोती की माला से जप करने पर लाख गुना जप का सुफल होता है। पद्माक्ष की माला से किया गया जप दस लाख गुना, सुवर्ण की माला से किया गया जप करोड़ गुना, कुश ग्रन्थि से किया गया जप अरब गुना तथा रुद्राक्ष की माला से किया गया जप अनन्त गुना फल देता है।
तंत्रसार ग्रन्थ के अनुसार वैष्णव मंत्रों के जप के लिए तुलसी की माला श्रेष्ठ मानी गयी है। गणेश जी के मंत्र जप के लिए हाथी दाँत की माला का विधान है। त्रिपुर सुन्दरी की मंत्र साधना के लिए रक्तचन्दन अथवा रुद्राक्ष को श्रेष्ठ कहा गया है। कालिका पुराण में अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग तरह की माला की बात कही गयी है। इसके अनुसार कुशग्रन्थि की माला सर्वपाप नाशक, पुत्रजीव की माला पुत्रदायक, मणिमाला सर्वाभिष्टदायक तथा मूँगे की माला विपुल धनदायक है। सनत्कुमार संहिता में माला के सूत्रों से भी फल की विशेषता बतायी गयी है। इस विवरण के अनुसार कपास के सूत से गूँथी गयी माला धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष दायक मानी गयी है। इसमें भी कुमारी कन्या के हाथों काते गए सूत का विशेष महत्त्व होता है। इस प्रयोग में सूत के रंगों का भी महत्त्व है। उजला सूत शान्ति कर्म में, लाला वशीकरण में, पीला अभिचार कर्म में, काला सूत मोक्ष तथा ऐश्वर्यसिद्धि में लाभदायक माना गया है।
शास्त्रकारों के अनुसार माला को गूँथते समय निरन्तर ॐकार का जप करना आवश्यक है। माला गूँथने के बाद स्वच्छन्द-माहेश्वर तंत्र में बताए गए सद्योजात मंत्र- ‘ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः। भवे-भवे नातिभवे भजस्व माँ भवोद्भवाय नमः’ द्वारा पंचगव्य से संस्कार कर चन्दन अगरु एवं पुष्पादि से उसकी पूजा करके गायत्री मंत्र से उसे धूपित करना चाहिए। अन्त में वाराही तन्त्र में कहे गए मंत्र- ‘ॐ माँ माले महामाले सर्वतत्त्व स्वरूपिणी। चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥’ से उसमें प्राण प्रतिष्ठ करनी चाहिए। इस तरह संस्कारित एवं प्रतिष्ठित माला से जप करने से जापक को शीघ्र सिद्धि मिलती है।
मन्त्रशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार मंत्र जप करते हुए माला का गिर पड़ना या टूट जाना अशुभ माना गया है। ऐसी स्थिति में ‘ह्री’ मायाबीज से उसकी पूजा करनी चाहिए। जप समाप्ति के बाद भी उपर्युक्त मंत्र से तथा लाल फूल से पूजा करके उसे गोमुखी में रख देना चाहिए। लिंगपुराण, गौतमीतंत्र एवं तंत्र सार आदि ग्रन्थों में कामना भेद से विभिन्न अंगुलियों के प्रयोग का विधान निर्देशित किया गया है। लिंगपुराण (85/114-116) के अनुसार मंत्र जप में अंगूठा मोक्षदायक, तर्जनी शत्रुनाशक, मध्यमा अंगुली धनदायक तथा अनामिका शान्तिदायक कही गयी है। जपकर्म में कनिष्ठिका अंगुली का प्रयोग किसी भी तरह से निषिद्ध है। इसी तरह अंगूठे के बिना कोई भी सत्कर्म अधूरा माना गया है। मंत्र साधक को अपनी कामना के अनुसार अंगूठे के साथ किसी अन्य अंगुली का इस्तेमाल करना चाहिए। सभी शास्त्रकारों ने प्रायः एक स्वर से माला में 108 दानों की बात कही है।
 

मालाओं में वैजन्तीमाला की भी बड़ी प्रसिद्धि है। शास्त्र विवरणों के अनुसार भगवान् विष्णु इसे धारण करते हैं- वैजयन्तीं च मालाम् (श्रीमद्भागवत् 10/21/5) इसके अतिरिक्त वनमाला और जयमाला का भी उल्लेख मिलता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार ये तीनों ही एक हैं और कुछ के मत से भिन्न। सत्य जो भी हो, पर इतना अवश्य है कि वैजयन्ती माला में प्रायः पाँच प्रकार की मणियों को गूँथा जाता है। ये पंचमणियाँ पंचमहाभूतों या पाँच तत्त्वों की प्रतीक है। उदाहरण के लिए इन्द्रनीलमणि अथवा नीलम पृथ्वी तत्त्व की प्रतीक है। मोती जलतत्त्व का प्रतीक है। पद्मराग या लालमणि अग्नितत्त्व का प्रतीक है। पुष्पराग मणि वायुतत्त्व का प्रतीक है। वज्रमणि अथवा हीरक आकाशतत्त्व का प्रतीक है।
अन्य देशों और धर्मों में माला का इतना सूक्ष्म व गहन विवेचन भले ही न मिलता हो, परन्तु माला के प्रयोग का विधान अवश्य है। बौद्धों की माला में भी प्रायः 108 दाने ही होते हैं। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के जन्म के समय 108 ज्योतिषी उनका भाग्यफल बतलाने के लिए बुलाए गए थे। माला के 108 दाने उसी के प्रतीक हैं। बर्मा में बुद्ध के पदचिह्न के भी 108 भाग हैं। तिब्बत में बौद्धों का धर्म लेख ‘कहग्यूर’ भी 108 पंक्तियों में लिखा है। चीन का पेकिंग स्थित उज्ज्वल श्वेत मन्दिर भी 108 यूपों से घिरा है। जापान में मृतक-श्राद्ध में 108 दीपक जलाए जाते हैं तथा 108 मुद्राओं का दान किया जाता है। उनके यहाँ सर्वत्र ही 108 का महत्त्व है। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के मरने के समय उनकी चिता की भी 108 प्रदक्षिणाएँ की गयी थीं। अतः माला में भी 108 दाने होते हैं।
बौद्ध धर्म भारत के अलावा बर्मा, लंका, चीन एवं जापान आदि देशों में प्रचलित है। देशों की विविधता के अनुसार उनकी मालाओं में थोड़ा बहुत भेद अवश्य है। भारतीय बौद्धों की माला प्रायः हिन्दुओं के समान होती है। माला पर ये सभी बुद्ध का नाम या ‘मणि पद्मे हुम्’ का जप करते हैं। तिब्बतवासी बौद्ध माला को ‘थेंगवा’ या ‘थेंगनगा’ कहते हैं। लामाओं के लिए इसका पहनना जरूरी है। जापानी बौद्धों की मालाएँ 112 दानों की होती हैं और उनमें दो सुमेरु 56 दानों के बाद होते हैं। जापान में पहले पीपल की लकड़ी की माला बनती थी, क्योंकि यही बोधिवृक्ष है। और इसी के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान हुआ था। लेकिन इन दिनों जापान में पीपल की लकड़ी न मिलने के कारण बेर तथा रुद्राक्ष की मालाएँ ज्यादा बनने लगीं हैं। जापानी कनो, कीतो और गोमा महोत्सवों पर मालाओं की बड़ी प्रतिष्ठ करते हैं।
 

जैनियों की जप माला में 111 दाने होते हैं। इनमें 108 दानों पर ये ‘णमो अर्हन्ताय’ का जप करते हैं, शेष तीन पर ‘सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्रेभ्यो नमः’ का जप करते हैं। जैनियों के यहाँ पर दो तरह की मालाओं का प्रयोग होता है। एक को ये लोग गणितियाँ और दूसरी को ये काँचनीया माला कहते हैं। सिक्ख पंथ के लोग अपनी माला में दानों के स्थान पर मुलायम रुई का इस्तेमाल करते हैं। परन्तु यह रुई टिकाऊ नहीं होती है। इसलिए ये लोग विशेष उत्सवों पर लोहे की माला का व्यवहार करते भी देखे जाते हैं।
अरब-ईरान, तुर्की आदि में इस्लाम धर्म की बहुलता है। अपने देश भारत में इस्लाम धर्म को मानने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। इस्लाम धर्म में माला को ‘तसबीह’ कहा जाता है। इस तसबीह में 99 दाने होते हैं। इसमें से मुख्य दाना ‘इमाम’ कहलाता है। इनकी माला तीन भागों में बंटी होती है। प्रायः प्रत्येक भाग के दानों का रूप-रंग दूसरा होता है। उसका आकार भी दूसरा होता है और वे अलग-अलग पदार्थों के बने होते हैं। इस्लाम में एक दूसरी तरह की माला का प्रचलन भी देखने को मिलता है। इसमें 99 के स्थान पर 101 दाने होते हैं। इसमें 101 पैगम्बरों का नाम जुटा माना जाता है। डॉ. गेश्चर ने लिखा है कि कहीं-कहीं ये दाने अल्लाह से भी सम्बद्ध माने जाते हैं। पैगम्बरों के नाम का कोई प्रमाणिक आधार नहीं मिलता।
इस्लाम में माला का प्रचार कब से हुआ, इस बारे में कई किम्वदन्तियाँ मिलती हैं। किन्तु एच. थर्स्टन का विचार है कि बौद्धों से ही उन्हें माला का ज्ञान मिला। इस्लाम की कई शाखाएँ हैं और इनमें से प्रत्येक शाखा अपने दानों के विशेष पवित्र होने का दावा करती हैं और अलग-अलग पदार्थों के दाने तैयार करके माला बनाती हैं। वहाबी मुसलमान जो अब्दुल वहाब के अनुयायी हैं, अंगुलियों पर ही गणना करते हैं। लकड़ी की माला का प्रयोग प्रायः सभी करते हैं। मक्के की मिट्टी के दाने बहुत अधिक पवित्र माने जाते हैं। पत्थर, सीसा और गुठलियों के भी दाने होते हैं।
मूँगे और मोती की माला का भी इस्लाम में प्रचलन है। शिया मुसलमान करबला की मिट्टी के दाने बनाते हैं, जहाँ हुसैन को दफनाया गया था। अरब के सुन्नी मुसलमान भारतीय मालाओं का प्रयोग भी करते हैं। मुस्लिम धर्म में ऊँट की हड्डी के दानों की माला का भी प्रचलन है। कभी-कभी वे इन दानों को हुसैन की मृत्यु के उपलक्ष्य में लाल रंग में भी रंग लेते हैं। हसन-हुसैन को जहर देकर मारा गया था। अतः उसका रंग मरने के बाद हरा हो गया था, इसलिए वे कभी-कभी इन दानों को हरे रंग में भी रंग लेते हैं। फकीरों की माला प्रायः विभिन्न रंग के सीसे की गुटियों की होती है। शोधकर्त्ताओं के अनुसार मिश्र में 1000 दानों की माला का उपयोग किया जाता है, यह उपयोग मरण संस्कार के बाद किया जाता है। उस समय कुछ कुरान की आयतें पढ़ने का भी प्रचलन है।
धार्मिक इतिहास के विशेषज्ञ एच. थर्स्टन का मत है कि इसाइयों में माला का प्रचार मुसलमानों से हुआ। हालाँकि कई शोधकर्त्ता इस तथ्य में सन्देह प्रकट करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसाइयों के रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय में 150 दानों की माला का प्रचलन है। ये माले 15 बड़े दानों से 10 भागों में विभक्त होते हैं। रोमन साधुओं की माला में 100 दाने होते हैं। ये तीन बड़े दानों से 4 भागों में विभक्त होते हैं। यहूदियों में माला का कोई विशेष धार्मिक महत्त्व नहीं है। वे इसे केवल क्रीड़ा या विनोद के लिए पर्व तथा उत्सवों पर धारण करते हैं। इनमें कुछ मालाएँ 32 दानों की और कुछ मालाएँ 99 दानों की होती हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इन्होंने इसे तुर्क एवं यूनानवासियों से ग्रहण किया।
इतिहासविद् जेम्स प्रिस्टन का कहना है कि माला का इतिहास बहुत ही गम्भीर होते हुए भी रोचक है। अनेकों ऐतिहासिक तथ्य इस बात के साक्षी हैं कि माला का सम्पूर्ण विज्ञान हिमालय और गंगा की गौरवपूर्ण सम्पदा वाले ऋषियों के देश भारत में विकसित हुआ। यहीं से यह समय-समय पर अन्य देशों के निवासियों ने आँशिक रूप में इसे ग्रहण किया। प्रिस्टन के अनुसार माला का विश्व व्यापी प्रचार कैसे हुआ? अभी यह शोध का विषय है। परन्तु इस विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोगों को बरकरार रखना उनका अनिवार्य कर्त्तव्य है, जो भारत की धरती पर रहते हैं और बसते हैं।
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