16.6.17

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार?



   यह गंभीर चिंता का विषय है कि भ्रष्टाचार देश की बौद्धिक बहस का हिस्सा बना रहता है, लेकिन चुनाव का मुद्दा अब बन नहीं पाता। कभी मुद्दा बना ही नहीं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। चौहत्तर का बिहार आंदोलन, जो बाद में इमरजंसी के खिलाफ हो गया, छात्रावासों में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही शुरू हुआ था। वीपी सिंह के नेतृत्व में हुए चुनाव का मुख्य मुद्दा राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ही था। लेकिन धीरे-धीरे यह चुनावी एजेंडे से बाहर चला गया। इसकी एक वजह संभवत: यह हुई कि अगड़ी राजनीति के खिलाफ पिछड़ी राजनीति का दौर शुरू हुआ और उसके जवाब में राम मंदिर आंदोलन और राजनीति के केंद्र में आ गया जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। अब भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं रहा।
   बिहार में एक दर्जन से अधिक कुख्यात अपराधी विधायक बने, कुछ सांसद भी, क्योंकि उनका एक वोट बैंक था। जातीय समीकरणों से उभरे नायक दागी भी हों तो उनके मतदाताओं को उससे फर्क नहीं पड़ता है, चाहे वे मायावती हों, मुलायम हों, लालू हों, जयललिता हों या कोई और। यह फेरहिस्त बहुत लंबी हो सकती है। इससे अहम बात यह कि भ्रष्टाचार को लेकर हमारी संवेदना लगातार भोथरी होती गई है। ईमानदारी को अब एक अनजान वस्तु, जुनून या कोरा आदर्श माना जाने लगा है। ऊपरी कमाई एक सामाजिक स्टेटस। हम बेटी या बहन के लिए वर ढूंढ़ने निकलते हैं तो कभी यह सवाल हमारे जेहन में नहीं उठता कि होने वाला वर ईमानदार है या नहीं। उलटे ऊपरी कमाई की संभावना से बेटी का बाप आश्वस्त होता है, बेटी खाते-पीते घर में जा रही है।
पहले किसी एक जगह फायरिंग होती थी तो पूरे देश में सिहरन दौड़ जाती थी, अब हर रोज हिंसक वारदातें! अब हम हिंसा, बलात्कार की घटनाओं की खबर चैनलों पर देखते हुए मजे से ब्रेड पर मक्खन लगा कर खाते रहते हैं। ठीक उसी तरह भ्रष्टाचार को लेकर भी हमारी संवेदना कुंद हो चुकी है। चार सौ करोड़ का आइपीएल घोटाला, 1 करोड़ 76 हजार का 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, आठ हजार करोड़ का राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श घोटाला। घोटाला ही घोटाला। भ्रष्टाचार चिंता का विषय बनता जा रहा है। लेकिन अब उस चिंता में संजीदगी नजर नहीं आती। जो भ्रष्टाचार से प्रभावित होते हैं, उनके लिए भी भ्रष्टाचार कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं, क्योंकि अवसर मिलने पर वे खुद भी भ्रष्ट बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जो जनाक्रोश होना चाहिए, वह कहीं दिखाई नहीं देता। भ्रष्टाचार सर्वव्यापी और सर्वग्रासी बनता जा रहा है और एक कृत्रिम किस्म की लड़ाई उसके खिलाफ चलती रहती है। कभी सूचना के अधिकार के रूप में, कभी लोकपाल विधेयक के रूप में।

  अगर भ्रष्टाचार से किसी को कोई खास शिकायत नहीं तो भ्रष्टाचार चलते रहने में क्या हर्ज है? हर्ज है। क्योंकि भ्रष्टाचार से व्यापक समुदाय का हित प्रभावित होता है, हम सबका भविष्य प्रभावित होता है। आखिरकार, हर तरह से साधन-संपन्न होने के बावजूद हमारे देश का शुमार दुनिया के सबसे पिछड़े-विपन्न देशों में क्यों होता है?
सबसे ज्यादा भूखे, नंगे, कुपोषित और अनपढ़ लोग हमारे देश में क्यों हैं? अगर हममें थोड़ी-सी भी मानवीय चेतना है, अपने देश के लिए आत्म-गौरव का भाव है तो हमें इस सवाल से बेचैन होना चाहिए और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के उपायों पर विचार करना चाहिए।
   भ्रष्टाचार पर काबू पाने का कोई मुकम्मल तरीका तो नजर नहीं आता, लेकिन इस दिशा में हम कुछ एहतियाती कदम उठा सकते हैं। लेकिन पहले इस बात को दिमाग से साफ कर लेना चाहिए कि कानून बना कर इस भ्रष्टाचार पर हम काबू नहीं पा सकते हैं। क्या रिश्वत लेना और देना आज की तारीख में अपराध नहीं? दहेज के खिलाफ कानून नहीं? लेकिन रिश्वत बखूबी चल रहा है। दहेज अब भी लिया जाता है, दिया जाता है। पुलिस है, प्रशासन है, एक मोटा-सा लिखित संविधान है, कोर्ट-कचहरी है। तरह-तरह की जांच एजेंसियां हैं। फिर भी भ्रष्टाचार और अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। अण्णा हजारे का मानना था कि अगर उनकी मांग के मुताबिक लोकपाल कानून बन गया तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा।
लेकिन जरा सोचिए, क्या होगा इस नई व्यवस्था में? हर शहर में कोर्ट-कचहरी के अलावा लोकपाल का एक भवन होगा। जो जांच एजेंसियां हैं, उन पर विश्वास नहीं, इसलिए हो सकता है लोकपाल के अलावा एक पूरी नई व्यवस्था हो। लेकिन इस व्यवस्था से जुड़े लोग हमारे इस भ्रष्ट समाज के बाहर के लोग होंगे?
यह बहस फिर भी चलती रहती है। इससे यह उम्मीद बनती है कि अब भी इस व्यवस्था में सुधार की कोई गुंजाइश है। लेकिन नए उपायों के क्रियान्वित होने तक हम कुछ और बातों पर भी गौर कर सकते हैं, जो सामाजिक जीवन में चर्चा का विषय बनती रही हैं। इससे और कुछ हो या न हो, भ्रष्टाचार को रोकने का सवाल कुछ मूर्त हो सकता है।
    एक पुरानी कहावत है- सत्ता भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता पूर्णरूपेण भ्रष्ट बनाती है। इसलिए सत्ता का विकेंद्रीकरण जरूरी है। गांधी, लोहिया के चौखंभा राज व्यवस्था के सपने को सच्चे अर्थों में साकार कर हम सत्ता और धन का विकेंद्रीकरण कर सकते हैं। सत्ता में सामान्य जनता की भागीदारी सुनिश्चित कर और सरकारी कामकाज में ज्यादा से ज्यादा पारदर्शिता लाकर हम भ्रष्टाचार को कम कर सकते हैं। हमने पंचायती व्यवस्था कायम तो कर रखी है, लेकिन उनके हाथ में ताकत नहीं दी है। कार्यपालिका में दखल वह नहीं दे सकती। मसलन, प्रखंड कार्यालय का बीडीओ भ्रष्ट है, थानेदार क्रूर है तो पंचायत के जरिए उसे स्थानांतरित नहीं कर सकते, उसको सजा देने की सिफारिश भी नहीं कर सकते।
दूसरी बात, भ्रष्टाचार का प्रवाह ऊपर से नीचे की तरफ होता है। बहते झरने की तरह। यह बात हर प्रबुद्ध व्यक्ति जानता-समझता है। झरने के तल को साफ कर हम झरने को शुद्ध नहीं कर सकते। उसके लिए तो झरने के निकास स्थल से हमें सफाई अभियान शुरू करना होगा। अगर देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भ्रष्टाचार-मुक्त होगा तो वह नौकरशाही और नीचे के भ्रष्टाचार पर भी रोक लगा सकेगा।    यह प्रक्रिया नीचे से ऊपर की तरफ कारगर नहीं हो सकती। इसलिए बड़े-बड़े भव्य मंचों से जो लोग भ्रष्टाचार मिटाने की बातें करते हैं, उन्हें और उनके करीब के लोगों को भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त होना होगा।
कुछ लोगों की राय है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार की सजा बहुत कम है। इसलिए भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्ति जरा भी डरता नहीं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दो-चार वर्ष की सजा हो भी गई तो क्या गम है? भारतीय दंड विधान में कोर्ट के पेशकार की सौ पचास रुपए की रिश्वत लेने की सजा और करोड़ों का घोटाला करने की सजा लगभग एक है। सरकार में बैठे लोगों के लिए तो सजा इतनी काफी समझी जाती है कि वे अपने पद से इस्तीफा दे दें। लेकिन यह काफी नहीं। एक करोड़ से अधिक के भ्रष्टाचार के लिए उम्रकैद की सजा होनी चाहिए।
हम भ्रष्टाचार को अत्यंत सीमित अर्थ में ही लेते हैं। उसे भादवि की धाराओं से परिभाषित करने की हमारी आदत है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार सिर्फ वह नहीं, बहुत-सी बातें भ्रष्टाचार ही हैं, लेकिन कानूनी दायरे में नहीं आतीं।
    उन्हें हम कानून-सम्मत भ्रष्टाचार कह सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब लाखों लोग मुंबई के फुटपाथों पर जीते हैं, तब जनप्रतिनिधियों का आलीशान बंगलों में रहना भ्रष्टाचार ही है। सरकार बनाने के लिए विधायकों को रिश्वत देना अपराध है, लेकिन मंत्रिपद का लालच या बोर्ड निगम का अध्यक्ष बनाने का सौदा अपराध नहीं! न्यूनतम मजदूरी हम एक सौ बीस रुपए तय करते हैं तो छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करना कानूनसम्मत भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। इसलिए कानून की धाराओं के अनुसार जो भ्रष्टाचार हो रहे हैं, उन पर रोक लगना तो जरूरी है ही, कानून सम्मत भ्रष्टाचार पर भी रोक लगना जरूरी है।


चूंकि हम यह सवाल नहीं उठाते, इसलिए आम जनता, कहिए गरीब जनता, भ्रष्टाचार-विरोधी लड़ाई से निर्लिप्त रह जाती है।
   एक बात और समझने की जरूरत है। वह यह कि जब तक असीमित उपभोग की छूट रहेगी, तब तक हम लूट की प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगा सकते। भ्रष्टाचार और लूट पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है कि हम असीमित उपभोग पर भी रोक लगाएं। यह सुनिश्चित करें कि समाज में आर्थिक विषमता कम हो। अगर हम अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी एक सौ बीस रुपए तय करते हैं, तो किसी भी सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी के एक दिन का अधिकतम पारिश्रमिक एक हजार से अधिक नहीं होना चाहिए। संपत्ति और समृद्धि के भोंडे प्रदर्शन पर रोक लगनी चाहिए, तभी भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा।
कोई भी समाज अच्छे-बुरे, सही-गलत, सुंदर-कुरूप के बोध से चलता है। हमारी परंपरा, हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारे अंदर मूल्य-बोध का सृजन करती है। सही-गलत की इसी समझ को बाद में समाज के नियामक कानूनी शक्ल दे देते हैं। चोरी अपराध है, यह भावबोध पहले समाज के मन में घर करता है, तभी वह कानूनी शक्ल में भी प्रभावी होता है। ईमानदारी एक जीवन मूल्य थी। इसके प्रतिलोम भ्रष्टाचार एक अवमूल्य। लेकिन कालांतर में ईमानदारी जीवन मूल्य नहीं रही। ईमानदार व्यक्ति को आज खब्ती समझा जाता है। इसके उलट भ्रष्टाचार से हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं जाती, उसमें इजाफा ही होता है। क्योंकि भ्रष्टाचार से हमारी आर्थिक हैसियत में इजाफा होता है।
    इसलिए कानून बना कर या फिर भ्रष्ट व्यक्ति को दंड देकर ही हम भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा सकते। इसके लिए जरूरी है कि हम जीवन मूल्य के रूप में ईमानदारी को फिर से प्रतिष्ठित करें। आप कहेंगे, यह तो आदर्श की बातें हैं। लेकिन ये जीवनादर्श ही देश को बचा सकते हैं, कानून नहीं।
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