18.4.17

कर्म चक्र को ऐसे सुधारें

योग: कर्मसु कौशलम्। यानी कर्म की कुशलता ही योग है। कर्म की कुशलता के लिए जितने उपाय हैं, वे सब इसमें शामिल हैं।
अर्जुन ने कहा, 'हे जनार्दन! जब आप कर्मों की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ तथा मान्य बताते हैं तो फिर मुझे कर्म करने के लिए क्यों कह रहे हैं? आपकी बातें मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रही हैं।' श्रीकृष्ण बोले, 'हे निष्पाप! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठाएँ हैं, एक तो है ज्ञान जिसे सांख्य योगी करते हैं और दूसरा है कर्म जिसे कर्म योगी करते हैं।प्रत्येक मनुष्य के लिए ये दोनों अत्यावश्यक हैं। मनुष्य कर्म किए बिना कभी रह नहीं सकता, बिना कर्म के तो वह न तो सांख्य योग को प्राप्त होता है और न ही कर्म योग को।
'हे अर्जुन! इस संसार में कोई भी प्राप्त करने लायक वस्तु मुझे अप्राप्त नहीं है फिर भी मैं कर्म करते रहता हूँ। यदि मैं स्वयं इन्द्रियों से आसक्‍त होकर कर्म करूँगा तो बड़ी क्षति हो जाएगी। अज्ञानी मनुष्य इन्द्रियों से आसक्‍त होकर कर्म करते हैं किन्तु ज्ञानी जन संसार की भलाई का ध्यान रखते हुए अनासक्तिपूर्वक कर्म करते हैं।
क्या होता है कर्म से : आसक्तिभाव और अनासक्ति भाव से किए कर्म का परिणाम अलग-अलग होता है। कर्म से चित्त पर बंध बनता है- इसे कर्मबंध कहते हैं। यही बंध मृत्यु काल में बीज रूप बनकर अगले जन्म में फिर जड़ेंपकड़ लेता है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि जीवन एक चक्र है तो इस चक्र को समझना जरूरी है। आपकी सोच और आपके कर्म से निकलता है आपका भविष्य। इस कर्म चक्र को जो समझता है वही कर्म में कुशल होने कीभी सोचता है। कर्म में कुशल होने से ही जीवन में सफलता मिलती है।
बुरे कर्म का चक्र : यदि आप धर्म और समाज द्वारा निषिद्ध कर्मों को करते आए हैं तो निश्चित ही उसको करते रहने के अभ्यास से उसकी आदत आपसे छूट पाना मुश्किल होगी। चित्त पर किसी कर्म के चिपक जाने से उसकाछूटना मुश्किल होता है। यदि किसी व्यक्ति के साथ बुरे से बुरा ही होता रहता है तो इस चक्र को समझो। निश्‍चित ही कतार में खड़ी प्रथम साइकल को हम गिरा देते हैं तो इसकी सम्भावना बन जाती है कि आखिरी साइकल भी गिर सकती है।
कैसे बने कर्म में कुशल : कुछ भी प्राप्त करने के लिए कर्म करना ही होगा और कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा न रहे इसके लिए भी कर्म करना ही होगा। योग और गीता हमें यथार्थ में जीने का मार्ग दिखाते हैं। ज्यादातर लोग अतीत के पछतावे और भविष्‍य की कल्पना में जीते हैं। योग कहता है कि वर्तमान में जीने से सजगता का जन्म होता है। यह सजगता ही हमारी सोच को सही दिशा प्रदान करती है। इसी से हम सही कर्म के लिए प्रेरित होते हैं। कर्म में कुशल होने के लिए योग के यम के ‍सत्य और नियम के तप और स्वाध्याय का अध्ययन करना चाहिए। क्रिया योग से कर्म का बंधन कटता है।
अंतत: कर्म का विज्ञान इतना विस्तृत है कि इसे यहाँ पूरी तरह समझा पाना संभव नहीं है, लेकिन जो कर्म चक्र और कर्म बंध को समझते हैं उनके लिए योग में इस तरह की विधियाँ हैं जिससे 'चक्र' को सुधारा जा सकता है.और पुराने कर्म के 'बंधन' से मुक्त हुआ जा सकता है।

-अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'  
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