14.2.17

मनुष्य को क्रोध क्यों नहीं करना चाहिए?


  क्या आपने सोचा है कि आपके मन में गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है ? क्या आपने कभी सोचा है कि क्रोध व गुस्सा आपके लिए हानिकारक है या लाभदायक ? यदि यह आपके लिए हानिकारक है तो क्या आप जानते हैं कि क्रोद्ध व गुस्सा पर नियंत्रण कैसे करें
अपने दैनिक जीवन में हम अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग कारणों से क्रोध करते रहते हैं । लेकिन यदि हम बाद में ठंडे दिमाग से उस पर सोचते है तो हमें यह अहसास होता है की उस समय हमारा क्रोध करना नादानी थी । हम उस क्षण को बिना क्रोध किए भी संभाल सकते थे । ज्यादातर मामलों में क्रोध करना हमारी ओवर-रिएक्शन (अति-प्रतिक्रिया) होतीं हैं । इसके अलावा क्रोध करने के हमारे जीवन पर कई बुरे प्रभाव भी पड़ते हैं जिनका हम यहां अलग-अलग विश्लेषण करते हैं।
व्यक्ति के रिश्तों पर : जिस व्यक्ति पर क्रोध किया जाता है उससे रिश्तों पर भी प्रभाव पडता है । यदि वह व्यक्ति महत्वपूर्ण है तो उससे रिश्ते खराब होना नुकसानदायक भी हो सकता है । 
 
*तमो गुण बढ़ने से अहंकार और अज्ञान उत्पन्न होता है तथा सब प्रकार के भेद अहंकार से उत्पन्न होते हैं। भेद उत्पन्न होते ही लोग एक दूसरे से तुलना करने लगते हैं तथा दूसरे में कमी निकालने लगते हैं। कमी निकालनेवाले नजरिए की वजह से सभी में कमी निकालना एक स्वभाव सा बन जाता है। अज्ञानता के कारण ही लोगों में सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाता है। ऐसे में व्यक्ति दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं। दोषारोपण करने से क्रोध व गुस्सा उत्पन्न हो जाते हैं।
व्यक्ति की मनोदशा पर :
 क्रोध में व्यक्ति की मनोदशा अर्द्ध-पागल की हो जाती है । उसका अपने संवेगों पर नियंत्रण नहीं रहता है ऐसी स्थिति में वह कुछ भी कर सकता है ।
क्रोध समस्या का समाधान नहीं-
*कभी-कभी परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि व्यक्ति का क्रोध में आ जाना स्वाभाविक हो जाता है । लेकिन क्रोध समस्या का समाधान नहीं हैं । क्रोध एक प्रकार की आग होतीं हैं । जैसे लकड़ी में आग लगाती है तो वह दूसरे को जलाये या न जलाये पहले स्वयं जलती है । इसी प्रकार क्रोध में व्यक्ति स्वयं को ही जलता है । इसके अलावा क्रोध में व्यक्ति कई बार ऐसे काम कर बैठता है जिसके कारण उसकी गलती नहीं होते हुए भी अपने आपको कसूरवार बना बैठता है ।
*व्यक्ति के गुण पर :
 क्रोध व्यक्ति का एक अवगुण है । क्रोधी व्यक्ति की लोगों से कम पटती है घर, परिवार तथा कार्य स्थल पर उसको चाहने वाले लोग कम होते है ।
व्यक्ति के कार्यों पर :
 क्रोध में व्यक्ति कई बार ऐसे कार्य कर बैठता है जिसकी उसको बाद में भारी कीमत चुकानी पड सकती है । झगड़ा, मारपीट, हत्या जैसे अपराध व्यक्ति क्रोध में ही करता है ।
*व्यक्ति की वाणी पर :
 क्रोध में व्यक्ति का भाषा का स्तर अकसर गिर जाता है । और कई बार वह क्रोध में शालीनता की सारी हदें पार करके गाली गलौज पर उत्तर जाता है ।
व्यक्ति के निर्णयों पर : 
 
क्रोध में लिये गए निर्णय ज्यादातर गलत होते है । जिसका नुकसान व्यक्ति को बाद में जीवन भर उठाना पड सकता है । और उसको ऐसे निर्णयों का पछतावा जीवन भर रह सकता है ।
*क्रोध को काबू में कैसे करें
उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम यह कह सकते है कि क्रोध करने से नुकसान ही नुकसान है इस कारण इसको काबू में करने में ही समझदारी है अब प्रश्न उठता है की क्रोध को काबू में कैसे करे ? क्रोध को रोकने की ऐसे तो कोई निश्चित विधि नहीं है । लेकिन यदि व्यक्ति निम्न उपाय करें तो उसको क्रोध को काबू में करने में कम या ज्यादा कुछ तो सहायता मिल ही सकती है ।
*सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध के उपरोक्त दुष्परिणाम तथा इसकी निरर्थकता को अच्छी तरह समझना चाहिए क्योंकि तभी व्यक्ति के मन में इससे छुटकारा पाने की पक्की इच्छा आती हैं । और एक बार मन में पक्की इच्छा आ जानें के बाद क्रोध से छुटकारा पाने की शुरूआत हो जाती है ।
 *.क्रोध को काबू में करने के लिए प्रतिदिन क्रोध आने की संख्या को प्रयास करके कम करने की कोशिश करें । इसके लिए जब भी क्रोध आये लंबी सांस ले ले या पानी पी ले या दोनों ही करें ।
*.किसी की गलती पर क्रोध आने पर सोचें की इस संसार में संपूर्ण कोई भी नहीं है गलती किसी से भी हो सकती है ।
*यह सोचें की जो जैसा करेगा वैसा भरेगा सज़ा देना ईश्वर का काम है और एक न एक दिन ईश्वर किये की सज़ा देता ही है ।
*जीवन में अलग-अलग परिस्थिति में स्वयं से जो भी सबसे अच्छे से अच्छा हो सकता है वह करें इसके बाद जो भी फल मिलता है उसको ईश्वर का आशीर्वाद तथा प्रसाद समझ कर स्वीकार करें ।
*जीवन में अध्यात्म को अपनाये इससे व्यक्ति को मन की शांति मिलती हैं।
*जिस समय क्रोध आ रहा है उस समय एक बार उस जगह से स्वयं को हटा ले और थोडा इधर उधर टहल ले या बाथरुम चले जाये । जब क्रोध कुछ शांत हो जाये तब वापिस आ जाये ।
*क्रोध आने पर इसके दुष्परिणाम तथा निरर्थकता के बारे में सोचने लगे ।

 
* गुस्सा उत्पन्न होने से मानसिक तनाव उत्पन्न हो जाता है।मानसिक तनाव उत्पन्न होने से मन की शांति ख़त्म हो जाती है और दोनों के बीच झगड़ा छिड़ जाता है। इस कारण लोगों का पतन हो जाता है। लोगों का पतन होने से कुछ भी बुरा होने का दोष भगवान पर मढ़ देता है। वह कहता है कि मैंने भगवान का इतना पूजा-पाठ किया और बदले में उन्होंने मुझे ये परेशानियां दीं। लेकिन इसके विपड़ीत जब कुछ अच्छा होता है, तब वह खुद को ही शाबाशी देता है।इसलिए यदि आप इस पड़ेशानी में घिर गए हैं तोतमो गुण को नष्ट करने के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चाहिए कि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ परमेश्वर के परायण हो कर ध्यान में बैठे। क्योंकि जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में होती है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। (गीता २:६१) मनुष्य की बुद्धि स्थिर होजाने से एकदम सही और एकदम गलत में फर्क समझ में आने लगता है। सही और गलत में फर्क समझ में आजाने से क्रोध व गुस्सा नष्ट हो जाता है। क्रोध व गुस्सा के नष्ट होते ही सबके लिए प्रेम उपजने लगता है। इसलिए तू पहले सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी क्रोध व गुस्सा को बल पूर्वक मार डाल । गीता ३ :४२ में परमेश्वर ने कहा कि स्थूल शरीर से बलवान इन्द्रियाँ है; इन्द्रियों से बलवान मन है; मन से बलवान बुद्धि है और बुद्धि से बलवान आत्मा है।

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