21.3.16

महाभारत के शिक्षाप्रद अमृत वचन



1-किया हुआ पाप स्वीकार कर लेने या कह देने से, शुभ कर्म करने से, पश्चाताप करने से, दान और तप करने से नष्ट होने लगता है।
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-36


2-हम आज जो पाप बटोर रहे हैं, कल वह हमारे लिए विकट कष्टों (जन्म और मृत्यु) का कारण बनेगा।
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-41



3-अर्जुन ! पृथ्वी का शासन तुम करो, मुझे राज्य और भोगों से कोई मतलब नहीं है।
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-42



4- जगत में निर्धनता को धिक्कार है। सर्वस्व त्यागकर निर्धन या अकिंचन हो जाना यह संतों और मुनियों का धर्म है, राजाओं का नहीं।
महाराजा नहुष, महाभारत, शांतिपर्व, 8-11



5-जिस राज्य का धन समाप्त हो जाता है उसके धर्म का भी संहार हो जाता है। कोई हमारे धन-धर्म का अपहरण करे तो उसे क्षमा कैसी?
अर्जुन, महाभारत, शांतिपर्व, 8-13
6-दरिद्रं पातकं लोके….
दरिद्र मनुष्य पास में खड़ा हो तो लोग इस तरह उसकी ओर देखते हैं मानो उससे बड़ा पापी कोई नहीं। अतएव दरिद्रता जगत में महापाप है, मेरे सामने दरिद्रता की प्रशंसा न करें।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-14



7-पर्वतों से बहुत-सी नदियां बहती रहती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए संचित धन से सब प्रकार के शुभ कर्मों का अनुष्ठान होता रहता है।
अर्जुन, महाभारत, शांतिपर्व, 8-16



8-राजा को चाहिए कि प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय करे, विद्वान बने और येन-केन-प्रकारेण संग्रह कर राज्य में धन का निवेश करे और प्रजा के कल्याण के लिए यत्नपूर्वक यज्ञ का अनुष्ठान करे। राजा के लिए दूसरे देश के धन का अपहरण सर्वथा उचित है।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-26,27



9-राजा का पुनीत कर्तव्य है कि वह साम्राज्य विस्तार करे। सभी राजा पृथ्वी-विजय करते हैं। जीतने के बाद कहते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। ठीक वैसे ही जैसे पुत्र पिता के धन को अपना बताता है। यही राजधर्म है।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-31



10-जैसे भरे हुए महासागर से जल निकल कर संपूर्ण पृथ्वी पर फैल जाता है उसी प्रकार राजा को चाहिए कि उसके द्वारा एकत्रित धन उसके संपूर्ण राज्य में फैल जाए।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-32



11-कुछ मिले या न मिले, न तो जीवन का अभिनन्दन करूंगा और न मृत्यु से द्वेष। दोनों के प्रति मेरा भाव समान है। इस अपार संसार में त्यागी को ही सुख है।
सम्राट युधिष्ठिर का अर्जुन को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 9-25,33

12- जीवन में विवेक अमृत समान है। इससे अक्षय, अविकारी एवं सनातन पद प्राप्त हो जाता है।
सम्राट युधिष्ठिर का अर्जुन को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 9-25,36



13-राजा को अपने राजधर्म की निंदा नहीं करनी चाहिए वरन् अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-2



14-बुढ़ापे से जर्जरित होने पर, आपत्तिकाल में अथवा शत्रु द्वारा धन-संपत्ति से वंचित कर दिए जाने पर मनुष्य को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-17



15-अकर्मण्य पुरूष को कभी कोई सिद्धि नहीं मिलती। उसी प्रकार राजा को मौनी बाबा बनकर अपने स्वधर्म अर्थात् कर्तव्य से नहीं हटना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-21,26
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