22.3.16

गीता के अमृत उपदेश भाग - 1

श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश 

  


भाग -1 
*जो हमेशा शंका मन में रखते हैं उन्हें ना इस संसार में और ना ही कहीं भी चैन मिलता हैं |

*बुद्धिमान व्यक्ति ज्ञान और कर्म को एक ही देखता हैं यही सत्य हैं |
*हमेशा कर्म करो क्यूंकि बेकार रहने से कई ज्यादा कर्मवान होना हैं |
*क्रोध से माया उत्पन्न होती हैं, माया से बुद्धि व्यग्र होती हैं और व्यग्र बुद्धि से विचारों का नाश होता हैं 
क्रोध से माया उत्पन्न होती हैं, माया से बुद्धि व्यग्र होती हैं और व्यग्र बुद्धि से विचारों का नाश होता हैं 

*और एक बार जब विचारों का नाश होता हैं उस वक्त सब खत्म हो जाता हैं |
*अपने ज्ञान से अपने भीतर के अज्ञान को तलवार से काटकर उसका वध करों | अपने अनुशासन में रहो , जागो 
*जो अपनी सोच को नियंत्रित नहीं रख पाते, उनकी सोच उन्ही की दुश्मन बन जाती हैं |
*मनुष्य अपने विचारों से बनता हैं जैसा वो सोचता हैं वही वो होता हैं |
*भगवान की शक्ति आपके पास हमेशा मानसिक कार्यों, अहसास, श्वास के रूप में हैं | जिसका उपयोग आप हमेशा करते हैं |
*जीवन में कुछ भी खोने या व्यर्थ जाने को नहीं हैं
*लालच, गुस्सा और वासना तीनो नरक के द्वार हैं 



कोई टिप्पणी नहीं: