13.9.10

चाणक्य नीति,सूक्तियां,प्रेरक वचन



                                                                                                                                              चाणक्य के प्रेरक वचन



* सबसे बडा मंत्र है कि अपने मन की बात और भेद दूसरे को न बताओ। अन्यथा विनाशकारी परिणाम होंगे।


















*व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिये। सीधे तने के पेड सबसे पहिले काटे जाते हैं। ईमानदार आदमी को मुश्किलों में फ़ंसाया जाता है।
*अगर कोई सांप जहरीला नहीं हो तो भी उसे फ़ूफ़कारते रहना चाहिये। आदमी कमजोर हो तो भी उसे अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिये
*मित्रता में भी कुछ न कुछ स्वार्थ तो होता ही है। स्वार्थ रहित मित्रता असंभव है।
*कोइ भी काम शुरु करने से पहिले अपने आप से तीन प्रश्न पूछें। मैं यह काम क्यों कर रहा हूं? इस कार्य का क्या परिणाम होगा? और क्या मुझे इसमें सफ़लता हासिल होगी?
*संसार मे सर्वाधिक शक्ति युवावस्था और नारी के सौंदर्य में होती है।
*क्रोध यमराज के समान है,उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गौद में चला जाता है। तृष्णा वैतरणी नदी के समान है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट झेलने पडते हैं।
*विद्या कामधुनु के समान है। व्यक्ति विद्या हासिल कर उसका फ़ल कहीं भी प्राप्त कर सकता है।
*संत्तोष नंदन वन के समान है। मनुष्य इसे अपने में स्थापित करले तो उसे वही शांति मिलेगी जो नंदन वन में रहने से मिलती है।
*झूठ बोलना,उतावलापन दिखाना,दुस्साहस करना,छलकपट करना,मूर्खता पूर्ण कार्य करना,लोभ करना,अपवित्रता और निर्दयता ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।
*भोजन के लिये अच्छे पदार्थ उपलब्ध होना ,उन्हें पचाने की शक्ति होना,सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग करने की काम शक्ति होना,प्रचुर धन के साथ दान देने की इच्छा होना, ये सभी सुख मनुष्य को बडी कठिनाई से प्राप्त होते हैं।
*जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपडी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके काम बिगाड देता हो उसे त्यागने में ही भलाई है।वह उस बर्तन के समान है जिसके बाहरी हिस्से पर दूध लगा हो लेकिन अंदर विष भरा हो।
*वे माता-पिता अपने बच्चों के लिये शत्रु के समान हैं,जिन्होने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के समूह में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा- विहीन मनुष्य बिना पूंछ के जानवर जानवर जैसा होता है।
* मित्रता बराबरी वाले व्यक्तियों में करना ठीक होता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है।अच्छे व्यापार के लिये व्यवहार कुशलता आवश्यक है।सुन्दर और सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
* जिस प्रकार पत्नि के वियोग का दु:ख,अपने भाई बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है,उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी सदैव दुखी रहता है।दुष्ट राजा की सेवा मे रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है।
*मूर्खता के समान योवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के वशीभूत होकर गलत मार्ग पर चल देता है।
* जो व्यक्ति अच्छा मित्र न हो उस पर विश्वास मत करो लेकिन अच्छे मित्र पर भी पूरा भरोसा नहीं करना चाहिये क्योंकि कभी वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है ।इसलिये हर हालत में सावधानी बरतना आवश्यक है।
* ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
* सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
*वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का
भी अहित कर सकते है।
*आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
* विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।
* एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति,
उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
*सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न की अमृत।
* लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए।
*यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।



*यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए।


* जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।


* संकट में बुद्धि ही काम आती है।


*मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है।


* सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।


*आलसी का न वर्तमान होता है, न भविष्य।


* अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।


*विद्या ही निर्धन का धन है।

* शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।


*सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।


*योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।


* कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।


* शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।


* अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करे।


* मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।


*एक अकेला पहिया नहीं चला करता।


*धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।


* कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।


*जहां लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहां सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।

*प्रकर्ति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।


*अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।


*विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।


* निर्बल राजा को तत्काल संधि करनी चाहिए।


*शत्रु के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए।

* ठंडा लोहा लोहे से नहीं जुड़ता।

* जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते है।

* पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोकनिंदा का कारण बनता है।


* अग्नि में दुर्बलता नहीं होती।


* दंड का निर्धारण विवेकसम्मत होना चाहिए।

*धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है।


*कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।


* नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते है।


* सभी प्रकार की सम्पति का सभी उपायों से संग्रह करना चाहिए।


* बिना विचार कार्ये करने वालो को भाग्यलक्ष्मी त्याग देती है।


*उपायों को जानने वाला कठिन कार्यों को भी सहज बना लेता है।


* दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।


*अपनी शक्ति को जानकार ही कार्य करें।


*ज्ञानी जन विवेक से सीखते हैं, साधारण मनुष्य अनुभव से, अज्ञानी पुरुष आवश्यकता से

और पशु स्वभाव से।





 


*अगम्भीर विद्वान को संसार में सम्मान नहीं मिलता।

*कठोर दंड से सभी लोग घृणा करते है।

* महाजन द्वारा अधिक धन संग्रह प्रजा को दुःख पहुँचाता है।


*सच्चे लोगो के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं।


* असंशय की स्तिथि में विनाश से अच्छा तो संशय की स्तिथि में हुआ विनाश होता है।


* बहुत से गुणों को एक ही दोष ग्रस लेता है।


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