12.9.10

गिरधर कविराय की नीति विषयक कुंडलियां

            
                                                                                                  


दौलत पाई न कीजिये सपने में अभिमान

चंचल जल दिन चार को ठांवं न रहत निदान

ठांव न रहत निदान जियत जग में जस लीजै

मीठे वचन सुनाय विनय सब ही की कीजै

कह गिरधर कविराय अरे यह सब घट तौलत

पाहुन निसि दिन चारि,रहत सबही के दौलत।




साईं अवसर के परे को न सहे दुख-द्वन्द्व
जाय बिकाने डोम घर वै राजा हरिचंद।
वै राजा हरिचंद करे मरघट रखवारी
धरें तपस्वी वेष, फ़िरे अर्जुन बलधारी
कह गिरधर कविराय तपै वह भीम रसोई
कौ न करे घटि काम ,परे अवसर के साईं।



गुन के गाहक सहस नर ,बिन गुन लहै न कोय
जैसे कागा,कोकिला सबद सुने सब कोय
सबद सुने सबकोय कोकिला सबै सुहावन
दौ को इक रंग काग सब गने अपावन
कह गिरधर कविराय सुनो हो ठाकुर मनके
बिन गुन लहै न कोय,सहस नर गाहक गुन के।



बिना विचारे जो करे सो पाछे पछिताय
काम बिगारे आपनो जग में होत हंसाय
जग में होत हंसाय चित्त में चैन न पावै
खान पान ,सम्मान ,राग-रंग मनहिं न भावै।
कह गिरधर कविराय दु:ख कछु टरहिं न टारे
खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना विचारे।




साईं बैर न कीजिये गुरु,पंडित,कवि,यार
बेटा,बनिता,पैरिया,यग्य करावन हार
यग्य करावन हार ,राज मंत्री जो होई
विप्र,परोसी, वैद,आपकी तपै रसोई।
कह गिरधर कविराय युगन तें यह चलि आई
इन तेरह सों तरह दिये बनि आवै सांई।



चिंता ज्वाल सरीर बन दावा लगि-लगि जाय
प्रगट धुंआं नहिं देखियत उर अंतर धुंधवाय
उर अंतर धुंधवाय,जरै जस कांच की भट्टी
रक्त,मांस जरि जाय रहे पंजर की ठट्ठी
कह गिरधर कविराय सुनो रे मेरे मिंता
ते नर कैसे जियें जाहि व्यापी है चिंता




बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेई
जो बनि आवै सहज ही ,ताही में चित देइ
ताही में चित देइ ,बात जोई बनि आवै
दुर्जन हंसे न कोय ,चित्त में खता न पावै
कह गिरधर कविराय करो यह मन परतीती
आगे को सुख समुझि,होई बीती सो बीती




साईं अपने चित्त की भूल न कहिये कोय
तब लगि घट में राखिये जब लगि कारज होय
जब लगि कारज होई,भूल किससे नहिं कहिये
दुर्जन हंसे न कोय,आप सियरे व्है रहिये
कह गिरधर कविराय बात चतुरन के ताईं
करतूती कहि देत,आप कहिये नहिं सांईं।




पानी बाढै नाव में ,घर में बाढै दाम
दोनों हाथ ऊलीचिये यही सयानो काम
यही सयानो काम ,राम को सुमिरन कीजै
परमारथ के काज सीस आगे धरि दीजै
कह गिरधर कविराय बडेन की याही बानी
चलिये चाल सुचाल राखिये अपनो पानी




रहिये लट पट काटि दिन बरू घामें में सोय
छांह ना वा की बैठिये जो तरु पतरो होय
जो तरु पतरो होय एक दिन धोखा देहैं
जा दिन बहै बयारि टूट तब जरि से जैहैं
कह गिरधर कविराय छांह मोटे की गहिये
पाता सब झरि जाय तऊ छाया में रहिये।



साईं इस संसार में ,मतलब को व्यवहार
जब लगि पैसा गांठ में तब लगि ताको यार
तब लगि ताको यार,यार संगहि संग डोलें
पैसा रहा न पास ,यार मुख सों नहिं बोले
कह गिरधर कविराय जगत यहि लेखा भाई
करत बेगर्जी प्रीति यार बिरला कोई सांईं।



सन्त समांगम जब मिले, मिले सदा सत्संग,
मूरख भी पंडित बने चङे निराले रंग।
चङे निराले रंग संग सन्तों का पाबे।
बुध्दि निर्मल होय गंग सी बहती जाबे।
कहि गिरधर कविराय सुनो भई सब संता।
छोङ विषय भोग भजो सब श्री सत्संगा।
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