6.9.10

रहीम के दोहे : Rahim ke dohe


           * रहीम के दोहे*
                                                   
  जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग
चंदन विष व्यापे नहीं लिपटे रहत भुजंग।


एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाय
रहिमन मूलहिं सींचबो फ़ूले फ़ले अघाय।

जो गरीब सों हित करैं धनि रहीम वे लोग
कहा सुदामो बापुरो ,कृष्ण मिताई जोग।

खीरा सिर ते काटि के मलियत लोन लगाय
रहिमन कडवे मुखन को चहियत इहै सजाय।

छिमा बडन को चाहिये छोटन को उत्पात
कहा विष्णु को घटि गयो जो भृगु मारी लात।

रहिमन वे नर मर चुके जो कहुं मांगन जाहिं
उनसे पहिले वे मरे जिन मुख निकसत नाहिं।

जो बडेन को लघु कहे ,नहिं रहिम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहें कछु दुख मानत नाहिं।

अब रहीम मुसकिल परी गाढे दौऊ काम
सांचे से तो जग नहीं झूठे मिले न राम।

खेर,खून,खांसी,खुशी,बैर,प्रीति,मदपान
रहिमन दाबै ना दबै जानत सकल जहान।

कहु रहीम कैसे निभे बैर ,कैर को संग
यै डोलत रस आपने उनके फ़ाटत अंग।

रहिमन देख बडेन को लघु न दीजै डारि
जहां काम आवै सुई कहा करे तलवारि।

बडे बडाई नहिं करैं बडे न बोलें बोल
रहिमन हीरा कब कहै लाख टका मेरो मोल।

बडे काम औछे करें तो न बडाई होय
कहि रहीम हनुमन्त को गिरधर कहे न कोय।

रहिमन याचकता गहे बडे छोट हुई जात
नारायन हूं को भयो बावन अंगुर गात।

तरुवर फ़ल नहिं खात है सरवर पियहिं न पानि
कहि रहीम पर काज हित संपति संचहि सुजान।

माली आवत देखकर कलियन करी पुकार
फ़ूले फ़ूले चुन लिये काल्हि हमारी बारि।

रहिमन धागा प्रेम का मत तोडो चटकाय
टूटे से फ़िर ना जुरै, जुरै गांठ पड जाय।

बसि कुसंग चाहत कुसल यहि रहीम अफ़सोस
महिमा घटी समुद्र की ,रावन बस्यो परोस।

रहिमन विपदा हूं भली जो थोरे दिन होय
हित अनहित या जगत में जानि परत सब कोय।

धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय
उदधि बढाई कौन है जगत पियासो जाय।

वे रहीम नर धन्य हैं ,पर उपकारी अंग
बांटन वारे के लगे ज्यों मेहंदी को रंग।

कह रहीम संपति सगे बनत बहुत बहु रीति
विपद कसौटी जो कसे सोई सांचे मीत।

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून
पानी गये न ऊबरे मोती ,मानुस ,चून।

रहिमन औछे नरन सों बैर भली ना प्रीति
काटे चाटे स्वान के दौऊ भांति विपरीत।

बानी ऐसी बोलिये मन का आपा खो
औरन को सीतल करे आपहुं सीतल होय


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