4.9.10

संत तुलसी दासजी के अमृत वचन (दोहे)


                            
                                                       
          *तुलसी के दोहे* 


तुलसी मीठे वचन तें सुख उपजत चहुं ओर
वशीकरण इक मंत्र है परिहरू वचन कठोर।




तुलसी साथी विपद के विध्या,विनय,विवेक
साहस,सुकृत, सुसत्यव्रत राम भरोसे एक।









तुलसी संत सुअंबु तरू फ़ूल फ़लहिं पर हेत
इतते वे पाहन हने उतते वे फ़ल देत।

तुलसी कर पे कर करो करतल कर न करो
जा दिन करतल कर करो वा दिन मरण करो।

हरे चरहिं तापहुं बरे ,फ़िरें पसारहिं हाथ
तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ।

मनि माणिक महंगे किये सस्ते तृन,जल,नाज।
तुलसी एते जानिये राम गरीब नवाज।




तुलसी पावस आत ही धरी कोकिला मौन
अब तो दादुर बोलहिं ,हमहिं पूछिये कौन?


सचिव,वेद,गुरू तीन जो प्रिय बोलहिं भय आस
राज धरम तन तीन का होहिं वेग ही नास।


दीरघ रोगी,दारिदी ,कटु बच लोलुप लोग
तुलसी प्रान समान तऊ तुरत त्यागिबे जोग।


आवत ही हरसे नहीं नैनन नहीं सनेह
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।


नीच निचाई नहिं तजे सज्जनहूं के संग
तुलसी चंदन विटप बसि विष नहिं तजत भुजंग।


एक राम के नाम से पातक कोटि बिलाहिं
लघु चिंगारी आग से घास ढेर जरि जाय।




राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि
राग न रोष न दोष दु:ख,सुलभ पदारथ चारि।

काम, क्रोध,मद,लोभ की ज्यों लों मन में खान
तो लों पंडित ,मूरखो तुलसी एक समान।

बिना तेज के पुरुष की अवस अवग्या होय
आग बुझे ज्यों राख को अवस छुए सब कोय।

3 टिप्‍पणियां:

कपिल देशेप्रेमी ने कहा…

अमर कवि संत तुलसी के वचन अत्यंत सुख देने वाले हैं। बहुत अच्छे दोहे संकलित किये हैं। आभार!

arun ने कहा…

महाकवि तुलसी विश्व वंध्य हैं। भगवान राम को पोपुलर बनाने में उनका असीम योगदान रहा है। दोहों का चयन सराहनीय है।

Manish ने कहा…

Adbhut very nice all articles.