26.7.17

ज्योतिष विज्ञान है या कल्पना// Astrology is science or imagination



लोग कहते हैं कि ज्‍योतिष एक कल्पना है, एक झूंठ है| लेकिन उन्हें शायद पता ही नहीं है कि ज्योतिष कल्पना नहीं पूर्ण विज्ञान है, झूठ भी नहीं है पूर्ण सत्य है| ज्योतिष पूरी तरह गणित पर आधारित है, और गणित कभी झूँठा नही हो सकता| झूठे तो ज्‍योतिषी होते हैं| 10 प्रतिशत जानते हैं और 20 प्रतिशत बोलते हैं तो 10 प्रतिशत असत्य तो होना ही है| इसी को लोग कहते हैं कि ज्योतिष झूंठ है| आइऐ आपको दिखाते हैं कि कैसे? कुछ ज्योतिषी कहते हैं कि आप पर शनि की दशा चल रही है और अब आपका अनिष्ठ होना शुरू हो गया है| आप कुछ उपचार कर लें तो आपका यह संकट टल जाएगा| और इसके बाद कुछ उपाय बता देते हैं| आदमी बेचारा जैसे तैसे जोड़ तोड़ कर उस उपाय को करता है, लेकिन अच्छा कुछ भी नहीं होता उल्टे उसकी जेब ज़रूर ढीली हो जाती है| और किसी किसी के साथ कुछ अच्छा हो जाता है तो वह सोंच लेता है कि उस पर से शनि दोष समाप्त हो गया है, और फिर वह उस पंडित या उस ज्योतिषी को दान धन इत्यादि भेंट कर देता है| जबकि सच तो यह है कि पहले पर से शनि की दशा नहीं हटी लेकिन दूसरे पर से हट गई| और यह किसी जप तप या उपाय से नहीं हुआ बल्कि विज्ञान के सर्वमान्य सिद्धांत के कारण हुआ| विज्ञान और ज्योतिष के सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार कोई भी ग्रह हमेशा किसी के ऊपर नहीं रहता बल्कि अपनी चाल के अनुसार अलग अलग राशियों में जाता रहता है| जब एक निश्चित समयानुसार ग्रहों की स्थिति बदलती रहती है तो उपाय करना कहाँ तक उचित है| सच तो यह है कि आकाश में मौजूद 9 ग्रह अपनी अपनी गति से चलते है और गणित के अनुसार एक खास समय पर अलग अलग राशियों में प्रवेश करते हैं| एक खास समय तक उस राशि में रहते हैं और फिर अगली राशि में चले जाते हैं| अलग अलग राशि में उनके अलग अलग प्रभाव होते हैं| कैसे आइए जानते हैं : आचार्य लोंगों ने आकाश को समझने के लिए इसे 12 भागों में बाँट दिया| हर भाग को एक नाम दे दिया जिसे हम राशियों के नाम से जानते हैं| इस प्रकार हम आकाश के 12 भागों को 12 राशियों के नाम से जानते हैं| पूरा सौर मंडल इन्हीं 12 राशियों के अंदर आता है| सूर्य इन्हीं 12 भागों से होकर गुज़रता है| और जब कोई भी ग्रह किसी भी राशि में आता है तो उस पर सूर्य और अन्य ग्रहों की प्रकाश किरणें पड़ने लगती हैं| और ये प्रकाश किरणें प्रकाश के प्रत्यावर्तन सिद्धांतों के अनुसार विभिन्न कोणों से विभिन्न ग्रहों से टकराकर धरती मंडल में प्रवेश करती हैं और उस समय ये प्रकाश किरणें जिस राशि में से होकर धरती मंडल पर आती हैं उस राशि में जन्म पाने वाले लोगों के शरीर में मौजूद लाल रक्त कण उस राशि में प्रवेश कर रहीं राशिष्ठ किरणों को अपने में अवशोषित कर लेती है| और वह प्राणी उस ग्रह के कास्मिक किरणों के प्रभाव में आ जाता है| हर आदमी के शरीर में 12 तरह की किरणें होती हैं| अब अगर किसी के शरीर में 10 पॉइंट किसी खास ग्रह की ज़रूरत है और उसमें 8 पॉइंट ही हैं तो उसे 2 पॉइंट और चाहिए| अब अगर वह 4 पॉइंटस और ले लेगा तो 2 पायंट्स जो ज़्यादा हो जाएगा वह उसे नुकसान ही पहुँचाएगा न कि फायदा| इसी को लोग कहते हैं कि ग्रह दशा खराब हो गई है| अब हमें उपाय करने चाहिए जिससे कि ये 2 पायंट्स समाप्त हो जाएँ| कितने पायंट्स किरणों की ज़रूरत किसे है उसमें कितने पायंट्स उसमें हैं उसे और कितने पायंट्स और चाहिए इसकी जाँच ज्योतिष् और विज्ञान दोनों में है| अतः इसकी जाँच करके ही कोई उपाय करना चाहिए| उपाय भी ज्योतिषियों के नहीं बल्कि ज्योतिष् के करने चाहिए|

नागपंचमी पर ख़ास जानकारी //Important information on Nagpanchami


    नाग पंचमी एक हिन्दू पर्व है जिसमें नागों और सर्पों की पूजा की जाती है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि में यह पर्व पूरे देश में पूर्ण श्रद्धा से मनाया जाता है। इस वर्ष 2017 में नाग पंचमी 27 जुलाई गुरुवार के दिन मनाई जाएगी।
   भारतीय संस्कृति में शिव के गले में सर्प और विष्णु को शेषनाग पर शयन करते हुए दिखाया गया है, जो प्रतीकात्मक रुप से सर्प और नाग के महत्व को उजागर करता है. अमृत सहित नवरत्नों की प्राप्ति के लिए
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं ‘मैं नागों में अनंत (शेषनाग) हूं’. पुराणों में वर्णित है कि धरती शेषनाग के फणों के ऊपर टिकी हुई है.
पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार इस दिन नाग जाति की उत्पत्ति हुई थी. महाभारत की एक कथा के अनुसार जब महाराजा परीक्षित को उनका पुत्र जनमेजय तक्षक नाग के काटने से नहीं बचा सका तो जनमेजय ने विशाल सर्पयज्ञ कर यज्ञाग्नि में भस्म होने के लिए तक्षक को आने पर विवश कर दिया.तब आस्तिक मुनि के आग्रह और तक्षक के क्षमा मांगने उसे क्षमा कर दिया. उन्होंने वचन दिया कि श्रावण मास की पंचमी को जो व्यक्ति सर्प और नाग की पूजा करेगा, उसे सर्प व नाग दोष से मुक्ति मिलेगी.
    सावन के पावन महीने में भगवान शिव की पूजा करना अत्याधिक लाभप्रद होता है। ये बात तो आप सब जानते हैं। लेकिन शिव जी की पूजा से जुड़ी एक विशेष बात यह भी है कि सावन के इसी महीने में नाग पंचमी का भी त्योहार आता है। भगवान शिव में के गले की शोभा बढ़ाते नाग देवता की पूजा का सावन के महीने में बहुत महत्व है। हिंदू धर्म के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन नागों की पूजा करने से सारी मनोकामनाए पूर्ण होती हैं।
     
नाग देवता की पूजा अगर विशेष ढंग से तथा विधिपूर्वक की जाए तो यह ओर भी फलदायक होती है।
नाग पंचमी पर नाग पूजन के मंत्र :- 
* ॐ भुजंगेशाय विद्महे, 
सर्पराजाय धीमहि, 

तन्नो नाग: प्रचोदयात्।।   

दूसरा मंत्र :- 

'सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था ये न्तरे दिवि संस्थिता:।। 
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:। 

ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।'   
 नाग पंचमी के दिन अपने दरवाजे के दोनों ओर गोबर से सर्पों की आकृति बनानी चाहिए और धूप, पुष्प आदि से इसकी पूजा करनी चाहिए। इसके बाद इन्द्राणी देवी की पूजा करनी चाहिए। दही, दूध, अक्षत, जलम पुष्प, नेवैद्य आदि से उनकी आराधना करनी चाहिए। इसके बाद भक्तिभाव से ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करना चाहिए।
   इस दिन पहले मीठा भोजन फिर अपनी रुचि अनुसार भोजन करना चाहिए। इस दिन द्रव्य दान करने वाले पुरुष पर कुबेर जी की दयादृष्टि बनती है। हिंदू धर्म के अनुसार मान्यता है कि अगर किसी जातक के घर में किसी सदस्य की मृत्यु सांप के काटने से हुई हो तो उसे बारह महीने तक पंचमी का व्रत करना चाहिए। इस व्रत के फल से जातक के कुल में कभी भी सांप का भय नहीं होगा
 
वर्तमान में कितना प्रासंगिक है नागपंचमी पर्व
हिन्दू संस्कृति केवल प्राणिमात्र नहीं बल्कि जड़-चेतन, चल-अचल को ईश्वर के रुप में देखता है. प्राचीन काल से पर्वों और उत्सवों को धर्म से जोड़ा गया है. यह यदि प्रत्यक्ष रुप से धार्मिक आस्था में वृद्धि करता है, तो अप्रत्यक्ष रुप से व्यक्ति और समाज को पर्यावरण से जोड़ता है.
    यह संदर्भ सावन माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि मनाए जाने वाले नागपंचमी के लिए और भी ज्यादा प्रासंगिक है. क्योंकि देखा जाए तो वर्तमान समय में सर्पों और नागों को बचाना ज्यादा तर्कसंगत है. कई व्याधियों और रोगों के लिए आज मेडिकल साइंस बहुत हद तक दवाईयों के निर्माण के लिये सांपों और नागों से प्राप्त होने वाले विष पर निर्भर है. इनके जहर की थोड़ी-सी मात्रा अनेक लोगों का जीवन बचानें में उपयोगी है.
भारत आज भी एक कृषि-प्रधान देश है. परंपरागत रुप से यहां वर्षा ऋतु में धान की फसल तैयार की जाती है. इन धान के पौधों को चूहे काट कर नष्ट कर देते है. ये चूहे किसान के शत्रु हैं और चूहों के शत्रु हैं सर्प. सर्प और नाग चूहों भक्षण कर एक संतुलन उत्पन्न करते हैं. सर्पों और नागों की इस पारिस्थितिकीय उपयोगिता के कारण ही प्राचीन काल से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है.

24.7.17

नमस्कार का महत्त्व और लाभ



नमस्कार या प्रणाम करना एक सम्मान है, एक संस्कार है। प्रणाम करना एक यौगिक प्रक्रिया भी है। बड़ों को हाथ जोड़कर प्रणाम करने का वैज्ञानिक महत्व भी है। नमस्कार मन, वचन और शरीर तीनों में से किसी एक के माध्यम से किया जाता है। आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें और जानें क्या है नमस्कार का महत्व और उससे होने वाले लाभ-
लाभ- 
हमारे हाथ के तंतु मस्तिष्क के तंतुओं से जुड़े हैं। नमस्कार करते वक्त हथेलियों को दबाने से या जोड़े रखने से हृदयचक्र और आज्ञाचक्र में सक्रियता आती है जिससे जागरण बढ़ता है। उक्त जागरण से मन शांत और चित्त में प्रसन्नता आती है। साथ ही हृदय में पुष्टता आती है तथा निर्भिकता बढ़ती है।
मनोवैज्ञानिक असर- 
भारत में हाथ जोड़कर नमस्कार करना एक मनोवैज्ञानिक पद्धति है। हाथ जोड़कर आप जोर से बोल नहीं सकते, अधिक क्रोध नहीं कर सकते और भाग नहीं सकते। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें एक मनोवैज्ञानिक दबाव होता है। इस प्रकार प्रणाम करने से सामने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनम्र हो जाता है।
आध्यात्मिक रहस्य : 
दाहिना हाथ आचार अर्थात धर्म और बायां हाथ विचार अर्थात दर्शन का होता है। नमस्कार करते समय दायां हाथ बाएं हाथ से जुड़ता है। शरीर में दाईं ओर झड़ा और बांईं ओर पिंगला नाड़ी होती है। ऐसे में नमस्कार करते समय झड़ा, पिंगला के पास पहुंचती है और सिर श्रृद्धा से झुका हुआ होता है।
हाथ जोड़ने से शरीर के रक्त संचार में प्रवाह आता है। मनुष्य के आधे शरीर में सकारात्मक आयन और आधे में नकारात्मक आयन होते हैं। हाथ जोड़ने पर दोनों आयनों के मिलने से ऊर्जा का प्रवाह होता है। जिससे शरीर में सकारात्मकता का समावेश होता है। किसी को प्रणाम करने के बाद आशीर्वाद की प्राप्ति होती है और उसका आध्यात्मिक विकास होता है।
नमस्कार भी 2 तरह का होता है। हृदय नमस्कार- जिसमें दोनों हाथों को अनाहत चक्र (सीने पर) रखा जाता है, आंखें बंद की जाती हैं और सिर को झुकाया जाता है। दूसरा, मस्तक नमस्कार- जिसमें हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर नमस्ते किया जाता है।

बौद्ध धर्म की प्रमुख 22 बातें //22 leading facts of Buddhism


गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में हुआ था। इन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना महात्मा बुद्ध ने की थी। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ की मां का नाम महामाया और पिता का नाम शुद्धोदन था। माता के देहान्त के बाद इनका लालन-पालन इनकी मौसी गौतमी ने किया।
गौतम बुद्ध और बौ द्ध धर्म से जुड़े कुछ रोचक तथ्य...
1.गौतम बुद्ध का विवाह यशोधरा नामक कन्या से हुआ था, जिससे इन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम राहुल था।
2. बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में ज्ञान प्रकाश की तृष्णा को तृप्त करने के लिए घर त्याग दिया, जिसे बौद्ध धर्म ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।
3. गौतम बुद्ध को 35 वर्ष की अवस्था में गया के निकट निरंजना नदी के किनारे एक पीपल के पेड़ के नीचे 49वें दिन ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। बौद्ध ग्रंथों में इनके ज्ञान प्राप्ति को निर्वाण कहा गया है।
4. वारणसीके निकट सारनाथ में महात्मा बुद्द ने अपना पहला उपदेश पांच पंडितों, साधुओं को दिया, जो बौद्ध परंपरा में धर्मचक्रप्रवर्तन के नाम से विख्यात हैं।
5. महात्मा बुद्ध का देहावसान अस्सी वर्ष की आयु में 483 ई.पू. में वर्तमान उत्तरप्रदेश के कुशीनगर(देवरिया जिले में स्थित) में हुआ था। इसे बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण के नाम से जाना जाता है।
6. बौद्ध धर्म का मूलाधार चार आर्य सत्य हैं। ये चार आर्य सत्य हैं- दुःख, दुःख समुदाय, दुःख निरोध और दुःख निरोध-गामिनी-प्रतिपदा(दुःख निवारक मार्ग) यानी अष्टांगिक मार्ग।
7. दुःख को हरने वाले और तृष्णा का नाश करने वाले आर्य अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग हैं। उन्हें मज्झिम प्रतिपदा यानी मध्यम मार्ग भी कहते हैं।
8. अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र कहा गया।

9. महात्मा बुद्ध ने तपस्स एवं मल्लक नाम के दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम अनुयायी बनाया।
10. बुद्ध ने अपने जीवन में सर्वाधिक उप देश कौशल देश की राजधानी श्रावस्ती में दिए। उन्होंने मगध को भी अपना प्रचार केंद्र बनाया।
11. बुद्ध के प्रधान शिष्य उपालि व आनंद थे। सारनाथ में ही बौद्ध संघ की स्थापना हुई।
12. बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है। वास्तव में बुद्ध ने ईश्वर के स्थान पर मानव प्रतिष्ठा पर ही बल दिया।
13. बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा का विरोध करता है।
14. बौद्धों के लिए महीने के 4 दिन अमावस्या, पूर्णिमा और दो चतुर्थी दिवस उपवास के दिन होते थे।
15. बौद्धों का सबसे पवित्र एवं महत्वपूर्ण त्योहार वैशाख की पूर्णिमा है, जिसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
16. बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं- हीनयान और महायान।
17. हीनयान सम्प्रदाय के लोग श्रीलंका, म्यांमार और जावा आदि देशों में फैले हुए हैं।
18. वर्तमान में महायान सम्प्रदाय के लोग तिब्बत, चीन, कोरिया, मंगोलिया और जापान में हैं।
19. बौद्ध धर्म की एक और शाखा व्रजयान प्रचलित हुई 7वीं शताब्दी आई यह शाखा तंत्र-मंत्र से युक्त है। जिसका प्रमुख केंद्र भागलपुर जिला(बिहार) में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय था।
20. गौतम बुद्ध के अस्थि अवशेषो पर भट्टि(द.भारत) में निर्मित प्रचीनतम स्तूप को महास्तूप की संज्ञा दी गई है।
21. बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत त्रिपिटक में संग्रहीत हैं। ये क्रमशः सुत्त पिटक, विनय् पिटक और अभिधम्म पिटक के नाम से जाने जाते हैं।
22. महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा( मूल रूप में मागधी) में दिए थे।

भगवान शिव से जुडी विशेष जानकारी


भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-
 भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग?
भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता। नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।
शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं। भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्मी त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।


भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों?

त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा?
भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना। यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।
* भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर?

देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे। यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।
क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?

भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

 
साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।


* क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा?

भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।
भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी?

भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का। भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।
कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय?

शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का। यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।
भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र?

 
शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।
 क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण?
शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोडऩे लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है। दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।
क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें?

धर्म ग्रंथों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस ज़रुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र का स्थान है। यह आज्ञा चक्र ही विवेक बुद्धि का स्रोत है। यही हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।

23.7.17

विवाहित महिला सिंदूर क्यूँ लगाती हैं ?


     हिन्दू धर्म में सिंदूर का बहुत खास महत्व है। यह एक महिला के लिए उसके सुहाग की निशानी होती है। हम जब  भी कभी किसी शादीशुदा औरत को देखते हैं तो उसके माथे पर सिंदूर जरूर लगा दिखता है। एक शादीशुदा औरत को सिंदूर के बिना अधूरा माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में सिंदूर का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सिंदूर लगाने के पीछे के कारणों को जानने का प्रयास किया है। इस सिंदूर को ना केवल शादी के प्रतीक के रूप में लगाया जाता है बल्कि इसे लगाने के पीछे और भी कई कारण हैं जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं।
* परंपरागत रूप से यह पति की लंबी उम्र सुनिश्चित करने के लिए लगाया जाता है
हिंदू समाज में जब भी किसी लड़की की शादी होती हैं तो उसके लिए सिंदूर लगाना बहुत जरूरी होता है। माना जाता है कि शादीशुदा महिला का सिंदूर लगाना उसके पति की लंबी उम्र की कामना का प्रतीक होता है। यही वजह है कि विधवा औरतें अपनी मांग में सिंदूर नहीं लगती हैं।
* लाल रंग शक्ति का प्रतीक माना जाता है
भारतीय पौराणिक कथाओं में लाल रंग के माध्यम से सती और पार्वती की ऊर्जा को व्यक्त किया गया है। सती को हिन्दू समाज में एक आदर्श पत्नी के रूप में माना जाता है। जो अपने पति के खातिर अपने जीवन का त्याग सकती है। हिंदुओं का मानना है कि सिंदूर लगाने से देवी पार्वती ‘अखंड सौभागयवती’ होने का आशीर्वाद देती हैं।<  

*सिंदूर देवी लक्ष्मी के लिए सम्मान का प्रतीक माना जाता है
*यह कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर पांच स्थानों पर रहती हैं और उन्हें हिन्दू समाज में सिर पर स्थान दिया गया है। जिसके कराण हम माथे पर कुमकुम लगा कर उन्हें समान देते हैं। देवी लक्ष्मी हमारे परिवार के लिए अच्छा भाग्य और धन लाने में मदद करती हैं।
*सिंदूर औरत को शांत और स्वस्थ रखने में मदद करता है
*वैज्ञानिक दृष्टि से अगर देखें तो एक औरत जब सिंदूर लगाती है तो वह सिंदूर उसके मन को शांत रखने में मदद करता है। इतना ही नहीं सिंदूर से उसका स्वास्थ भी अच्छा बना रहता है।
*सिंदूर रक्तचाप को नियंत्रित करता है और सेक्स की इच्छा को भी बढ़ाता है
सिंदूर के माध्यम से रक्तचाप भी नियंत्रित रहता है। इसके साथ ही यह महिलाओं में सेक्स की इच्छा को बढ़ाने में भी मदद करता है। सिंदूर के माध्यम से महिलाओं की पिट्यूटरी ग्रंथियां स्थिर रहती हैं।
यह उत्तरी भारत में एक सांस्कृतिक प्रथा है
*आप इस बात को तो जानते ही होंगे की सिन्दूर केवल उत्तरी भारत में ही लगाया जाता है। उत्तर भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाली हर महिला शादी के बाद सिंदूर जरूर लगाती है। जबकि दक्षिण भारत में सिंदूर लगाने की प्रथा नही है।
*यह महत्वपूर्ण होता है कि पति अपनी पत्नी की मांग में सिंदूर लगाए
*हिन्दू धर्म में नवरात्र और दीवाली जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों के दौरान पति के द्वारा अपनी पत्नी की मांग में सिंदूर लगाना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह उनके एक साथ रहने का प्रतीक होता है और इससे वो काफी लंबे समय तक एक साथ रहते हैं।

22.7.17

क्या बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच कोई समानता का आधार है?


क्या बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच कोई समानता का आधार है?
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन, बर्लिन, जर्मनी, जनवरी 2011
सैद्धान्तिक दृष्टिकोण
किन्हीं दो धार्मिक या दार्शनिक सिद्धान्तों के बीच सहमति के आधार तलाश करने में अनेक कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ निहित होती हैं। एक प्रमुख कठिनाई इस बात को लेकर होती है कि धर्मों की तुलना के सैद्धान्तिक विषय के प्रति कौन सा सैद्धान्तिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। मैं यहाँ ईसाई धर्मशास्त्र में ऐसी तुलनाओं के वर्गीकरण की एक व्यवस्था का उल्लेख करना चाहूँगा, जिसकी रूप रेखा क्रिस्टिन बीज़ किब्लिंगर ने अन्य धर्मों के प्रति बौद्ध दृष्टिकोण में प्रकाशित लेख “अन्य धर्मों के प्रति बौद्ध रवैया: प्रकार, उदाहरण, विचार” में प्रस्तुत की है।
इस लेख में किब्लिंगर ने तीन दृष्टिकोणों की रूपरेखा प्रस्तुत की है: एकान्तिकतावाद, समावेशवाद, और बहुलतावाद।
एकान्तिकतावादी दृष्टिकोण यह है कि केवल एक धर्म ही मुक्ति का मार्ग दिखा सकता है। हो सकता है कि दूसरे धर्म भी हमारे धर्म की ही भांति समान विषयों की व्याख्या करते हों, लेकिन उनका दृष्टिकोण गलत है। बहुत से बौद्ध ग्रंथों में न केवल गैर-बौद्ध विचारों के बारे में, बल्कि अन्य बौद्ध धारणाओं के बारे में भी यही दृष्टिकोण अपनाया गया है।
समावेशवादी दृष्टिकोण के अनुसार मुक्ति के मार्ग अनेक हैं, किन्तु एक मार्ग अन्य मार्गों से श्रेष्ठ है। दूसरे शब्दों में, अन्य धर्मों के विचार हमारे समान हो सकते हैं, और हालाँकि ये सभी विचार मान्य हैं, किन्तु हमारे विचार उनके विचारों से बेहतर हैं। विभिन्न तिब्बती परम्पराओं के कुछ अनुयायी दूसरी तिब्बती परम्पराओं के प्रति ऐसा दृष्टिकोण रखते हैं ─ सभी परम्पराएं ज्ञानोदय की दिशा में ले जाती हैं, किन्तु हमारी परम्परा सर्वश्रेष्ठ है।
बहुलतावादी दृष्टिकोण के अनुसार मुक्ति के अनेक मार्ग हैं, और उनमें से कोई भी मार्ग दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ नहीं है। यह एक असम्प्रदायवादी दृष्टिकोण है, जो विभिन्न धर्मों के अलग-अलग मतों को केवल प्रस्तुत करता है, किन्तु उनका पदक्रम निर्धारण नहीं करता है।
समावेशवादी और बहुलतावादी दृष्टिकोणों में भी इस आधार पर भेद हैं कि आप भिन्नताओं को किस सीमा तक स्वीकार करते हैं और इन भिन्नताओं के प्रभाव को कितना गहरा मानते हैं।
पहली श्रेणी का भेद समानताओं पर बल देता है, और हालाँकि इसमें भिन्नताओं को स्वीकार किया जाता है, लेकिन इसमें भिन्नताओं को समानताओं, समतुल्यताओं, या महत्वहीन गौण विषयों के रूप में प्रस्तुत करके उनके महत्व को कम करके प्रदर्शित किया जाता है। यह दृष्टिकोण मानता है कि दूसरे धर्म भी वही कर रहे हैं जो हम करते हैं, बस उनका तरीका अलग है ─ एक प्रकार से वे हमारे ही धर्म का पालन कर रहे हैं, केवल उन्हें इस वास्तविकता का बोध नहीं है। गेलुग द्वारा गेलुग अनुत्तरयोग सिद्धांत की दृष्टि से निंग्मा जोगचेन का स्पष्टीकरण दिया जाना इसका उदाहरण है।
दूसरी श्रेणी का दृष्टिकोण वास्तविक भिन्नताओं का सम्मान करता है, और फिर चाहे वह अपने धर्म को श्रेष्ठ मानता हो या न मानता हो, संवाद को वह एक-दूसरे को समझने की दिशा में प्रगति के महत्वपूर्ण प्रेरक के रूप में देखता है।
पहले प्रकार के दृष्टिकोण (वे दरअसल वही बात कह रहे हैं जो हम कहते हैं, बस कहने का ढंग थोड़ा अलग है) के बारे में खतरा यह होता है कि यह दृष्टिकोण भ्रांत महत्ता-बोध, अहंकार और आत्ममोह का रूप ले सकता है ─ यह दृष्टिकोण मान कर चलता है कि दूसरों के धर्म का वास्तविक अर्थ हमें उनसे बेहतर मालूम है। इसका समावेशी स्वरूप, जो यह मानता है कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है, यह रूप धारण कर सकता है कि दूसरा धर्म दरअसल हमारे ही लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, बस उसे इसकी जानकारी नहीं है। या, वे लोग हमारे ही धर्म के किसी निचले सोपान पर हैं। इस प्रकार के दृष्टिकोणों में ऐसा कुछ नहीं है जो हम उनसे सीख सकें, बल्कि वे ही हमसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसकी उपश्रेणियाँ इस प्रकार हैं:
सभी या अधिकांश धर्म एक ही लक्ष्य की दिशा में बढ़ रहे हैं; और हालाँकि उनका मार्ग हमारे मार्ग के जैसा उत्तम नहीं है, अन्ततः उनका मार्ग भी स्वाभाविक रूप से उसी लक्ष्य तक ले जाएगा जहाँ हमारा मार्ग पहुँचता है।
उन्हें अन्ततः हमारा वह मार्ग दिखाए जाने की आवश्यकता होगी जिस पर चल कर हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और जिसे वे भी प्राप्त करना तो चाहते हैं, लेकिन यदि वे अपने ही मार्ग पर चलते रहे तो प्राप्त नहीं कर सकेंगे। बौद्ध धर्म में इसका एक उदाहरण अनुत्तरयोग तंत्र के इस दावे के रूप में मिलता है कि सूत्र या निम्न तंत्र आपको केवल दसवे स्तर के भूमिचित्त (दशम भूमि) की अवस्था तक पहुँचने का मार्ग ही दिखा सकते हैं, किन्तु वास्तव में ज्ञानोदय के स्तर तक पहुँचने के लिए अनुत्तरयोग की विधियों के प्रयोग की आवश्यकता होती है।
पहले प्रकार के समावेशवाद (जो भिन्नताओं को गौण मानते हुए उन्हें दरअसल समानताओं के रूप में देखता है) के अन्य स्वरूप इन कथनों के रूप में हैं कि:
शब्द, अवधारणाएं और सिद्धान्त ध्यानानुभूतियों की सटीक व्याख्या नहीं करते हैं, और सभी धर्म एक ही अनुभूति की बात करते हैं।
सभी धर्मों के मूल सिद्धान्त या मूल कथन एक समान हैं, और भिन्नताएं केवल सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती हैं। भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, जापान, तिब्बत आदि देशों में बौद्ध धर्म के विभिन्न रूपों का चित्रण इसका एक उदाहरण हैं।
इसके अलावा जब हम बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच आपसी सहमति के सम्भावित आधारों की तलाश करते हैं, तो यह तलाश धर्मान्तरण के विषय पर भी विचार करती है।
एकान्तिकवादी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यदि केवल हमारा धर्म ही सच्चा है तो फिर आपकी मुक्ति तभी हो सकेगी जब आप अपने धर्म का त्याग करके हमारे धर्म को अपना लें।
समावेशवादी दृष्टिकोण के अनुसार इस बात में कोई आपत्ति नहीं है कि आप अपने धर्म का पालन करते रहें, क्योंकि आपका धर्म दरअसल हमारे धर्म का ही एक निम्नतर स्वरूप है, और अन्त में आप स्वाभाविक तौर पर हमारे दृष्टिकोण को जान ही लेंगे (उदाहरण के लिए अनुत्तरयोग की साधना करने वाले चित्तमात्र साधक सम्पन्न क्रम अवस्था की साधना की चित्त विलगन अवस्था में पहुँचते ही स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक बन जाएंगे), या फिर अन्त में हमें आपका धर्मान्तरण करना पड़ेगा।
बहुलतावादी दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक धर्म अपने एक चरम लक्ष्य की ओर ले जाता है, और वे सभी श्लाघ्य हैं ─ इसके दो भिन्न रूप हैं: लक्ष्य समतुल्य हैं; या लक्ष्य समतुल्य नहीं हैं ─ और कोई भी धर्म दूसरों की तुलना में श्रेष्ठतर नहीं है। इसलिए धर्मान्तरण की आवश्यकता उत्पन्न नहीं होती है। इसका आशय यह होगा कि यदि आप बौद्ध परम्पराओं का पालन करते हैं तो आप बौद्धों के स्वर्ग में जाएंगे, मुसलमानों की जन्नत में नहीं; और यदि आप मुस्लिम परम्पराओं का पालन करते हैं तो फिर आप मुसलमानों की जन्नत में जाएंगे, बौद्धों के स्वर्ग में नहीं।
जहाँ तक दूसरे प्रकार के समावेशवाद और बहुलतावाद (जो धर्मों के बीच की आपसी भिन्नताओं का सम्मान करता है, और साथ ही यह भी स्वीकार करता है कि सभी धर्म मान्य हैं, चाहे कोई धर्म अपने आपको श्रेष्ठतर मानता हो या न मानता हो) का प्रश्न है, यहाँ एक नाज़ुक मुद्दा यह है कि दूसरे धर्म के मत को किस प्रकार समझा जाए और फिर अपने धर्म के साथ उसकी तुलना किस प्रकार की जाए।
क्या आप किसी धर्म को केवल उसी के नज़रिए से देख कर समझ सकते हैं, या फिर क्या आपको उस धर्म में कही गई बातों को समझने के लिए उन्हें अपनी मान्यताओं की कसौटी पर कसना पड़ता है?
यदि आप दूसरा वाला विकल्प (दूसरों के धर्म के दावों को समझने योग्य बनाने के लिए उन्हें अपनी मान्यताओं की कसौटी पर कसना) अपनाते हैं, तो क्या आप इस कार्य को कुछ इस प्रकार कर सकते हैं कि यह दृष्टिकोण पहले प्रकार के दृष्टिकोण में परिवर्तित या अवक्रमित न हो, जिसके आधार पर आप कहते हैं कि उनकी मान्यताएं आपकी अपनी मान्यताओं का ही परिवर्तित रूप हैं?

वहीं दूसरी ओर यदि आप बौद्ध धर्म और इस्लाम जैसे दो धर्मों के बीच समानता के मुद्दों या विषयों की पहचान कर सकते हैं, तो फिर भले ही आपको इन विषयों और दूसरे धर्म के दृष्टिकोण को अपनी मान्यताओं के वैचारिक ढांचे की सहायता से व्यक्त करने की आवश्यकता पड़े, आप फिर भी उस धर्म से सम्बंधित भिन्नताओं को समझ पाएंगे और उनका सम्मान कर पाएंगे। तब आप इस बात का दावा किए बिना कि आपका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है और दूसरे धर्म के प्रति श्रेष्ठता का बनावटी भाव प्रदर्शित किए बिना एक सहिष्णु आलोचना-मुक्त दृष्टिकोण से भिन्नताओं का सम्मान कर सकेंगे। इस प्रकार की समझ-बूझ और आदर भाव के आधार पर ही आप धार्मिक सौहार्द की स्थापना कर सकते हैं।
परम पावन दलाई लामा यही दृष्टिकोण अपनाते हैं। जब उनसे प्रश्न पूछा गया कि “कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है?” तो परम पावन ने उत्तर दिया, “ऐसी मान्यताएं और कर्मप्रवृत्तियाँ जो आपको अधिक दयालु, अधिक करुणाशील बनाने में सहायक हो।“
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
बौद्ध धर्म के प्रति मुसलमानों का ऐतिहासिक दृष्टिकोण
अब हम विशेष रूप से बौद्ध धर्म और इस्लाम के विषय में चर्चा करेंगे। इस्लाम के विषय पर किए गए मेरे अपने शोध के अलावा मैंने रज़ा शाह काज़मी की पुस्तक इस्लाम तथा बौद्ध धर्म के बीच परस्पर सहमति का आधार, जिसके लिए परम पावन दलाई लामा और जॉर्डन के युवराज गाज़ी बिन मुहम्मद ने प्रस्तावनाएं लिखी हैं, से भी जानकारी ली है। मैंने क़ुरान के संगत उद्धरणों को विशेष तौर पर डॉ. काज़मी की पुस्तक से लिया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से मुसलमानों और बौद्धों (और यहाँ हम अपनी चर्चा को बौद्ध धर्म की भारतीय-तिब्बती परम्पराओं तक ही सीमित रखेंगे), दोनों ही समुदायों ने समावेशवादी दृष्टिकोण को अपनाया है। उदाहरण के लिए, मुसलमानों ने बौद्धों को यहूदियों, ईसाइयों और ज़रदुश्त धर्मानुयायियों की श्रेणी में शामिल किया। लेकिन यह सब हुआ कैसे?
उमय्यद खलीफ़ाओं के शासन काल (661-750 ईसवी) में अरबों ने अपने शासन और अपने धर्म, इस्लाम का विस्तार पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र में कर दिया। इस प्रकार आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में उमय्यद सेनापति मुहम्मद बिन क़ासिम ने बौद्ध बाहुल्य वाले सिंध क्षेत्र , जो वर्तमान दक्षिणी पाकिस्तान में है, पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इस क्षेत्र के एक प्रमुख शहर ब्राह्मणाबाद के बौद्धों और हिन्दुओं ने अपने मन्दिरों का पुनर्निर्माण करने और अपनी धार्मिक स्वतंत्रता को कायम रखने की अनुमति दिए जाने का आग्रह किया। सेनापति क़ासिम ने इस सम्बंध में वहाँ के शासक हज्जाज बिन यूसुफ से परामर्श किया, और हज्जाज ने आगे मुस्लिम धार्मिक पदाधिकारियों से मशवरा किया। धार्मिक पदाधिकारियों ने घोषणा की कि बौद्ध (और हिन्दू भी) ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायी हैं, इस घोषणा को बाद में “ब्राह्मणाबाद समझौते” का नाम दिया गया।
उमय्यद शासक हज्जाज ने अपने हुक्मनामे में कहा: “बौद्ध तथा दूसरे मन्दिरों के निर्माण, और धार्मिक मामलों में सहिष्णुता के बारे में ब्राह्मणाबाद के मुखियाओं का अनुरोध न्यायसंगत और वाजिब है। मुझे नहीं लगता कि सामान्य करों को वसूल करने के अलावा उनके ऊपर हमारे कोई और अधिकार वाजिब हैं। उन्होंने हमारे प्रति सम्मान प्रकट किया है और खलीफा को एक निश्चित राशि व्यक्ति कर (जज़िया) के रूप में भुगतान करने का वचन दिया है। अब चूँकि वे हमारे संरक्षण में रहने वाली प्रजा बन चुके हैं, इसलिए हमें उनके जीवन और सम्पत्ति में किसी भी प्रकार का दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें अपने धर्म का पालन करने की इजाज़त दी जाए। कोई भी उन्हें बाधित न करे।“

बाद में बौद्धों को अपने मन्दिरों और मठों का पुनर्निर्माण करने की अनुमति दे दी गई और उन्हें व्यक्ति कर का भुगतान करते रहने की शर्त पर गैर-मुस्लिम संरक्षित प्रजा का दर्जा दे दिया गया। उमय्यद खलीफ़ाओं ने और फिर बाद के समय में बगदाद से शासन करने वाले अब्बासी खलीफ़ाओं (750-1258 ईसवी) ने और भारत के उत्तरवर्ती मुस्लिम शासकों ने सैद्धान्तिक रूप से इसी नीति को अपनाया, हालाँकि ऐसा नहीं है कि सभी शासकों या सेनापतियों ने हमेशा ही इस नीति का पालन किया हो। फिर भी, इस निर्णय का निहितार्थ यह है कि बौद्ध धर्म को उन मूर्तिपूजक बहुदेववादी धर्मों के समरूप नहीं समझा गया जिनके अनुयायियों को ये विशेष अधिकार नहीं दिए गए थे।
अब आप तर्क दे सकते हैं कि बौद्धों को कानूनी मान्यता दिए जाने का निर्णय धार्मिक कारणों पर कम और राजनैतिक कारणों पर अधिक आधारित था, और इसका स्रोत सूक्ष्म दार्शनिक विश्लेषण से कहीं अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण था। शायद ऐसा था भी। बौद्ध और हिन्दू मन्दिरों के पुनर्निर्माण के बाद अरब शासकों ने इन मन्दिरों में पूजा-उपासना के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों से कर वसूलना शुरू कर दिया। लेकिन फिर भी, इस्लामी विद्वानों ने इस “व्यावहारिक” नीति को न तो उस समय इस्लाम के मूलभूत धर्मतत्व-विषयक सिद्धान्त के उल्लंघन या उसके साथ समझौते के रूप में देखा, और न आज ही देखते हैं। बौद्धों को कानूनी मान्यता, राजनैतिक संरक्षण और धार्मिक सहिष्णुता की सुविधा प्रदान किए जाने से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बौद्ध आध्यात्मिक मार्ग और धर्मसंहिता किसी उच्चतर सत्ता अर्थात, सच्ची ईश्वरोक्ति से उद्भूत है।
बौद्धों को ईश्वरप्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायियों का दर्जा दिए जाने का आधार क्या था? क्या यह निर्णय केवल साझी पूजा-पद्धतियों के आधार पर लिया गया? उदाहरण के लिए, आठवीं शताब्दी की शुरुआत में ईरानी इतिहासकार अल-किरमानी ने बल्ख, अफागानिस्तान के नव विहार मठ का विस्तार से वर्णन किया है और इस्लाम धर्म के साथ समानता की दृष्टि से कुछ बौद्ध रीति-रिवाज़ों का ब्यौरा लिखा है। मठ का वर्णन करते हुए उसने लिखा है कि मुख्य मन्दिर के केन्द्र में एक वर्गाकार पत्थर था, जो कपड़े से लिपटा था, श्रद्धालु उसकी परिक्रमा करते थे और साष्टांग प्रणाम करते थे, जैसा कि मक्का स्थित काबा में किया जाता है। लेकिन उसने किसी भी प्रकार की बौद्ध मान्यताओं का वर्णन नहीं किया है।
तो क्या बौद्धों को ईश्वरप्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायी घोषित किए जाने का कोई सैद्धान्तिक आधार है? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि बौद्धों को ईश्वरप्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायियों के रूप में मान्यता दी गई है, तो निहितार्थ में उन्हें ऐसे समुदायों की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है जिनका “उद्धार” किया जा चुका है, इसी भाव को क़ुरान (2:62) के इस छंद में व्यक्त किया गया है: “निस्संदेह ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई, जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और अच्छा कर्म किया तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे।“
 

क़ुरान के अनुसार ईश्वर में विश्वास और निर्णय के अन्तिम दिन में विश्वास और नेक तथा सकारात्मक कृत्य करने में विश्वास ─ यही बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच परस्पर सहमति के आधार को दर्शाता है। विचार एकदम समान भले ही न हों, लेकिन इस्लाम उन्हें कम से कम इतना समान तो मानता है कि उन्हें अविरुद्ध कहा जा सके। जैसा कि क़ुरान (2:137) में उल्लेख आता है: “फिर यदि वे उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह तुम लाए हो, तो उन्होंन मार्ग पा लिया।“ और यह दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर समावेशवादी है। बौद्ध भी इस्लाम में सिखाई गई मुक्ति की मंज़िल तक पहुँचेंगे, क्योंकि वे भी उसी प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर, ईश्वर द्वारा उद्घाटित धर्म, रोज़े आख़िरत, सत्य की एकात्मता, आदि जैसी अवधारणाओं के दायरे में कौन-कौन सी बातें आती हैं। मुस्लिम और बौद्ध दोनों ही पक्षों की ओर से कुछ ऐसे धार्मिक पदाधिकारी हैं जो इन अवधारणाओं को बड़े कठोर ढंग से परिभाषित करते हैं। लेकिन कुछ ने इन परिभाषाओं में बहुत गुंजाइश भी छोड़ी है।
इस्लाम के प्रति बौद्धों का ऐतिहासिक दृष्टिकोण
इन अवधारणाओं के दायरों की जाँच करने से पहले हम इस्लाम के प्रति बौद्धों के दृष्टिकोण के इतिहास की चर्चा करेंगे। संस्कृत भाषा में लिखा गया कालचक्र तंत्रसाहित्य, जिसकी रचना ईसा की दसवीं शताब्दी के अन्तिम और ग्यारहवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में सम्भवतः दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान और उत्तरी पाकिस्तान के क्षेत्र में की गई एकमात्र ऐसी बौद्ध ग्रंथ परम्परा है जिसमें किसी प्रकार की इस्लामी प्रथाओं या मान्यताओं का थोड़ा बहुत उल्लेख किया गया है। उस समय इस क्षेत्र के बौद्धों के सामने मध्य पाकिस्तान स्थित मुल्तान के शासकों द्वारा आक्रमण किए जाने का खतरा मंडरा रहा था। मुल्तान के शासक इस्लाम के एक उप-सम्प्रदाय इस्माइली शिया के तौर-तरीकों को मानते थे। उधर मुल्तान मिस्र के फ़ातिमी खलीफ़ाओं के साथ मिल कर मुस्लिम जगत पर आधिपत्य जमाने के लिए अरब के अब्बासियों के साथ होड़ कर रहा था। दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान और उत्तरी पाकिस्तान में रहने वाले बौद्ध और हिन्दू अपने आप को इस दुश्मनी के बीच फँसा हुआ पा रहे थे।
कालचक्र ग्रंथों में सम्भावित आक्रान्ताओं की कुछ मान्यताओं और रीति-रिवाज़ो का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में वर्णित कुछ मान्यताएं जैसे पैगम्बरों की सूची, उस समय प्रचलित इस्माइली चिन्तन से विशिष्ट रूप से सम्बंधित हैं; जबकि कुछ मान्यताएं उस चिन्तन का खण्डन करती हैं, जैसे कि मानी धर्म के संस्थापक मानी के नाम को उस सूची में शामिल किया जाना। लेकिन कुल मिलाकर इनमें से ज़्यादातर मान्यताएं इस्लाम की बुनियादी मान्यताएं ही हैं। कुछ मान्यताएं नैतिक आचरण से सम्बंधित हैं और बौद्धों के नैतिक आचरण सम्बंधी विचारों को प्रतिध्वनित करती हैं, हालाँकि इस साहित्य में उन्हें समान परम्पराओं के रूप में नहीं दर्शाया गया है। किन्तु इन बातों को दोनों धर्मों के बीच समानता का आधार माना जा सकता है। उदाहरण के लिए श्रीकालचक्र-तंत्रोत्तरतंत्र हृदय में कहा गया है: “उनकी एक ही जाति है, वे चोरी नहीं करते, और सत्य भाषण करते हैं। वे स्वच्छताप्रिय हैं, परस्त्रीगमन से दूर रहते हैं, तपश्चर्या करते हैं, और अपनी पत्नियों के प्रति निष्ठावान रहते हैं।
अन्यत्र, हमें समावेशवादी दृष्टिकोण के कुछ और उदाहरण वहाँ देखने के लिए मिलते हैं जहाँ कालचक्र ग्रंथ आक्रान्ताओं की मान्यताओं का वर्णन बौद्ध नज़रिए से करते हैं। उदाहरण के लिए लघु कालचक्र तंत्र राज में कहा गया है: “जन्म लेने वाली सभी जंगम या स्थावर वस्तुएं सृष्टिकर्ता द्वारा सृजित हैं। उसे प्रसन्न करने से , जोकि कि तायी लोगों की मुक्ति का कारण है, स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मनुष्यों के लिए रहमान की यही शिक्षा है।“ कालचक्र ग्रंथों में आक्रान्ताओं के लिए “तायी” शब्द का प्रयोग अरबी भाषा के शब्द ताज़ी के अर्थ में ईरान पर आक्रमण करने वाले अरब आक्रान्ताओं के लिए किया गया है। “रहमान” अर्थात करुणावान अल्लाह के लिए प्रयुक्त एक विशेषण है।
पुंडरीक ने विमलप्रभा नामक लघु कालचक्र तंत्र राज टीका में इस छंद की व्याख्या करते हुए लिखा है, “जहाँ तक तायी आक्रान्ताओं की मान्यताओं का प्रश्न है, जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की प्रत्येक परिघटना का सृष्टिकर्ता रहमान है। तायी लोग अर्थात श्वेत वस्त्रधारी आक्रान्ताओं की मुक्ति का कारण रहमान को प्रसन्न करना है, और इससे निश्चित तौर पर मनुष्यों को उच्चतर श्रेणी में पुनर्जन्म (स्वर्ग में) मिलता है।  

उसे प्रसन्न न करने पर नरक (में पुनर्जन्म) भोगना पड़ता है। यही रहमान की शिक्षा है, तायी लोगों की मान्यता है।“
पुंडरीक आगे व्याख्या करते हैं: “मृत्यु के बाद मनुष्य रहमान के निर्णय से उच्चतर पुनर्जन्म (स्वर्ग) में सुख या नरक में दुख भोगते हैं।“
यहाँ बौद्ध धर्म और इस्लाम के प्रति बौद्धवादी दृष्टिकोण में समानता मनुष्य के नैतिक आचरण के आधार पर स्वर्ग या नरक में पुनर्जन्म की दृष्टि से है। इन अंशों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि कालचक्र ग्रंथों में न तो सृष्टिकर्ता के बारे में और न ही इस आधार पर सृष्टिकर्ता की भूमिका के दावों के बारे में टिप्पणी की है कि सृष्टिकर्ता इस आधार पर मनुष्य के परवर्ती जीवन के बारे में निर्णय करता है कि उस मनुष्य ने सृष्टिकर्ता को प्रसन्न किया है या नहीं। किन्तु इस आखिरी बिन्दु पर, कि अल्लाह इस आधार पर निर्णय करता है कि किसी ने उसे प्रसन्न किया है या नहीं, बौद्धवादी दृष्टिकोण की प्रस्तुति उचित नहीं है। हदीस(हज़रत मुहम्मद के निजी कथन) के अनुसार अल्लाह ने कहा, “मेरे बन्दो, मैं तो तुम्हारे कर्मों को परखता हूँ और फिर उसके आधार पर फल देता हूँ।“
जो भी हो, कालचक्र ग्रंथ केवल परवर्ती जीवन के स्वरूप और परवर्ती जीवन पर मनुष्य के इस जीवन के सामान्य कर्मों के प्रभाव की ही बात करते हैं। परवर्ती जीवन के विषय को इस दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए कालचक्र ग्रंथ एक समावेशवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए आक्रान्ताओं के अनन्त पुनर्जन्मों के दावे को एक गलत दृष्टिकोण बताते हैं जिसे बौद्ध धर्म में कहीं अधिक सटीकता से समझाया गया है। लघु कालचक्र तंत्र राज कहता है: “(अनन्त) परवर्ती जीवन से गुज़रते हुए मनुष्य संसार में अपने पुराने कर्मों (के परिणामों) को भोगता है। यदि ऐसा होता, तो एक जन्म से दूसरे जन्म तक मनुष्य के कर्मों का हिसाब कभी खत्म न होता। संसार से कभी मुक्ति सम्भव न होती और अनन्त अस्तित्व की दृष्टि से भी कभी मुक्ति न होती। निःसंदेह यह दृष्टिकोण तायी लोगों में पाया जाता है, हालाँकि दूसरे समुदाय इसका खण्डन करते हैं।“
यदि हम अनन्त नरकदण्ड को व्यापक बौद्ध संदर्भ में देखें तो बौद्ध तथा मुस्लिम दृष्टिकोणों के बीच समानता का दायरा थोड़ा और बढ़ जाता है। दायरे का यह विस्तार इसलिए होता है क्योंकि आप पुनर्जन्म और मुक्ति के बारे में मुस्लिम दृष्टिकोण को बौद्ध दृष्टिकोण की ओर बढ़ते कदम के रूप में देख सकते हैं। बौद्धवादी दृष्टि से आप कह सकते हैं कि इस्लाम केवल दुखों से या निम्नतर पुनर्जन्म की अवस्थाओं से मुक्ति की बात करता है। यह मुक्ति एक उच्चतर स्वर्ग में पुनर्जन्म है। लेकिन लाम-रिम के क्रमिक स्तरों वाले मार्ग में यह तो केवल प्रारम्भिक प्रेरणा मात्र है। इसके आगे बौद्ध धर्म पुनर्जन्म के सर्वव्यापी दुख से मुक्ति, जो कि मध्यक्रम की प्रेरणा का लक्ष्य होता है, की बात करता है। इस चर्चा के आलोक में इस्लाम का अनुसरण बौद्ध धर्म के अनुसरण का प्रारम्भिक कदम बन जाता है।
किन्तु आप अनन्त दुख के मुस्लिम दावे को एक ऐसे अलग नज़रिए से देख सकते हैं कि वह बौद्ध दृष्टिकोण से इतना भिन्न भी न लगे। कालचक्र ग्रंथों में नरक की अवधारणा के प्रति आपत्ति यह है कि एक बार नरक की आग में गिरने के बाद यह यातना अनन्त है और उससे मनुष्य की मुक्ति सम्भव नहीं है। लेकिन यदि बौद्ध मत के संसार सम्बंधी विवरणों को देखें, तो मनुष्य इससे उसी प्रकार निकलना चाहता है जैसे कोई जलती हुई इमारत से बाहर निकलना चाहता है। इसके अलावा सांसारिक पुनर्जन्म का सिलसिला अनन्तकाल तक तब तक चलता रहेगा जब तक कि मनुष्य इससे मुक्ति का कोई उपाय न करे, अर्थात धर्म की ओर प्रवृत्त न हो।
उन्नीसवीं शताब्दी के निंग्मा आचार्य मिपाम ने अपने ग्रंथ वज्र सन का प्रदीपन, श्रीकालचक्र तंत्र का अर्थनिर्वचन : अध्याय (पाँच), गहन चेतनता पर टीकामें कालचक्र तंत्र साहित्य से भी अधिक समावेशवादी दृष्टिकोण अपनाया है। मिपाम ने इस बात का संकेत देते हुए, कि बुद्ध ने कुशल साधनों की सहायता से मुसलमानों को प्रबोधन की राह दिखाने की शिक्षा दी थी, लिखा है, “गैर-भारतीय आक्रान्ताओं के दो (दार्शनिक) दृष्टिकोण हैं। वे मानते हैं कि परिघटनाएं अणुओं के समूहों के रूप में घटित होती हैं, और वे व्यक्ति के ऐसे सत्व को मानते हैं जो अस्थायी तौर पर जन्म लेता है या उसकी अवस्था संसार में जन्म लेती है। मनुष्य का लक्ष्य देवताओं के समान सुख हासिल करना है। इसके अलावा वे किसी अन्य प्रकार के निर्वाण पर बल नहीं देते हैं।“
मिपाम आगे कहते हैं कि आक्रान्ताओं का पदार्थ का अणुओं के रूप में विद्यमान होने सम्बंधी दावा बौद्ध मान्यताओं के अनुरूप है। वे बताते हैं कि हीनयान बौद्ध धर्म के वैभाषिक और सौत्रान्तिक निकाय अविभाज्य अखण्ड अणुओं की बात करते हैं; जबकि महायान बौद्ध धर्म के चित्तमात्र और माध्यमिक निकाय अगणनीय खण्डों में विभाज्य अणुओं के बारे में दावा करते हैं।
 

सत्व या आत्मा के विषय में मिपाम आगे कहते हैं, “उनकी प्रवृत्ति और विचारों को समझते हुए बुद्ध ने उन्हें (आक्रान्ताओं को) उन सूत्रों के बारे में शिक्षा दी जिन्हें वे स्वीकार कर सकते थे। उदाहरण के लिए, उत्तरदायित्व स्वीकार करने सम्बंधी सूत्र में बुद्ध ने कहा कि (अपने कर्मों के) उत्तरदायित्व को स्वीकार करने वाले मनुष्य होते हैं, किन्तु उन्होंने व्यक्ति की आत्मा के स्थायी या अस्थायी होने के विषय में कुछ नहीं कहा। प्रकट रूप से ये बातें उनके (आक्रान्ताओं) के दावों की दृष्टि से सही थीं। बुद्ध की बातों का लक्ष्यार्थ यह है कि मनुष्यों का अस्तित्व किसी सत्व के सातत्य के रूप में होता है जो कर्म के उत्तरदायित्व को ग्रहण करता है, किन्तु यह अस्तित्व केवल सातत्य के अध्यारोपित अर्थ में होता है, जिसकी प्रकृति न तो स्थायी होती है और न ही अस्थायी होती है।
स्पप्न की अवस्था में, जो चित्त के स्वभाव मात्र से उद्भूत होती है, आनन्द या दुख का अनुभव करने वाले मूर्तरूप व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता है। चूँकि यह केवल प्रकटन मात्र होता है, इसलिए ऐसी स्थिति में (व्यक्ति का) अस्थायित्व किसी अस्थायी वस्तु की प्रकृति जैसा भी नहीं होता है। जाँच किए जाने पर वह (स्वाभाविक तौर पर) एक वस्तुमात्र होता है जिसमें स्थायी अथवा अस्थायी होने का कोई अन्तर्वेशन नहीं होता है, ऐसा ही सिखाया जाता है। तथागत की शिक्षाओं से प्रभावित हो कर (आक्रान्ताओं ने) अपने धर्म का त्याग कर दिया और बाद में वे बौद्ध मत के अनुयायी बन कर वैभाषिक हो गए।“

यहाँ समावेशवादी दृष्टिकोण यह है कि बुद्ध ने शिक्षाएं इस प्रकार दीं जो आक्रान्ताओं की मान्यताओं के अनुरूप हों, और अपने इस कौशल से उन्होंने आक्रान्ताओं को मुक्ति का मार्ग दिखाया। अन्यथा मुसलमान इसे आपत्तिजनक मानते और इस दृष्टिकोण से धार्मिक सौहार्द की स्थापना सम्भव नहीं हो पाती।
बौद्धों को ईश्वरप्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायी समझे जाने के आधार पर समानताएं
सहमति के कुछ और आधारों की तलाश में अब हम एक बार फिर इस्लाम द्वारा बौद्धों को ईश्वरप्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायियों का दर्जा दिए जाने के निहितार्थों के बारे में चर्चा करेंगे। जैसा कि हमने पूर्व में देखा, इस कथन से उद्भूत सहमति का आधार यह है कि बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जिसे किसी उच्चतर सत्ता, अर्थात ईश्वर द्वारा उद्घाटित किया गया है। इससे स्वाभाविक तौर पर उद्घाटन के स्रोत के रूप में ईश्वर और उस उद्घाटित ज्ञान को प्राप्त करने वाले व्यक्ति के बारे में प्रश्न उठता है जिसने बाद में उस ज्ञान को दुनिया में बाँटा।
ईश्वरोक्ति या इलहाम के इस प्रश्न के बारे में बौद्ध और मुसलमान, दोनों ही समावेशवादी दृष्टि अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, कालचक्र टीका निर्मल प्रकाश में स्पष्ट किया गया है, “जहाँ तक आक्रान्ताओं का प्रश्न है, पैगम्बर मुहम्मद रहमान का अवतार थे। वे आक्रान्ता तायी लोगों के गुरु और हाकिम थे।“ हिन्दू धर्म में किसी देवता की आत्मा के किसी अन्य रूप में देह-धारण को अवतार कहा जाता है। अतः मुहम्मद का रहमान के अवतार के रूप में आना कृष्ण का विष्णु के अवतार के रूप में आने के सदृश है। बौद्ध दृष्टिकोण के अनुसार यह सादृश्य इस कथन के समतुल्य होगा कि पैगम्बर मुहम्मद अल्लाह के निर्माणकाय उद्भूत रूप हैं।
वहीं दूसरी ओर प्रश्न उठता है कि क्या बुद्ध को अल्लाह के पैगम्बर या संदेशवाहक के रूप में देखा जा सकता है? फ़ारसी इतिहासकार अल-बरूनी ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गज़नी के भारतीय उपमहाद्वीप पर आक्रमण के समय गज़नी के साथ आया था। वहाँ पहुँच कर अल-बरूनी ने अपने अनुभवों को किताब अल-हिन्दनाम की अपनी पुस्तक में लिखा है। इस पुस्तक में उसने बौद्धों के बुनियादी रीति-रिवाज़ों और मान्यताओं का वर्णन करते हुए लिखा है कि भारत के लोग बुद्ध को पैगम्बर मानते थे। इसका निश्चित तौर पर यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता है कि अल-बरूनी का कहने का तात्पर्य यह था कि मुसलमान बुद्ध को पैगम्बर या अल्लाह के दूत के रूप में स्वीकार कर लें। तथापि, क़ुरान(4:163-164) में कहा गया है: “हमने तुम्हारी ओर उसी प्रकार वह्य की है जिस प्रकार नूह और उसके बाद के नबियों की ओर वह्य की। और हमने इबराहीम, इसमाईल, इसहाक और याक़ूब और उसकी संतान और ईसा और अय्यूब और यूनुस और हारून और सुलैमान की ओर भी वह्य की। और हमने दाऊद को ज़बूर प्रदान किया। और कितने ही रसूल हुए जिनका वृत्तान्त पहले हम तुमसे बयान कर चुके हैं और कितने ही ऐसे रसूल हुए जिनका वृत्तान्त हमने तुमसे नहीं बयान किया।“ बुद्ध को उन संदेशवाहकों में शुमार किया जा सकता है जिनका स्पष्ट तौर पर उल्लेख नहीं किया गया है।
उदाहरण के लिए, किसी बुद्ध के बारह शिक्षाप्रद कौतुकों की प्रस्तुति के अनुसार बुद्ध जन अलग-अलग समयों पर आते हैं, तब जब जीव उन्हें स्वीकार करने के लिए परिपक्व होते हैं, और अलग-अलग युगों में ऐसे विभिन्न प्रकार के तरीकों से शिक्षा देते हैं जो उस युग के जीवों के लिए अनुरूप हों। हालाँकि इस कल्प में हज़ारों निर्माणकाय बुद्ध हुए हैं, और इनमें से प्रत्येक के बीच कई युगों का फासला है। इन दोनों की प्रकार के निर्माणकायों को “धर्म के संदेशवाहक” कहा जा सकता है। साथ ही, प्रत्येक बुद्ध धर्म की शिक्षा देने के लिए कुशल साधनों का प्रयोग करता है। कुरान (14:4) में कहा गया है:  

“हमने जो रसूल भी भेजा, उसकी अपनी क़ौम की भाषा के साथ ही भेजा, ताकि वह उनके लिए अच्छी तरह खोलकर बयान कर दे।“
यहाँ हमें सावधानी बरतने की आवश्यकता है। हालाँकि इस्लाम बुद्ध को ईश्वर के संदेशवाहक के रूप में स्वीकार कर सकता है; लेकिन मुसलमानों, साथ ही साथ ईसाइयों और यहूदियों को इस बात पर बहुत आपत्ति होगी यदि उन्हें कहा जाए कि मुहम्मद, ईसा मसीह, अब्राहम और डेविड निर्माणकाय बुद्ध थे या अल्लाह के अवतार थे। धर्म के तुलनात्मक अध्ययन के लिए समावेशवादी दृष्टिकोण की यह एक बड़ी कमी है। किन्तु बौद्धों के इस दावे को किस प्रकार से समझा जाए कि मंजुश्री द्वारा नागों को सौंपी गईं और नागों द्वारा समुद्र के नीचे छिपाई गई प्रज्ञापारमिताओं को नागार्जुन ने उद्घाटित किया था। या यह दावा कि असंग को प्रेम, करुणा, और बोधिचित्त की शिक्षाएं मैत्रेय से तुषित के स्वर्ग में प्राप्त हुई थीं? निंग्मा परम्परा की निर्मल दृष्टि और उद्घाटित ग्रंथ शिक्षाओं को हम किस प्रकार समझेंगे? क्या ये बौद्ध कथन ईश्वरीय ज्ञान को उद्घाटित करने वाले पैगम्बरों के मुस्लिम दावों से इतने भिन्न हैं?
जहाँ तक ईश्वर की बात है, बौद्ध धर्म केवल इस बात का खण्डन करता है कि कोई सृष्टिकर्ता है जो किसी भी बात से प्रभावित हुए बिना, यहाँ तक कि सृजन करने की इच्छा से भी प्रभावित हुए बिना सृष्टि की रचना करता है।
इसमें ईश्वर के दूसरे गुणों का खण्डन नहीं किया जाता है, यहाँ तक कि सृजनशीलता का भी नहीं। उदाहरण के लिए, अनुत्तरयोग तंत्र में स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति का निर्मल प्रकाश चित्त ही व्यक्ति द्वारा अनुभव किए जाने वाले समस्त प्रकटनों का सृष्टिकर्ता है, और यह उस व्यक्ति के अपने कर्म और सामूहिक कर्म दोनों के ही द्वारा प्रभावित होता है। इसके अलावा, गहनतम सत्य, निर्मल प्रकाश चित्त अल्लाह की ही भांति शब्दों और अवधारणाओं से परे है। क़ुरान में घोषणा की गई है: “महान और उच्च है अल्लाह, उन बातों से जो ये बयान करते हैं।“
तथापि, अल्लाह के निन्यानवे नाम हैं, और ये नाम अल्लाह के तात्विक गुणों का बखान करते हैं। इसी प्रकार मंजुश्री नाम संगीति में मंजुश्री का उल्लेख निर्मल प्रकाश चित्त की मौलिक अवस्था के लिए किया जाता है, और इस कालचक्र ग्रंथ के छंद उसके गुणों की व्याख्या करते हैं।
अल्लाह की ही भांति निर्मल प्रकाश चित्त मंजुश्री (58) “आदिम हैं, सर्वोच्च हैं, अनादि हैं,” (100) “वे अनादि और अनन्त हैं।“ और अल्लाह की ही भांति निर्मल प्रकाश चित्त मंजुश्री (97) “अप्रकट हैं, जो प्रत्यक्ष नहीं होते, उनका कोई संकेत दृष्टिगोचर नहीं होता है।“ इसके अलावा, अल्लाह एक है, और इसी प्रकार निर्मल प्रकाश चित्त मंजुश्री (47) “अद्वय, अद्वैत के वक्ता हैं।“
अल-हक़, अर्थात जो वास्तविक है, जो सच्चा है, जो उचित है, नैतिक दृष्टि से भी, अल्लाह का मौलिक गुण है। इसकी धर्मता─ गहनतम सत्य, गहनतम चेतनायुक्त धर्मकाय के साथ अवधारणात्मक समानता है। निर्मल चित्त प्रकाश मंजुश्री (55-56) “पवित्र धर्म हैं, धर्म के शासक हैं... वास्तविकता के कान्तिवान अविनाशी स्वर्ग हैं।“ अन्यत्र, (47) “वे पूर्णतया वास्तविक हैं, अभिज्ञान का अभाव स्वरूप, वास्तविक अवस्था हैं,” (157) “वे गहनतम सत्य की शुद्धता और वैभव हैं।“
अल्लाह को सदैव अल-रहमान, अर्थात करुणामय, और अल-रहीम, अर्थात दयालु के रूप में सम्बोधित किया जाता है ─ करुणामय इसलिए कि वे करुणावश सृजन करते हैं, और दयालु इसलिए कि वे दुखों से रक्षा करते हैं। जोग्चेन में रिग्पा का उल्लेख प्रकटनों को उत्पन्न करने वाली निर्मल चेतनता को “करुणा” कहा जाता है। इसके अलावा, निर्मल चित्त प्रकाश मंजुश्री (38) “बृहत प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं, वे महान करुणा के प्रथम चित्त हैं,” (88) “ वे सभी परिमित जीवों के लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन हैं। वे उपकारी हैं, परिमित जीवों के प्रति वात्सल्य भाव रखने वाले हैं।“
अल्लाह की ही भांति निर्मल प्रकाश चित्त मंजुश्री (152) “अर्पण के योग्य हैं, श्रेष्ठ हैं, साष्टांग प्रणाम के अधिकारी हैं... पूज्य हैं, वन्दनीय हैं, श्रद्धा के अधिकारी हैं।“
आधारभूत समान नैतिक सिद्धान्तों के अलावा अल्लाह के ये सभी गुण, निर्मल चित्त प्रकाश, सत्य का प्रकटन, करुणा, आदि बौद्ध धर्म और इस्लाम के बीच सहमति के आधारों को दर्शाते हैं। इस्लाम में ज़िक्र का सस्वर-पाठ और बौद्ध धर्म में मंत्रों का उच्चार, दान देने पर बल दिया जाना, अध्ययन, ईमानदार आजीविका, आदि और भी बहुत सी विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है। यदि हम इन सभी समानताओं को सम्मानजनक बहुलतावादी दृष्टिकोण से देखें और आलोचनात्मक रवैया न अपनाएं तथा एक दूसरे के धर्म की शिक्षाओं को अपने धर्म की शिक्षाओं का बदला हुआ रूपमात्र न समझें, तो हम धार्मिक सौहार्द के लिए एक मज़बूत आधार तैयार कर सकते हैं।

क्या आपको इस्लाम की ये बातें मालूम है?


दुनिया में जीने का सबसे बेहतर उसूल है जियो और जीने दो। दुनिया का हर धर्म इस बात को मानता और सिखाता है। इसी तरह इस्लाम धर्म में भी कई ऐसी बातें है जो इस धर्म को मजबूती प्रदान करती है। आइए, जानें इस्लाम के बारे में कुछ ऐसे तथ्य जो बेहद कम लोग ही जानते है: मुस्लिम सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं। वो पैंगंबर मोहम्मद की इबादत नहीं करते
इस्लाम का मतलब है 'ईश्वर को प्रस्तुत और समर्पित'
ईसाई धर्म के बाद, इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है
 

मुस्लिम का असली मतलब है 'वह सबकुछ और हरकोई जो खुद को अल्लाह की इच्छा के लिए समर्पिता है।'
इसमें इंसान के पेड़-पौधे और जानवर भी शामिल हैं अलजेब्रा, एक अरबी शब्द 'अल-जब्र' से आता है, जो इस्लाम की प्रमुख भाषा है
ईश्वर को अरबी भाषा में 'अल्लाह' कहा जाता है
इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम हैं। वहां 120 मिलियन मुस्लिम हैं। इंडोनेशिया के बाद पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश का नंबर आता है।
इस्लाम की मान्याताओं में बेटियों को वरदान माना जाता है
अधिकतर मुस्लिम अरब लोग नहीं होता। दुनिया के केवल 15 फीसदी मुस्लिम ही अरब हैं।
अल्लाह को 99 नाम है और हर नाम का अलग मतलब है। जैसे 'अल-रहमान' का मतलब है 'सबसे दयालु', अल-हफी का मतलब है 'सबका रखवाला' आदि।

इस्लाम से जुड़े रोचक तथ्य // Interesting facts related to Islam


इस्लाम का मतलब है शांति और मानवता से प्यार करना लेकिन इन दिनों तो दुनिया में इस्लाम को लेकर बहुत सारी गलत धारणाएं हैं। इस्लाम एक ऐसा धर्म है, जिसे लोगों ने सही समझा नहीं है, क्यों कि उन्हें इसकी मूल बातें पता नहीं हैं। इस्लाम अन्य धर्मों का आदर करता है और अन्य धर्मों के लोगों से भाईचारा में रहना सिखाता है। इस्लाम मानता है कि धर्म को लेकर किसी पर कोई दबाव नहीं है। अगर एक व्यक्ति अच्छा इंसान नहीं है तो वह अच्छा मुसलमान भी नहीं बन सकता।
हुत सारे देशों को दाढ़ी रखने वाले आदमी और बुर्का पहनने वाली महिलाओं से डर लगता है। लोगों से लगने वाले इस अंजान से डर को इस्लामोंफोबिया कहा जाता है।
चलिए आज आपको इस्लाम से जुड़ी कुछ रोचक बातें बताते हैं जो आपने पहले नहीं सुनी होगी:-
1. सारे अरबी मुस्लिम नहीं हैंः सारे अरबी लोग मुस्लिम नहीं हैं। उनमें ईसाई, बौद्ध, यहूदी, एथेस्ट भी हैं। इसके बावजूद इंडोनेशिया मं मुस्लिम आबादी ज्यादा है।
2. मुस्लिम लोग मोहम्मद और मक्का की पूजा नहीं करतेः इस्लाम के अंतिम धर्मगुरू मोहम्मद साहब हुए। उनके लिए सबके मन में आदर है लेकिन उनकी पूजा नहीं की जाती है क्योंकि अल्लाह के अलावा अगर कोई किसी औऱ की पूजा करता है तो उसे पाप समान ही समझा जाता है, जिसे शिर्क कहा जाता है। मक्का और मोहम्मद दोनों को इस्लाम में बहुत माना जाता है लेकिन उनकी पूजा नहीं की जाती है।
3. अल्ला-हु-अकबर डर वाला शब्द नहीं हैः अल्ला-हु-अकबर का मतलब है ‘अल्लाह महान है'। मुस्लिम लोग अपने दुख-दर्द और चिंताएं मिटाने के लिए ऐसा कहते हैं जो व्यक्ति मुसलमान नहीं है वह इसका अर्थ लगा सकता है कि ‘ईश्वर महान है'।
4. यीशु के लिए खास जगहः मोहम्मद पैगंबर साहब के मकबरे के पास ही यीशु के लिए खास जगह है। माना जाता है कि एक दिन यीशु आएंगे और उन्हें यहां दफनाया जाएगा।


5. सारी मुस्लिम औरतें हिजाब नहीं पहनतीः बुर्का या हिजाब का मतलब अपने आप को ढकना है लेकिन मुस्लिम औऱतों के लिए यह अनिवार्य नहीं है। वह भी मॉडर्न कपड़े पहन सकती हैं। बस आपके शऱीर का कोई हिस्सा दिखाई नहीं देना चाहिए।
6. इस्लाम में शराब और सिगरेट पर पाबंदीः शराब और सिगरेट एक धीमा जहर है और जो भी चीज आपको मार सकती है इस्लाम उसकी आज्ञा नहीं देता। इस्लाम में आत्महत्या वर्जित है। इसके साथ ही इन चीजों के सेवन के बाद व्यक्ति बुरे काम भी करता है।
7. गर्भपातः इस्लाम में बच्चे के भ्रूण को मारने पर प्रतिबंध है। हां अगर मां की जान को खतरा है तो ऐसा किया जा सकता है।
8. दुनिया का दूसरा बड़ा धर्मः इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता हुआ धर्म है, 2050 तक यह ईसाई धर्म के बराबर हो जाएगा।


9. मैरीः मैरी या मरियम का नाम जितना बाईबल में लिया गया है, उससे कहीं ज्यादा कुरान में लिया गया है।
10. मुसलमानों ने यहूदियों को बचाया थाः द्वितीय विश्व युद्ध में बहुत से मुसलमानों ने नाजियों से यहूदियों को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था।
11. मुसलमान हिंसा नहीं चाहतेः हिंसा इस्लाम के खिलाफ है। इस्लाम का मतलब है शांति और लोगों को द्रढ़ता से इसका पालन करना चाहिए। इस्लाम मानवता पर आधारित है और मोहम्मद साहब ने तो उन लोगों को भी प्यार किया, जिन्होने उन पर कचरा फेंका था। जो व्यक्ति अपने आपको मुसलमान कहता है और हिंसा फैलाता है। इस्लाम ऐसे व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है।
12. यात्राः मुस्लिम महिलाएं अकेली यात्रा नहीं कर सकती हैं। यह केवल उनकी रक्षा के लिए है, उन्हें अपने पिता, भाई या पति के साथ ट्रैवल करना चाहिए। फिर भी कुछ महिलाएं इसका पालन नहीं करती हैं और अकेले ही यात्रा करती हैं। वहीं, कई मुस्लिम देशों में महिलाओं को अकेले यात्रा नहीं करने के चलते कानून बना हुआ है।

इस्लाम धर्म की खास बातें // Characteristics of Islam


चूँकि इस्लाम धर्म समस्त आसमानी धर्मों में सब से अन्त में उतरने वाला धर्म है इसलिए आवश्यक था कि वह ऐसी विशेषताओं और खूबियों पर आधारित हो जिनके द्वारा वह पिछले धर्मों से श्रेष्ठ और उत्तम हो और इन विशेषताओं के कारणवश वह क़ियामतआने तक हर समय और स्थान के लिए योग्य हो, तथा इन खूबियों और विशेषताअें के द्वारा मानवता के लिए दोनों संसार में सौभाग्य को साकार कर सके।
इन्हीं विशेषताओं और अच्छार्इयों में से निम्नलिखित बातें हैं :
इस्लाम के नुसूस इस तत्व को बयान करने में स्पष्ट हैं कि अल्लाह के निकट धर्म केवल एक है और अल्लाह तआला ने नूह अलैहिस्सलाम से लेकर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक सभी पैग़म्बरों को एक दूसरे का पूरक बनाकर भेजा, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''मेरी मिसाल और मुझ से पहले पैग़म्बरों की मिसाल उस आदमी के समान है जिस ने एक घर बनाया और उसे संवारा और संपूर्ण किया, किन्तु उस के एक कोने में एक र्इंट की जगह छोड़ दी। इसलिए लोग उस का तवाफ -परिक्रमा- करने लगे और उस भवन पर आश्चर्य चकित होते और कहते: तुम ने एक र्इट यहाँ क्यों न रख दी कि तेरा भवन संपूर्ण हो जाता? आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: तो वह र्इंट मैं ही हूँ, और मैं खातमुन्नबीर्इन (अनितम नबी) हूँ।'' (सहीह बुख़ारी 31300 हदीस नं.:3342)
किन्तु अनितम काल में र्इसा अलैहिस्सलाम उतरें गे और धरती को न्याय से भर देंगे जिस प्रकार कि यह अन्याय और अत्याचार से भरी हुर्इ है, परन्तु वह किसी नये धर्म के साथ नहीं आएं गे बलिक उसी इस्लाम धर्म के अनुसार लोगों में फैसला (शासन) करें गे जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरा है, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : ''क़ियामतक़ायम नहीं होगी यहाँ तक कि तुम्हारे बीच इब्ने मरयम न्यायपूर्ण न्यायाधीश बन कर उतरें गे, और सलीब को तोड़ें गे, सुवर को क़त्ल करें गे, जिज़्या को समाप्त करें गे, और माल की बाहुल्यता हो जाए गी यहाँ तक कि कोर्इ उसे स्वीकार नहीं करे गा।'' (सहीह बुख़ारी 2875 हदीस नं.:2344)
इसलिए सभी पैग़म्बरों की दावत अल्लाह सुब्हानहु व तआला की वह्दानियत (एकेश्वरवाद) और किसी भी साझीदार, समकक्ष और समांतर से उसे पवित्र समझने की ओर दावत देने पर एकमत है, तथा अल्लाह और उसके बन्दों के बीच बिना किसी माध्यम के सीधे उसकी उपासना करना, और मानव आत्मा को सभ्य बनाने और उसके सुधार और लोक-परलोक में उसके सौभाग्य की ओर रहनुमार्इ करना, अल्लाह तआला का फरमान है
''उस ने तुम्हारे लिए धर्म का वही रास्ता निर्धारित किया है जिस को अपनाने का नूह को आदेश दिया था और जिसकी (ऐ मुहम्मद!) हम ने तुम्हारी ओर वह्य भेजी है और जिसका इब्राहीम, मूसा और र्इसा को आदेश दिया था (वह यह) कि धर्म को क़ायम रखना और उस में फूट न डालना।'' (सूरतुश्शूरा :13)
अल्लाह तआला ने इस्लाम के द्वारा पिछले सभी धर्मों को निरस्त कर दिया, अत: वह सब से अनितम धर्म और सब धर्मों का समापित कर्ता है, अल्लाह तआला इस बात को स्वीकार नहीं करे गा कि उसके सिवाय किसी अन्य धर्म के द्वारा उसकी उपासना की जाए , अल्लाह तआला का फरमान है :
''और हम ने आप की ओर सच्चार्इ से भरी यह किताब उतारी है, जो अपने से पहले किताबों की पुषिट करती है और उनकी मुहाफिज़ है।'' (सूरतुल मायदा :48)
चूँकि इस्लाम सबसे अनितम आसमानी धर्म है, इसलिए अल्लाह तआला ने क़ियामत के दिन तक इसकी सुरक्षा की जि़म्मेदारी उठार्इ, जबकि इस से पूर्व धर्मों का मामला इसके विपरीत था जिनकी सुरक्षा की जि़म्मेदारी अल्लाह तआला ने नहीं उठार्इ थी; क्योंकि वे एक विशिष्ट समय और विशिष्ट समुदाय के लिए अवतरित किए गये थे, अल्लाह तआला का फरमान है :
''नि:सन्देह हम ने ही इस क़ुरआन को उतारा है और हम ही इसकी सुरक्षा करने वाले हैं।'' (सूरतुल हिज्र :9)
इस आयत का तक़ाज़ा यह है कि इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अनितम पैग़म्बर हों जिनके बाद कोर्इ अन्य नबी व हज़रत पैग़म्बर न भेजा जाए , जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :
''मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं, किन्तु आप अल्लाह के सन्देष्टा और खातमुल-अंबिया -अनितम र्इश्दूत- हैं।'' (सूरतुल अहज़ाब:40)
इस का यह अर्थ नहीं है कि पिछले पैग़म्बरों और और किताबों की पुषिट न की जाए और उन पर र्इमान न रखा जाए । बलिक र्इसा अलैहिस्सलाम मूसा अलैहिस्सलाम के धर्म के पूरक हैं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम र्इसा अलैहिस्सलाम के धर्म के पूरक हैं, और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नबियों और रसूलों की कड़ी समाप्त हो गर्इ, और मुसलमान को आप से पहले के सभी पैग़म्बरों और किताबों पर र्इमान रखने का आदेश दिया गया है, अत: जो व्यकित उन पर या उन में से किसी एक पर र्इमान न रखे तो उसने कुफ्र किया और इस्लाम धर्म से बाहर निकल गया, अल्लाह तआला का फरमान है :
''  

जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर र्इमान नहीं रखते हैं और चाहते हैं कि अल्लाह और उसके रसूलों के बीच अलगाव करें और कहते हैं कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते और इस के बीच रास्ता बनाना चाहते हैं। यक़ीन करो कि यह सभी लोग असली काफिर हैं।'' (सूरतुनिनसा :150-151)
इस्लाम धर्म ने अपने से पूर्व शरीअतों (धर्म-शस्त्रों) को सम्पूर्ण और संपन्न कर दिया है, इस से पूर्व की शरीअतें आतिमक सिद्धान्तों पर आधारित थीं जो नफ्स को सम्बोधित करती थीं और उसके सुधार और पवित्रता की आग्रह करती थीं और सांसारिक और आर्थिक मामलों की सुधार करने वाली समस्त चीज़ों पर कोर्इ रहनुमार्इ नकीं करती थीं, इसके विपरीत इस्लाम ने जीवन के समस्त छेत्रों को संगठित और सम्पूर्ण कर दिया है और धर्म व दुनिया के सभी मामलों को समिमलित है, अल्लाह तआला का फरमान है :
''आज मैं ने तुम्हारे लिये तुम्हारे धर्म को पूरा कर दिया, और तुम पर अपनी नेमतें पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को पसन्द कर लिया।'' (सूरतुल मायदा :3)
इसीलिए इस्लाम सर्वश्रेष्ठ और सब से अफज़ल धर्म है, अल्लाह तआला का फरमान है :


''तुम सब से अच्छी उम्मत हो जो लोगों के लिए पैदा की गर्इ है कि तुम नेक कामों का आदेश देते हो और बुरे कामों से रोकते हो, और अल्लाह पर र्इमान रखते हो। अगर अहले किताब र्इमान लाते तो उनके लिए बेहतर होता, उन में र्इमान वाले भी हैं, लेकिन अधिकतर लोग फ़ासिक़ हैं।'' (सूरत आल-इमरान :110)
इस्लाम धर्म एक विश्व व्यापी धर्म है जो बिना किसी अपवाद के प्रत्येक समय और स्थान में सर्व मानव के लिए है, किसी विशिष्ट जाति, या सम्प्रदाय, या समुदाय या समय काल के लिए नहीं उतरा है। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिस में सभी लोग संयुक्त हैं, किन्तु रंग, या भाषा, या वंश, या छेत्र, या समय, या स्थान के आधार पर नहीं, बलिक एक सुनिशिचत आस्था (अक़ीदा) के आधार पर जो सब को एक साथ मिलाए हुए है। अत: जो भी व्यकित अल्लाह को अपना रब (पालनहार) मानते हुए, इस्लाम को अपना धर्म और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना पैग़म्बर मानते हुए र्इमान लाया तो वह इस्लाम के झण्डे के नीचे आ गया, चाहे वह किसी भी समय काल या किसी भी स्थान पर हो, अल्लाह तआला का फरमान है :
''हम ने आप को समस्त मानव जाति के लिए शुभ सूचना देने वाला तथा डराने वाला बनाकर भेजा है।'' (सुरत सबा :28)
अल्बत्ता इस से पूर्व जो संदेश्वाहक गुज़रे हैं, वे विशिष्ट रूप से अपने समुदायों की ओर भेजे जाते थे, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :
''हम ने नूह को उनकी क़ौम की ओर भेजा।'' (सूरतुल आराफ :59)
तथा अल्लाह तआल ने फरमाया :
''तथा हम ने आद की ओर उनके भार्इ हूद को भेजा, तो उन्हों ने कहा : ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की उपासना करो, उसके सिवाय तुम्हारा कोर्इ सच्च माबूद (पूज्य) नहीं।'' (सूरतुल आराफ :60)
तथा अल्लाह तआला ने फरमाया : ''तथा समूद की ओर उनके भार्इ सालेह को भेजा, तो उन्हों ने कहा : ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की उपासना करो, उसके सिवाय तुम्हारा कोर्इ सच्चा माबूद नहीं।'' (सूरतुल आराफ :73)
तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :
''और लूत को (याद करो) जब उन्हों ने अपनी क़ौम से कहा।'' (सूरतुल आराफ :80)
तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :
''और मदयन की ओर उनके भार्इ शुऐब को (भेजा)। '' (सूरतुल आराफ :85)
तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :
''फिर हम ने उनके बाद मूसा को अपनी आयतों के साथ फिरऔन और उसकी क़ौम की ओर भेजा।'' (सूरतुल आराफ :102)
तथा अल्लाह तआला ने फरमाया :
और उस समय को याद करो- जब र्इसा बिन मरयम ने कहा: ऐ इस्रार्इल के बेटो! मैु तुम्हारी ओर अल्लाह का पैग़म्बर हूँ, अपने से पूर्व तौरात की पुषिट करने वाला हूँ..। ''
इस्लाम के विश्व व्यापी धर्म होने और उसकी दावत के हर समय और स्थान पर समस्त मानव जाति की ओर सम्बोधित होने के कारण मुसलमानों को इस संदेश का प्रसार करने और उसे लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है, अल्लाह तआला ने फरमाया :
''और हम ने इसी तरह तुम्हें बीच की (संतुलित) उम्मत बनाया है, ताकि तुम लोगों पर गवाह हो जाओ और हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम पर गवाह हो जाएं।'' (सूरतुल बक़्रा :143)
इस्लाम धर्म के नियम (शास्त्र) और उसकी शिक्षाएं रब्बानी (र्इश्वरीय) और सिथर (अटल) हैं उनमें परिवर्तन और बदलाव का समावेश नहीं है, वे किसी मानव की बनार्इ हुर्इ नहीं हैं जिन में कमी और ग़लती, तथा उस से घिरी हुए प्रभाविक चीज़ों; सभ्यता, वरासत, वातावरण से प्रभावित होने की सम्भावाना रहती है। और इसका हम दैनिक जीवन में मुशाहदा करते हैं, इसलिए हम देखते हैं कि मानव संविधानों और नियमों में सिथरता नहीं पार्इ जाती है और उनमें से जो एक समाज के लिए उपयुक्त हैं वही दूसरे समाज में अनुप्युक्त साबति होते हैं, तथा जो एक समय काल के लिए उप्युक्त हैं वही दूसरे समय काल में अनुप्युक्त होते हैं। उदाहरण के तौर पर पूँजीवाद समाज के नियम और संविधान, साम्यवादी समाज के अनुकूल नहीं होते, और इसी प्रकार इसका विप्रीत क्रम भी है। क्योंकि हर संविधान रचयिता अपनी प्रवृतित्तयों और झुकाव के अनुरूप क़ानून बनाता है, जिनकी असिथरता के अतिरिक्त, उस से बढ़कर और अधिकतर ज्ञान और सभ्यता वाला व्यकित आता है और उसका विरोध करता, या उसमें कमी करता, या उसमे बढ़ोतरी करता है।  

परन्तु इस्लामी धर्म-शास्त्र जैसाकि हम ने उल्लेख किया कि वह र्इश्वरीय है जिसका रचयिता सर्व सृषिट का सृष्टा और रचयिता है जो अपनी सृषिट के अनुरूप चीज़ों और उनके मामलों को संवारने और स्थापित करने वाली चीज़ों को जानता है, किसी भी मनुष्य को, चाहे उसका पद कितना ही सर्वोच्च क्यों न हो, यह अधिकार नहीं है कि अल्लाह के किसी नियम का विरोध कर सके या उसमें कुछ भी घटा या बढ़ा कर परिवर्तन कर सके, क्योंकि यह सब के लिए अधिकारों की सुरक्षा करता है, अल्लाह तआला का फरमान है : ''क्या यह लोग फिर से जाहिलियत का फैसला चाहते हैं? और यक़ीन रखने वालों के लिए अल्लाह से बेहतर फैसला करने वाला और आदेश करने वाला कौन हो सकता है।'' (सुरतुल मायदा :50)
इस्लाम धर्म एक विकासशील धर्म है जो उसे हर समय एंव स्थान के लिए उप्युक्त बना देता है, इस्लाम धर्म अक़ीदा व इबादात जैसे र्इमान, नमाज़ और उसकी रकअतों की संख्या और समय, ज़कात और उसकी मात्रा और जिन चीज़ों में ज़कात अनिवार्य है, रोज़ा और उसका समय, हज्ज और उसका तरीक़ा और समय, हुदूद (धर्म-दण्ड)...इत्यादि के विषय में ऐसे सिद्धान्त, सामान्य नियमों, व्यापक और अटल मूल बातों को लेकर आया है जिन में समय या स्थान के बदलाव से कोर्इ बदलाव नहीं आता है, इसलिए जो भी घटनाएं घटती हैं और नयी आवश्यकताएं पेश आती हैं उन्हें क़ुरआन करीम पर पेश किया जाए गा, उसमें जो चीज़ें मिलें गीं उनके अनुसार कार्य किया जाए गा और उसके अतिरिक्त को छोड़ दिया जाए गा, और अगर उसमें न मिले तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सहीह हदीसों में तलाश किया जाए गा, उसमें जो मिलेगा उसके अनुसार कार्य किया जाए गा और उसके अतिरिक्त को छोड़ दिया जाए गा, और अगर उसमें भी न मिले तो हर समय और स्थान पर मौजूद रब्बानी उलमा (धर्म ज्ञानी) उसके विषय में विचार और खोज के लिए इजितहाद करें गे, जिस में सार्वजनिक हित पाया जाता हो और उनके समय की आवश्यकताओं और समाज के मामलों के उप्युक्त हो, और वह इस प्राकर कि क़ुरआन और हदीस की संभावित बातों में गौर करके और नये पेश आने वाले मामलों को कु़रआन और हदीस से बनाए गये क़ानून साज़ी के सामान्य नियमों पर पेश करके, उदाहरण के तौर पर यह नियम (चीज़ों में असल उनका जार्इज़ होना है) तथा (हितों की सुरक्षा) का और (आसानी करने तथा तंगी को समाप्त करने) का नियम, तथा (हानि को मिटाने) का नियम, तथा (फसाद -भ्रष्टाचार- की जड़ को काटने) का नियम, तथा यह नियम कि (आवश्यकता पड़ने पर निषिद्ध चीज़ें वैध हो जाती हैं ) तथा यह नियम कि (आवश्यकता का ऐतबार आवश्यकता की मात्रा भर ही किया जाए गा), तथा यह नियम कि (लाभ उठाने पर हानि को दूर करने को प्राथमिकता प्राप्त है), तथा यह नियम कि (दो हानिकारक चीज़ों में से कम हानिकारक चीज़ को अपनाया जाए गा) तथा यह नियम कि (हानि को हानि के द्वारा नहीं दूर किया जाए गा।) तथा यह नियम कि (सामान्य हानि को रोकने के लिए विशिष्ट हानि को सहन किया जाए गा।)... इनके अतिरिक्त अन्य नियम भी हैं।

इजितहाद से अभिप्राय मन की चाहत और इच्छाओं का पालन नहीं है, बलिक उसका मक़सद उस चीज़ तक पहुँचना है जिस से मानव का हित और कल्याण हो और साथ ही साथ क़ुरआन या हदीस से उसका टकराव या विरोध न होता हो। और यह इस कारण है ताकि इस्लाम हर काल के साथ साथ क़दम रखे और हर समाज की आवश्यकतओं के साथ चले।
इस्लाम धर्म में उसके नियमों और क़ानूनों के आवेदन में कोर्इ भेदभाव और असमानता नहीं है, सब के सब बराबर हैं, धनी या निर्धन, शरीफ या नीच, राजा या प्रजा, काले या गोरे के बीच कोर्इ अन्तर नहीं, इस शरीअत के लागू करने में सभी एक हैं, इसलिए क़ुरैश का ही उदाहरण ले लीजिए जिनके लिए बनू मख्ज़ूम की एक शरीफ महिला का मामला महत्वपूर्ण बन गया, जिसने चोरी की थी, उन्हों ने चाहा कि उस के ऊपर अनिवार्य धार्मिक दण्ड -चोरी के हद- को समाप्त करने के लिए पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास किसी को मध्यस्थ बनाएं। उन्हों ने आपस में कहा कि इस विषय में अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कौन बात करे गा? उन्हों ने कहा : अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चहेते उसामा बिन ज़ैद के अतिरिक्त कौन इस की हिम्मत कर सकता है। चुनांचे उन्हें लेकर अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आएऔर उसामा बिन ज़ैद ने इस विषय में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बात किया। इस पर अल्लाह के पैग़्म्बर का चेहरा बदल गया और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''क्या तुम अल्लाह के एक हद -धार्मिक दण्ड- के विषय में सिफारिश कर रहे हो? ''
फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भाषण देने के लिए खड़े हुए। आप ने फरमाया : ''ऐ लोगो ! तुम से पहले जो लोग थे वे इस कारण नष्ट कर दिए गए कि जब उन में कोर्इ शरीफ चोरी करता तो उसे छोड़ देते, और जब उन में कोर्इ कमज़ोर चोरी कर लेता तो उस पर दण्ड लागु करत थे। उस हस्ती की सौगन्ध! जिस के हाथ में मेरी जान है, यदि मुहम्मद की बेटी फातिमा भी चोरी कर ले, तो मैं उस का हाथ अवश्य काट दूँगा।'' (सहीह मुसिलम 31315 हदीस नं.:1688)
इस्लाम धर्म के स्रोत असली और उसके नुसूस (ग्रंथ) कमी व बेशी और परिवर्तन व बदलाव और विरूपण से पवित्र हैं, इस्लामी शरीअत के मूल्य स्रोत यह हैं :
1. क़ुरआन करीम 2. नबी की सुन्नत (हदीस)
1- क़ुरआन करीम जब से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म पर उतरा है, उसी समय से लेकर आज हमारे समय तक अपने अक्षरों, आयतों और सूरतों के साथ मौजूद है, उसमें किसी प्रकार की कोर्इ परिवर्तन, विरूपण, कमी और बेशी नहीं हुर्इ है, अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अली, मुआविया, उबै बिन कअब और जै़द बिन साबित जैसे बड़े-बड़े सहाबा किराम रजि़यल्लाहु अन्हुम को वह्य के लिखने के लिए नियुक्त कर रखा था, और जब भी कोर्इ आयत उतरती तो इन्हें उस को लिखने का आदेश देते और सूरत में किस स्थान पर लिखी जानी है, उसे भी बता देते थे। इसलिए क़ुरआन को किताबों में सुरक्षित कर दिया गया और लोगों के सीनों में भी सुरक्षित कर दिया गया। मुसलमान अल्लाह की किताब के बहुत सख्त हरीस (लालसी और इच्छुक) रहे हैं, इसलिए वे उस भलार्इ और अच्छार्इ को प्राप्त करने के लिए जिसकी सूचना पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने निम्न कथन के द्वारा दी है, उसके सीखने और सिखाने की ओर जल्दी करते थे, आप का फरमान है : ''तुम में सब से श्रेष्ठ वह है जो क़ुरआन सीखे और सिखाए।'' (सहीह बुख़ारी 41919 हदीस नं.:4739)
क़ुरआन की सेवा करने, उसकी देख-रेख करने और उसकी सुरक्षा करने के मार्ग में वे अपने जान व माल की बाज़ी लगा देते थे, इस प्रकार मुसलमान एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को उसे पहुँचाते रहे, क्योंकि उसको याद करना और उसकी तिलावत करना अल्लाह की इबादत है, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म का फरमान है : ''जिसने अल्लाह की किताब का एक अक्षर पढ़ा, उसके लिए उसके बदले एक नेकी है, और नेकी को (कम से कम) उसके दस गुना बढ़ा दिया जाता है, मैं नहीं कहता कि ( الم ) अलिफ-लाम्मीम एक अक्षर है बलिक अलिफ एक अक्षर है, मीम एक अक्षर है और लाम एक अक्षर है।'' (सुनन तिर्मिज़ी 5175 हदीस नं.:2910)


2- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म की सुन्नत अर्थात हदीस शरीफ जो कि इस्लामी क़ानून साज़ी का दूसरा स्रोत, तथा क़ुरआन को स्पष्ट करने वाली और क़ुरआन करीम के बहुत से अहकाम की व्याख्या करने वाली है, यह भी छेड़छाड़, गढ़ने, और उसमें ऐसी बातें भरने से जो उसमें से नहीं है, सुरक्षित है क्यों कि अल्लाह तआला ने विश्वसनीय और भरोसेमंद आदमियों के द्वारा इस की सुरक्षा की है जिन्हों ने अपने आप को और अपने जीवन को हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म की हदीसों के अध्ययन और उनकी सनदों और मतनों और उनके सहीह या ज़र्इफ होने, उनके रावियों (बयान करने वालों) के हालात और जरह व तादील (भरोसेमंद और विश्वसनीय या अविश्वसनीय होने ) में उनकी श्रेणियों का अध्ययन करने में समर्पित कर दिया था। उन्हों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म से वर्णित सभी हदीसों को छान डाला और उन्हीं हदीसों को साबित रखा जो प्रमाणित रूप से वर्णित हैं, और वह हमारे पास झूठी हदीसों से खाली और पवित्र होकर पहुँची हैं। जो व्यकित उस तरीक़े की जानकारी चाहता है जिस के द्वारा हदीस की सुरक्षा की गर्इ है वह मुस्तलहुल-हदीस (हदीस के सिद्धांतों का विज्ञान) की किताबों को देखे जो विज्ञान हदीस की सेवा के लिए विशिष्ट है; ताकि उसके लिए यह स्पष्ट हो जाए कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जो हदीसें हमारे पास पहुँची हैं उनमें शक करना असम्भव (नामुमकिन) है, तथा उसे हज़रत पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म की हदीस की सेवा में की जाने वाली प्रयासों की मात्रा का भी पता चल जाए ।