12.12.19

दामोदर क्षत्रीय दर्जी समाज -उन्नायक डॉ.दयाराम आलोक की प्रेरक कहानी

                                       
    जन्म -शिक्षा
                                  
     शामगढ कस्बे में पुरालाल जी राठौर के कुल में जन्म ११ अगस्त सन १९४० ईस्वी। रेडीमेड वस्त्र बनाकर बेचना पारिवारिक व्यवसाय था। अत्यंत साधारण आर्थिक हालात।हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद सन १९६१ में शासकीय सेवा में अध्यापक के पद पर नियुक्त।सन १९६९ में राजनीति विषय से एम.ए. किया। चिकित्सा विषयक उपाधियां आयुर्वेद रत्न और होम्योपैथिक उपाधि D I Hom ( London) अर्जित कीं। 

   दामोदर दर्जी महासंघ का गठन 

 दर्जी समाज के महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यों को संगठित ढंग से संपादित करने तथा सामाजिक फ़िजूल खर्ची रोकने के उद्देश्य से मैने अपने कुछ घनिष्ठ साथियों के सहयोग से 14/6/1965 / तदनुसार जेष्ठ की पूर्णिमा संवत 2022 को प्रथम अधिवेशन,शामगढ़ मे  "दामोदर दर्जी युवक संघ" का गठन किया तथा  एक कार्यकारिणी समिति बनाई। कालांतर मे विस्तृत होकर यह दर्जी युवक संघ "अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ" के नाम से अस्तित्व में है।


 दामोदर दर्जी महासंघ की स्थापना में मुझे शामगढ के

डॉ. लक्ष्मीनारायण जी  अलोकिक ,
श्री रामचन्द्र जी सिसौदिया ,
श्री शंकरलालजी राठौर,
श्री कंवरलाजी सिसौदिया,
श्री गंगारामजी चोहान शामगढ़,

श्री रामचंद्रजी चौहान मनासा ,


श्री कन्हैयालालजी परमार गुराड़िया नरसिंग,

श्री प्रभुलालजी मकवाना मोडक,श्री देवीलालजी सोलंकी शामगढ़ बोलिया वाले का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ। मैने संघ का संविधान सन १९६५ में लिपिबद्ध किया और डॉ. लक्ष्मीनारायणजी अलौकिक के माध्यम से रसायन प्रेस दिल्ली से छपवाकर प्रचारित-प्रसारित किया|
संघ का प्रथम अधिवेशन १४ जुन १९६४ को शामगढ में



पूरालालजी राठौर के निवास पर हुआ ।अधिवेशन में 134 दर्जी बंधु उपस्थित हुए। इस अधिवेशन मे श्री रामचन्द्रजी सिसोदिया को अध्यक्ष , श्री दयाराम जी आलोक को संचालक,और श्री सीताराम ज्री संतोषी को कोषाध्यक्ष बनाया गया। सदस्यता अभियान चलाकर ५० नये पैसे वाले सैंकडों सदस्य बनाये गये।

दर्जी मंदिर डग का प्राण प्रतिष्ठा उत्सव 

    डग के दर्जी समाज के मंदिर मे भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा की  प्राण प्रतिष्ठा  के लिए आर्थिक सहयोग हेतु डग के दर्जी बंधु 7 वर्षों से समाज बंधुओं से संपर्क कर रहे थे|लेकिन  उध्यापन हेतु आवश्यक धन संग्रहीत करने में सफलता नही मिल रही थी|
 परमात्मा की आंतरिक प्रेरणा से समृद्ध होकर मैं इस महत्वपूर्ण मसले को लेकर 15 मई 1966 को डग गया|
सभी दर्जी बंधुओं को मंदिर मे बैठक के लिए आमंत्रित किया |रात को 9.15 बजे बैठक प्रारभ हुई | अपने उद्बोधन मे मैंने दर्जी बंधुओं  से निवेदन किया कि भगवान की प्रतिमा 7 वर्ष से बाहर रखी हुई है और प्राणप्रतिष्ठा के अभाव मे पूजा कार्य  बंद पड़ा है|अगर दर्जी समाज डग सर्वसम्मति से  मुझे अनुमति देते हुए अधिकृत करें  तो दामोदर दर्जी महासंघ के माध्यम से समाज से चंदा संग्रह की मुहिम शुरू की जावे| पर्याप्त चर्चा और विचार विमर्श के बाद डग के दर्जी बंधुओं ने  अपने हस्ताक्षरयुक्त एक लिखित प्रस्ताव पारित कर मंदिर उध्यापन कार्य मेरे नेतृत्व मे दामोदर दर्जी महासंघ के सुपुर्द कर दिया |







मित्रों,उस समय मेरी आयु यही कोई 25 वर्ष रही होगी| दर्जी बंधुओं  द्वारा मेरी कार्यक्षमता पर विश्वास कर डग मंदिर  उध्यापन का महत्वपूर्ण कार्य मेरे सुपुर्द कर देना  मेरे जीवन की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों की प्रथम कड़ी मानी जा सकती है|
तुलसीदासजी रामचरित मानस मे लिखते हैं -
जासु कृपा सु दयाल||
मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ै गिरिवर गहन।
भावार्थ-
जिनकी कृपा से गूँगा बहुत  बोलने वाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाता है ,
 
मंदिर कार्य सिद्धि हेतु  युवक संघ के कार्यकर्त्तागण और समाज के वरिष्ठ लोग इस चुनौती को युद्धस्तर पर लेते हुए  गाँव -गाँव ,शहर -शहर  सामाजिक संपर्क पर निकल पड़े और उध्यापन के लिए चन्दा एकत्र करने लगे| 


  मित्रों,अविश्वसनीय तो  लगता है मगर प्रभु की अदृश्य अनुकंपा के चलते  सिर्फ 1 माह 8 दिन की छोटी सी अवधि मे  पर्याप्त धन संग्रहीत होकर  23 जून 1966 को उध्यापन कार्यक्रम आयोजित  हो गया|यहाँ बताते चलें कि 1966 मे सोने का भाव 73 रुपये 75 पैसे का 10 ग्राम था| उस समय दर्जी बंधुओं ने जो आर्थिक सहयोग दिया उसे सोने के भाव के परिप्रेक्ष्य मे  तुलनात्मक  रूप से देखें|

दर्जी मंदिर डग के मूर्ति - प्रतिष्ठा समारोह 1966 हेतु दान दाताओं की नामावली भी देखें -लिंक


 एकत्रित चन्दा राशि  मैंने डग मंदिर के कोषाध्यक्ष श्री कन्हैयालालजी पँवार  के सुपुर्द की |
उध्यापन की आमंत्रण पत्रिका छपवाकर पूरे समाज को उध्यापन समारोह हेतु आमंत्रित किया गया|

    

    



    बंधुओं, 23/जून/1966 को डग के सत्यनारायण मंदिर का भव्य उध्यापन (प्राण-प्रतिष्ठा) समारोह कार्यक्रम आयोजित हुआ |सम्पूर्ण समाज के हर गाँव -शहर के दर्जी बंधु सहपरिवार उध्यापन मे शामिल हुए| यह कहना उचित ही होगा  कि डग के सत्यनारायण मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा समारोह उस जमाने का सबसे बड़ा सामाजिक आयोजन था|
साहित्य सृजन-
मित्रों, साहित्य सृजन क्षेत्र मे मेरे अग्रज स्व.डॉ.लक्ष्मीनारायणजी अलौकिक ने मार्गदर्शन किया और मेरी शुरुआती कविता"तुमने मेरी चिर साधों को झंकृत और साकार किया है" को अपने संपादकीय मे बिकानर से  प्रकाशित होने वाली पत्रिका "स्वास्थ्य  सरिता" मे प्रकाशित किया |काव्य रचना अनवरत चलती रही और करीब 150  काव्य कृतियां विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे प्रकाशित हुई हैं जिनमे कादंबिनी का नाम भी शामिल है|पाँच कविताओं के लिंक्स प्रस्तुत हैं-

उन्हें मनाने दो दिवाली

आओ आज करें अभिनंदन!

सरहदें बुला रहीं


गाँधी के अमृत वचन हमें अब याद नहीं 


सुमन कैसे सौरभीले  


प्रसिद्ध कवियों की 500  कविताओं की लिंक्स  निम्न ब्लॉग  पोस्ट मे समाहित हैं -

काव्य मंजूषा

    मित्रों,दर्जी समाज की आर्थिक बुनियाद सैंकड़ों वर्षों से दयनीय रही है|इस धंधे से बस गुजर बसर ही हो सकता है |फिर परिवार मे किसी की मृत्यु पर मोसर का आयोजन करना  गरीब परिवार की आर्थिक रीढ़ को लुंज पुंज कर देता है|इसी को ध्यान मे रखते हुए  दामोदर दर्जी महासंघ के प्रथम अधिवेशन 1964 मे  मोसर प्रथा संबन्धित एक प्रस्ताव पर विचार किया गया था और मैंने मोसर नहीं खाने का संकल्प लिया था | इस मामले मे मेरे परिवारजन ने मेरा साथ दिया और तब से मेरा परिवार मृत्युभोज गृहण नहीं करता है|

समाज के परिवारों की जानकारी 

     समाज के परिवारों की विस्तृत जानकारी एकत्र करने के उद्धेश्य से मैंने 1965 मे बड़े आकार के फार्म छ्पावाए थे | इस फार्म मे  व्यक्ति की पूरी जानकारी -नाम,पता,धंधा,पढ़ाई,जन्म तिथि,रिश्तेदारी,पुरखे,पत्नी,मामा,नाना आदि बातों की जानकारी के खाने थे| 
                         (दर्जी परिवार जानकारी गाँव मोड़क| स्थिति-23\6/1966)


लीमड़ी के दर्जी समाज के परिवारों की जानकारी | स्थिति- 23/10/1980



 जानकारी संग्रह करने का उपक्रम  आज भी अनवरत सक्रियता मे  है|इस सिलसिले  मे  मैंने दाहोद,लिमड़ी,झालोद आदि स्थानो का भी दौरा किया और निर्धारित उक्त फार्म मे परिवारों की जानकारी संगृह की | जब समाज की लगभग पूर्ण जानकारी हासिल हो गई तो मैंने वंशावलियाँ बनाकर  दर्जी वेबसाईट पर अपलोड करना शुरू कर दिया |आप दर्जी समाज के प्रमुख  परिवारों की जानकारी  और वंशावलियां निम्न लिंक मे पढ़ सकते हैं -

दामोदर वंशीय नवा गुजराती दर्जी समाज की प्रमुख वंशावलियाँ 


    बंधुओ,मेरे अनुज

श्री रमेशचन्द्र जी राठौर"आशुतोष" सामाजिक कार्यों मे वर्षों से अग्रणी रहे हैं|  उन्होने समाज की जानकारी की कई स्मारिकाएँ और ग्रंथ प्रकाशित किए हैं|

यहाँ  स्व.भवानी शंकरजी चौहान सुवासरा (संजीत वाले) के सामाजिक योगदान को  स्मरण करना जरूरी है कि उन्होने अपनी मोटर साईकिल से तमाम दर्जी समाज की बसाहट वाले गांवों - शहरों का  दौरा किया और दर्जी परिवारों की जानकारी अपने रजिस्टर मे नोट की |ज्ञातव्य है कि इसी जानकारी को  आधार बनाकर रमेशजी आशुतोष ने  दर्जी परिवारों की जानकारी देने वाले "समाज सेतु -2014 " नामक  विशाल ग्रंथ का सम्पादन किया और इसे  दामोदर दर्जी महासंघ कार्यालय 14,जवाहर मार्ग  ,शामगढ़ के माध्यम से छपावाकर लागत मूल्य पर समाज को उपलब्ध कराया| 
  जो लोग समाज सेवा  के प्रति संकल्पित रहे हैं वे यथार्थ मे सम्मान और आदर के पात्र हैं|

सामूहिक विवाह सम्मेलन का श्री गणेश
    मित्रों, जैसे- जैसे महंगाई जीवनोपयोगी हरेक वस्तु और सामाजिक रीति रस्मों को अपने आगोश मे ले रही है ,समाजजनों को अपने पुत्र -पुत्रियों के विवाह आयोजित करने मे आर्थिक कठनाईयों से रूबरू होना पड़ रहा है| अध्यापक की सर्विस के दौरान मैं 1980 मे रामपुरा  नगर मे था | उस समय मध्य प्रदेश मे कहीं पर भी  समूह विवाह का प्रचलन नहीं था| हाँ राजस्थान मे जरूर कुछेक स्थानो पर सामूहिक विवाह होने लगे थे|मन मे विचार आया कि  दर्जी समाज का सामूहिक विवाह रामपुरा नगर मे करना चाहिए|स्थानीय दर्जी बंधुओं से निरंतर संपर्क और विचार विमर्श  करने के बाद  सामूहिक विवाह सम्मेलन के  आयोजन करने पर सहमति बनी|
   फलस्वरूप  प्रथम सामूहिक विवाह सम्मेलन  9,10,11 मई 1981 को रामपुरा नगर  मे  रचाया गया |


इस सम्मेलन में केवल 6 जोड़े सम्मिलित हुए| उस जमाने मे सम्मेलन की शादी  को लोग अच्छी नजर से नहीं देखते थे और सम्मेलन के नाम पर नाक भौंह सिकोड़ते थे|ऐसे माहोल मे  दर्जी बंधुओं को प्रेरित करने के लिए मैंने अपनी बेटी छाया  और पुत्र अनिल कुमार का विवाह इसी सम्मेलन मे किया |

पुत्र अनिल कुमार वर्तमान मे डॉ॰अनिल कुमार (वैध्य दामोदर) के नाम से प्रसिद्ध पथरी चिकित्सक की हेसियत मे विख्यात है|
    प्रथम सम्मेलन उम्मीद से ज्यादा सफल हुआ और  न केवल दर्जी समाज ,अपितु अन्य समाज के लोगों ने भी आयोजन की  मुक्त कंठ से  प्रशंसा की |  यह सम्मेलन तीन दिन की अवधि वाला था| मेरे नेतृत्व मे दूसरा सामूहिक विवाह सम्मेलन 1983 मे रामपुरा नगर मे ही  आयोजित किया गया जिसमे 12 जोड़े सम्मिलित हुए| दोनों सम्मेलन दामोदर दर्जी महासंघ के बेनर तले आयोजित हुए|
  रामपुरा 1981 के सम्मेलन की विस्तृत  रिपोर्ट  निम्न लेख की लिंक खोलकर पढ़ सकते हैं-

दर्जी समाज का प्रथम सामूहिक विवाह सम्मेलन ,रामपुरा 1981 ओरिजनल बिल सहित



   समय बीतता गया  |वर्ष 1985 मे मैं रामपुरा से बोलिया ग्राम आगया | सामाजिक आयोजन   करते रहने की प्रवृत्ति के चलते मैंने बोलिया ग्राम मे वर्ष 2006,और 2008  मे  दो सामूहिक विवाह सम्मेलन  आयोजित किये| लेकिन मेरे अन्तर्मन मे एक विचार बार बार उभरता था कि दर्जी समाज मे एक बार निशुल्क सम्मेलन की अवधारणा को अमलीजामा  पहिनाया जाये|  परमात्मा ने यह इच्छा भी पूर्ण की और  सन 2010 मे बोलिया मे निजी खर्च से भव्य निशुल्क समूह विवाह का आयोजन किया जो दर्जी समाज के इतिहास मे स्वर्णिम अक्षरों मे उल्लेख योग्य आयोजन था|
  स्मरणीय है कि 2017 मे  सामूहिक विवाह सम्मेलन करने को लेकर समाज की कई जगह मीटिंग  आयोजित हुई लेकिन बात नहीं बनी तब ऐसी ऊहा पोह की स्थिति से उबरने के लिए मैंने 51 हजार रुपये का सहयोग देकर शामगढ़  मे सम्मेलन को मूर्त रूप दिया |यह सम्मेलन बेहद यादगार साबित हुआ| 

निशुल्क विवाह सम्मेलन ,बोलिया -2010 के विडियो (भाग,1,2,3,4) 


   बंधुओं , भाग्य इंसान को  अपनी उंगली पर नचाता है| 2011 मे मेरा परिवार बोलिया से शामगढ़ आगया |सामाज हितैषी आयोजन करते रहने की प्रवृत्ति के चलते भाई रमेशजी राठौर आशुतोष के कर्मठ सहयोग से आप्लावित होकर  शामगढ़ नगर मे दो-दो वर्षों के अंतराल पर दो सम्मेलन  2012, 2014  मे और तीन वर्ष बाद  2017 मे यादगार सामूहिक विवाह सम्मेलन दामोदर दर्जी महासंघ के बेनर तले आयोजन के जरिये समाज की अनुपम सेवा का अवसर हासिल किया|
सम्मेलन के विडियो भी देख लेते हैं-











  

सम्पूर्ण दर्जी समाज इन्टरनेट पर
     बंधुओं,कहावत है कि 100 शब्द से एक चित्र ज्यादा संदेश देने वाला होता है| विगत 10 वर्षों से मैं दर्जी समाज के व्यक्तियों के फोटो शूट कर रहा हूँ| सामाजिक रीति रस्म -सगाई,शादी,मोसर  मे जाने का  मेरा एक  उद्देश्य दर्जी बंधुओं के फोटो  लेने और बाद मे उन्हें सुधारकर इंटरनेट पर अपलोड करना रहता है|लगभग 5 हजार से ज्यादा फोटो आज नेट पर मौजूद हैं| घर बैठे समाज गंगा का दर्शन करने का यह एक जबर्दस्त तरीका है|
पुरुषों के फोटो तो मैं ले लेता हूँ लेकिन महिलाओं के फोटो लेने मे दिक्कत होती है |


मेरी पौत्री अपूर्वा ने बहुत हद तक मेरी इस समस्या को भी हल कर दिया | महिलाओं के फोटो शूट करने और रजिस्टर मे उनका विवरण दर्ज करने का काम मेरी पौत्री अपूर्वा तथा  बेटी अल्पना और छाया ने किया है|
दर्जी समाज के फोटो की एल्बम की  कुछ लिंक्स देता हूँ-

दामोदर दर्जी समाज के फोटो 

दर्जी महिला समाज 

दर्जी समाज पिक्चर्स 


दर्जी बंधुओं  को सम्मानित करने के चित्र


दर्जी यात्रा चित्र 


दामोदर दर्जी समाज की सामाजिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करने वाली मेरी वेबसाईट दुनियाँ की दर्जी समाज की सबसे बड़ी वेबसाईट है इसमे 500 से भी ज्यादा लेख हैं|लिंक नीचे दे रहा हूँ-

"दर्जी समाज (दामोदर क्षत्रीय)" ब्लॉग के 500 आलेखों की लिंक-सूची


   वाट्सएप पर एक ग्रुप है" दामोदर वंशावली "।इस ग्रुप के माध्यम से  फोटो कैसे देखना है ,सभी तरीके  बताता रहता  हूँ|
   जीवन के 80 वें वर्ष मे  शारीरिक दुर्बलता स्वाभाविक है |इसलिए सामाजिक रीति -रस्मों मे मेरी  उपस्थिति आहिस्ता-आहिस्ता कम होती जा रही  है|लेकिन अन्तर्मन समाज सेवा के नूतन अवसर सृजित  करने  के अरमान सँजोये हुए है|

डॉ.दयाराम आलोक के 79 वे जन्म दिन उत्सव का विडियो

मित्रों ,मैंने अपनी हर्बल चिकित्सा संबंधी वेबसाईट्स में अपने 55  वर्षों के चिकित्सा अनुभवों को प्रतिबिम्बित किया है|मेरे हजारों चिकित्सा -आलेखों के लाखों पाठक पूरे विश्व मे मौजूद हैं|आप भी हर्बल चिकित्सा के अत्यंत उपयोगी लेखों का लाभ ले सकते हैं|

पढ़ें ,समझलें नुस्खे खास 
डाक्टर,वैद न आवे पास||

 हर्बल चिकित्सा की मेरी 6 वेबसाईट्स हैं जिनके पते की लिंक्स नीचे दे रहा हूँ |प्रत्येक ब्लॉग मे लगभग 500 लेख हैं |

सेहत समस्याएँ एवं समाधान 

सरल नुस्खे सेहत उपकार 

उपचार और आरोग्य


घरेलू ,आयुर्वेदिक ,प्राकृतिक उपचार 

हर्बल नुस्खे और आरोग्य   https://ddayaram.blogspot.com/2019/10/1-pages-herbal-nuskhe-aur-aarogya-2010.html

होम्योपैथिक एंड आयुर्वेदिक मेडिसिंस ( अँग्रेजी वेबसाईट)


 मेरी निम्न वेबसाईट भी काफी पोपुलर है-

भजन-सरोवर

अध्यात्म,साहित्य,इतिहास,सामान्य ज्ञान


    ज्ञातव्य है कि मेरी कुल 10 वेबसाईट्स  पर गूगल  कंपनी  विज्ञापन डालती है और इन विज्ञापनो से गूगल को जो आय होती है उसका 68% मुझे पेमेंट होता है| "आम के आम गुठली के दाम " कहावत चरितार्थ होना मेरे लिए सुखकारी अनुभव है|

राजनीति में - 
प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त (1996) होने के बाद बीजेपी की सदस्यता हासिल की|
निम्न पदों पर निर्वाचित ,मनोनीत होकर पार्टी की पूरी शिद्दत से सेवा की 
1)*अध्यक्ष: नगर भाजपा बोलिया 
2)*जिला महामंत्री : अध्यापक प्रकोष्ठ  जिला मंदसौर |
बीजेपी अध्यापक प्रकोष्ठ के महामंत्री की हेसियत मे पचमढ़ी  3 दिवसीय सेमिनार मे सहभागिता की|


3)*सह संयोजक जिला चिकित्सा प्रकोष्ठ पद पर वर्तमान मे सेवारत  हूँ||
   
पत्नी के देहावसान पर मोसर करने का फैसला-

बंधुओं ,25 सितम्बर, 2018 को
मेरी पत्नि  शांतिबाई के दिवंगत होने पर मैंने सम्पूर्ण समाज को आमंत्रित कर विविध मिष्ठान युक्त  मोसर का आयोजन किया जबकि मेरा परिवार 1966 से ही मृत्युभोज का  उपभोग नहीं करता है|  मेरे विचार अपनी जगह सही या गलत कुछ भी हो सकते हैं लेकिन समाज मे दीर्घ काल से प्रचलित एक लोकप्रिय  प्रथा को एकदम खारिज करना मैंने उचित नहीं  समझा और समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए मृत्युभोज  का आयोजन किया| मानस के अंतर्द्वंद्व  की स्थिति से उबरकर इस आयोजन का निर्णय लेना मेरे लिए बेहद अनोखा अनुभव था|
     मित्रों, हमारे आमंत्रित मेहमान देव तुल्य होते हैं ,उनका सत्कार संतुष्टिकारक  मिठाईयुक्त भोजन से ही करना कर्तव्य है|अपने सामर्थ्यानुसार मोसर मे  मेहमान आमंत्रित करना चाहिए|कम संख्या मे भी मेहमानों को मिठाईयुक्त भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति ना हो  तो फिर साग पूड़ी का  विकल्प  उचित है|
  शांतिबाई की द्वितीय पुण्य तिथि  के उपलक्ष मे सामाजिक भोज  का आयोजन  कंचन गंगा मे  किया गया|| कुछ फोटो प्रस्तुत हैं-
https://imgur.com/gallery/Yib513V 

ज्ञान मंदिर प्रकल्प  हेतु आर्थिक सहयोग-

    श्री राम शर्मा आचार्य के अनमोल विचारों के  साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु गायत्री शक्तिपीठ शामगढ़ के परिसर मे ज्ञान मंदिर  प्रकल्प निर्माण  हेतु आर्थिक सहयोग के रूप मे 51 हजार रुपये अर्पित किए |ज्ञान मंदिर प्रतिष्ठान के शुभारंभ के अवसर की तस्वीर और विडियो प्रस्तुत है-
                                                  शिला-लेख
                                                       




दर्जी समाज के विडियो की लिंक्स-

Free Darji mass marriage programme ,Boliya M.P. (Video Part-1)

दर्जी निशुल्क समूह विवाह उत्सव बोलिया (PART 2)

निशुल्क दर्जी समूह विवाह सम्मेलन,बोलिया(पार्ट 3)


निशुल्क दर्जी समूह विवाह सम्मेलन,बोलिया,video (पार्ट 4)

Glimpses of Damodar Mahila Sangeet

Alpana and Vinod Chouhan in Damodar Mahila Sangeet

Neha and Deepesh Darji in Damodar Mahila Sangeet,Shamgarh


छाया पँवार दामोदर महिला संगीत मे 

Aishwarya chouhan in Damodar Mahila Sangeet
Arpita Rathore in Damodar Mahila Sangeet


Sunita in Damodar Mahila Sangeet

Apurva in Damodar Mahila Sangeet

दामोदर दर्जी समूह विवाह उत्सव शामगढ़ -2017, मे पाणिगृहण संस्कार

Arpita Apurva Sadhna in Damodar Mahila Sangeet

Richa Kumari in Damodar Mahila Sangeet

Inaugaration of Gyan Mandir at Gayatri Shaktipeeth Shamgarh by Dr.Aalok

Soma Parmar In Damodar Mahila Sangeet

Chaya and sisters in Damodar Mahila Sangeet

Video of Pictures from Apurva-Vineet Marriage

Free Darji mass marriage programme ,Boliya M.P. (Video Part-1)

Sadhana Jhabua in Damodar Mahila Sangeet

Darzi mass marriage ,Shamgarh -Video part 3

दामोदर दर्जी सम्मेलन मे विशिष्ट अतिथि सम्मान समारोह,शामगढ़-2017

Darji samuhik vivah sammelan Shamgarh 2014 video clip

Dr Dayaram Aalok's nav grih pravesh.AVI

Damodar Darji Samuhik Vivah Sammelan -2014 ,Shamgarh

Dileep Deshbhakt in Damodar mahila sangeet

डॉ.दयाराम आलोक का जन्म दिवस उत्सव

Soma Ranapur in Damodar Mahila Sangeet

Darji Samaj 9th Samuhik Vivah Sammelan Shamgarh -2017

Sadhana Jhabua in Damodar Mahila Sangeet

Apurva - Vineet Marriage photography video

Glimpses of Damodar Mahila Sangeet

Piyush Solanki Neemuch in Damodar mahila sangeet

Apurva -Vineet Wedding Reception susner

shiv hanuman temple shamgarh

Rajesh Yadav in Darji Sammelan Shamgarh

Gayatri Shakti Peeth Shamgarh Video

Apurva Vineet marrriage reception programme

Ritika Rathore in Damodar Mahila Sangeet

Darji Mass Marriage programme shamgarh -Video

दर्जी सामूहिक विवाह सम्मेलन ,शामगढ़ -Video clip

10.12.19

बोद्ध धर्म का इतिहास और ज्ञातव्य तथ्य



बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्यमुनि (गौतम बुद्ध) थे. वे 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व तक रहे. ईसाई और इस्लाम धर्म से पहले बौद्ध धर्म की उत्पत्ति हुई थी. दोनों धर्म के बाद यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है. इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं:
(1) बौद्ध धर्म के संस्थापक थे गौतम बुद्ध. इन्हें एशिया का ज्योति पुंज कहा जाता है.
(2) गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था.
(3) इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे.
(4) सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी मां मायादेवी का देहांत हो गया था.
(5) सिद्धार्थ की सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने उनको पाला.
(6) इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था.
(7) सिद्धार्थ का 16 साल की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ.
(8) इनके पुत्र का नाम राहुल था.
(9) सिद्धार्थ जब कपिलावस्तु की सैर के लिए निकले तो उन्होंने चार दृश्यों को देखा:
(i) बूढ़ा व्यक्ति
(ii) एक बिमार व्यक्ति
(iii) शव
(iv) एक संयासी
(10) सांसारिक समस्याओं से दुखी होकर सिद्धार्थ ने 29 साल की आयु में घर छोड़ दिया. जिसे बौद्ध धर्म में महाभिनिष्कमण कहा जाता है.
(11) गृह त्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की.
(12) आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरू थे.
(13) आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रूद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की.
(14) उरूवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा और अस्सागी नाम के 5 साधक मिले.
(15) बिना अन्न जल ग्रहण किए 6 साल की कठिन तपस्या के बाद 35 साल की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ.
(16) ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने जाने लगे. जिस जगह उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त हुआ उसे बोधगया के नाम से जाना जाता है.
(17) बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है.
(18) बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, कौशांबी और वैशाली राज्य में पालि भाषा में दिए.
(19) बुद्ध ने अपने सर्वाधिक उपदेश कौशल देश की राजधानी श्रीवस्ती में दिए.
(20) इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे:
(i) बिंबसार
(ii) प्रसेनजित
(iii) उदयन
(21) बुद्ध की मृत्यु 80 साल की उम्र में कुशीनारा में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गई. जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है.
(22) मल्लों ने बेहद सम्मान पूर्वक बुद्ध का अंत्येष्टि संस्कार किया.
(23) एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया.
(24) बुद्ध के जन्म और मृत्यु की तिथि को चीनी पंरपरा के कैंटोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है.
(25) बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान पालि त्रिपिटक से प्राप्त होता है.
(26) बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है और इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है.
(27) बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है.
(28) तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है.
(29) बुद्ध के अनुयायी दो भागों मे विभाजित थे:
(i) भिक्षुक- बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन लोगों ने संयास लिया उन्हें भिक्षुक कहा जाता है.
(ii) उपासक- गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को उपासक कहते हैं. इनकी न्यूनत्तम आयु 15 साल है.
(30) बौद्धसंघ में प्रविष्‍ट होने को उपसंपदा कहा जाता है.
(31) प्रविष्ठ बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं-
(i) बुद्ध
(ii) धम्म
(iii) संघ
(32) चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों में विभाजित हो गया:
(i) हीनयान
(ii) महायान
(33) धार्मिक जुलूस सबसे पहले बौद्ध धर्म में ही निकाला गया था.
(34) बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है जिसे बुद्ध पूर्णिमा कहा जाता है.
(35) बुद्ध ने सांसारिक दुखों के संबंध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया है. ये हैं
(i) दुख
(ii) दुख समुदाय
(iii) दुख निरोध
(iv) दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा
(36) सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही. ये साधन हैं.
(i) सम्यक दृष्टि
(ii) सम्यक संकल्प
(iii) सम्यक वाणी
(iv) सम्यक कर्मांत
(v) सम्यक आजीव
(vi) सम्यक व्यायाम
(vii) सम्यक स्मृति
(viii) सम्यक समाधि
(37) बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरांत मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त होता है.
(38) बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के लिए 10 चीजों पर जोर दिया है:
(i) अहिंसा
(ii) सत्य
(iii) चोरी न करना
(iv) किसी भी प्रकार की संपत्ति न रखना
(v) शराब का सेवन न करना
(vi) असमय भोजन करना
(vii) सुखद बिस्तर पर न सोना
(viii) धन संचय न करना
(ix) महिलाओं से दूर रहना
(X) नृत्य गान आदि से दूर रहना.
(39) बुद्ध ने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया.
(40) अनीश्वरवाद के संबंध में बौद्धधर्म और जैन धर्म में समानता है.
(41) जातक कथाएं प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है और पशुओं के रूप में भी.
(42) बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अंतर्गत बुद्ध ने शाक् मुनि के रूप में अपना अंतिम जन्म प्राप्त किया.
(43) सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया था. लेकिन बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी.


मालवा में बौद्ध धर्म का विकास


बुद्ध के जीवनकाल से ही अवन्ति बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुका था। इस क्षेत्र में कई ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने उस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रद्योत- मौर्य काल

इस काल में बौद्ध धर्म के प्रचार कार्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका महाकच्छायन की थी। उनका जन्म उज्जयिनी में हुआ था। बुद्ध से मिलकर वे बहुत प्रभावित हुए थे। फिर तो उन्होंने बुद्ध के उपदेशों को घर- घर तक प्रभावशाली ढ़ग से पहुँचाया। उनके कहने पर समकालीन राजा प्रद्योत ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। उनके सत्प्रयासों से पूरे क्षेत्र में बौद्ध धर्म एक प्रभावशाली धर्म के रुप में उभरा। चूँकि प्रचार व उपदेश का माध्यम वहाँ की स्थानीय भाषा थी, अतः इसकी पहुँच व्यापक थी।
चूँकि बुद्ध के कुछ शिष्य अवन्ति से थे, अतः यह संभव है कि अशोक से पहले भी उज्जैन व साँची में बौद्ध धर्म से जुड़े इमारत बन चुके हैं। महावंश में चैत्यागिरि नाम के एक विहार का उल्लेख मिलता है, जिसकी पहचान साँची से की जाती है, जहाँ अशोक ने भी स्तुप व स्तंभ बनवाया था। अशोक से पहले बना यह चैत्य वर्त्तमान स्तुप नहीं हो सकता, क्योंकि स्तुप- पूजन की परंपरा अशोक के समय से ही शुरु होती है। राजकुमारी देवी ने चैत्यगिरि में एक विहार का निर्माण करवाया था, जिसका पुरातात्विक प्रमाण आज भी मिलता है।
कहा जाता है कि विदिशा की निवासी देवी, जो बाद में अशोक की पत्नी बनी, पहले से ही बौद्ध थी, लेकिन अशोक ने मोगालिपुत्ता तिस्स व अन्य भिक्षुओं के प्रभाव से, परिस्थितिवश, अपना धर्म परिवर्त्तन किया। अशोक के आश्रय में बौद्ध धर्म का बहुत प्रसार हुआ। उसके द्वारा ईंट- निर्मित साँची- स्तुप का बाद में कई बार विस्तार हुआ।

उज्जैन बौद्ध धर्म का केंद्र बना रहा। यहाँ एक विशाल तथा दो घोड़े स्तुप मिले हैं। ईटों के आकार से पता चलता है कि यह मौर्यकालीन है। संभवतः इसका निर्माण भी अशोक ने ही करवाया था। विदिशा मथुरा मार्ग में स्थित तुमैन (तुम्बवन) ये भी अशोक ने कई स्तुप बनवाए थे। इसके अलावा महेश्वर (महिष्मती) से भी बौद्ध इमारतों के प्रमाण मिले हैं। यहाँ मिले मृदभाण्ड से स्पष्ट हो जाता है कि ये किसी- न- किसी रुप से बौद्ध- धर्म से संबद्ध थे।
शुंग- सातवाहन- शक काल
अशोक की मृत्यु के बाद पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में बौद्ध धर्म के विकास में कई अड़चनें आयी। पुष्यमित्र, जो ब्राह्मण धर्म का कट्टर अनुगामी था। कहा जाता है कि उसने कई बौद्ध- निवासों को नष्ट करवा दिया तथा साकल (सियाल कोट, पंजाब) के सैन्य अभियान के दौरान कई बौद्ध- भिक्षुओं की हत्या करवाई।
पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी ने अशोक द्वारा ईंट- निर्मित साँची के स्तुप को ऊपर से प्रस्तर- निर्मित एक भित्ति से ढ़का था। साँची का दूसरा तथा तीसरा स्तुप भी
शुंगकाल में ही निर्मित है। भरहुत के स्तुप के अभिलेखों से पता चलता है कि विदिशा के राजा रेवतीमित्र व उनकी रानियों ने भरहुत के स्तुप के निर्माण में सहयोग दिया था।
कण्व तथा सातवाहन काल में इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था। इसी काल में साँची के मुख्य स्तुप के चारों तरफ तथा तीसरे स्तुप के एक तरफ प्रसिद्ध द्वार बनाये गये। यह निर्माण राजा शतकर्णी के शासन में हुआ।
बौद्ध धर्म का अस्तित्व पश्चिमी क्षत्रपों के काल में भी बना रहा। उज्जैन में मिला चाहरदीवारी का हिस्सा, जो संभवतः बौद्ध स्तुप का ही एक हिस्सा था, इसी काल में बना माना जाता है।
इस काल में साँची बौद्ध तीर्थ का केंद्र बन गया। मालवा व मालवा के बाहर से भी लोग यहाँ आने लगे। इनका उल्लेख यहाँ के अभिलेखों में मिलता है।
अशोक काल के बाद दूसरी सदी ई. पू. के अंत में बौद्ध धर्म की हैमवत शाखा को प्रसिद्धि मिली। यह धर्म के विभिन्न स्रोतों से प्रभावित था। इसके प्रचार में गोतीपुत की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्हें "काकनाव प्रभासन' (काकनाव का प्रकाश) की उपाधि से सम्मानित किया गया था। बुद्ध के शिष्य महाभोगलान व सारिपुत्र के भ साँची व सतधारा के स्तुपों में डाला गया था।
साँची के बौद्ध थेरवादी थे, परंतु प्रथम सदी ई. पू. में बौद्ध धर्म ने एक नया मोड़ लिया। अभिलेखों से पता चलता है कि अन- आचार्याकुल (अन्याचार्या कुल) अस्तित्व में आ गया।
कुषाण काल की बुद्ध व बौधिसत्वों की मूर्तियों से पता चलता है कि साँची में बाहरी प्रभाव का आना शुरु हो गया था। साँची में मिला वीटिम अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि मालवा की साधारण जनता में इसका प्रसार होने लगा था। स्तुपों के निर्माण में सभी वर्ग व व्यवसाय के लोगों ने सहयोग दिया था।
बौद्ध संतों को कुछ विशेष उपाधियाँ देने का प्रचलन शुरु हुआ, जैसे अया (उदार स्वामी), थेरा (venerable ), भदत (सबसे सऋदय), मानक (ग्रंथों का पठन करने वाला), धमकाथिका (नियम का उपदेशक), सधिविहारी (साथ में वास करने वाला भिक्षु), विनायक (शिक्षक), सुतातिक व सुतातिकिनी (जो सुत्तो की अच्छी जानकारी रखता है), पंचनेकयिका (पाँच निकायों व सपुरिसा की जानकारी रखने वाला संत)।

9.12.19

पारसी समाज का धर्म व इतिहास



आधुनिक अफगानिस्तान के उत्तरी भाग में जन्मे पैगंबर जरथुष्ट्र द्वारा स्थापित पहला एकेश्वरवाद मत, पारसी धर्म कहलाया। जरथुष्ट्र का काल 1700-1500 ईपू के बीच के बीच माना जाता है। जरथुष्ट्र को राजा सुदास तथा ऋग्वेद के अंगिरा, बृहस्पति आदि ऋषियों का समकालिक माना जाता है। एक ज़माने में पारसी धर्म ईरान का राजधर्म हुआ करता था। अखेमनी साम्राज्य के समय पारसी मध्य एशिया का प्रमुख धर्म था। 7वीं सदी मे इस्लाम के उदय के बाद अरब आक्रमणकारियों से बचकर समुद्र के रास्ते भागे पारसियों ने गुजरात में संजान के निकट शरण ली। बाद में वे लोग उदवाडा और नवसारी में बस गए। अपने खुले विचारों के कारण पारसी लोग काफी पहले शिक्षित हुए और ज्यादातर मुम्बई में बस गए। भारत में सबसे अधिक पारसी मुम्बई मे ही हैंं।
जेंद अवेस्ता पारसियों का सर्व प्रमुख ग्रंथ है जिसकी भाषा ऋग्वेद के समान है। ‘जेंद अवेस्ता' में भी वेद के समान गाथा (गाथ) और मंत्र (मन्थ्र) हैं। कई मायने में पारसी धर्म सनातन या वैदिक हिन्दू धर्म के समान है हलांकि, आप केवल जन्म से ही पारसी हो सकते हैं। प्राचीन युग के पारसियों और वैदिक आर्यों की प्रार्थना, उपासना और कर्मकांड में कोई ज्यादा भेद नजर नहीं आता। वे अग्नि, सूर्य, वायु आदि प्रकृति तत्वों की उपासना और अग्निहोत्र कर्म करते थे। आज भी वे पंचभूतों का आदर करते हैं किंतु अग्नि को सबसे पवित्र माना जाता है। पारसी धर्म की शिक्षा हैः हुमत, हुख्त, हुवर्श्त जो संस्कृत में सुमत (अच्छा विचार), सूक्त (अच्छा वचन), सुवर्तन (अच्छा व्यवहार) कहलाता है। यह शिक्षा ज्यादातर पारसियों के जीवन में दिखाई देता है।
भारत में आधी आबादी के साथ दुनिया में पारसियों की संख्या डेढ़ लाख के आसपास है। देर से विवाह या सिंगल रहने की प्रवृत्ति के कारण पारसियों की संख्या तेजी से घटी है। भारत सरकार द्वारा समर्थित ‘जियो पारसी’ योजना से इनकी संख्या में वृद्धि होने की आशा है। कम संख्या के बाद भी पारसियों ने सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थित दर्ज कर देश को गौरवान्वित करने में अपनी भूमिका निभाई है। टाटा, गोदरेज, वाडिया उद्योग समूह, दादाभाई नौरोजी, मैडम भीखाजी कामा, सोली सोराबजी आदि कुछ नाम इस छोटे से समूह के योगदान को गिनाने के लिए काफी है।
पारसी धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है, इसकी उत्पत्ति का पता द्वितीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व से लगाया जा सकता है। जोरास्ट्रियनवाद के अस्तित्व की पुष्टि करने वाले शुरुआती रिकॉर्ड 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के हैं।
पारसी धर्म की शुरुवात फारस (persia - Modern day Iran) में हुई थी।
हिंदू धर्म की तरह पारसी धर्म में भी ‘अग्नि’ को पवित्र माना जाता है।
पारसी धर्म एक एकेश्वरवादी (monotheist) आस्था है (अर्थात एक ईश्वर को मानना)।
‘अहोरा माज़दा’ पारसी धर्म में पूजा की एकलौते और सर्वोच्च भावना है। वह पारसी धर्म का निर्माता और एकमात्र देवता है।
आग पारसी धर्म का एक प्राथमिक प्रतीक है।
पारसी धर्म में अग्नि मंदिर, पारसियों के लिए पूजा का स्थान है, जिसे अक्सर ‘दार-ए मेहर’ (फारसी में) या ‘अगियारी ‘(गुजराती में) कहा जाता है। पारसी धर्म में, अग्नि (अतर), स्वच्छ जल (अवन) के साथ मिलकर, अनुष्ठान शुद्धता के कारक हैं।
कार्यात्मक रूप से, अग्नि मंदिरों को उनके भीतर अग्नि की सेवा के लिए बनाया जाता है, और अग्नि मंदिरों को उनके भीतर अग्नि आवास के ग्रेड के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है।
आग के तीन ग्रेड हैं,
1. अताश ददगाह (Atash Dadgah)
2. अताश अदरान (Atash Adaran)
3.अताश बेहराम (Atash Behram)
दुनिया में अधिकांश जोरोस्ट्रियन भारत में रहते हैं (आमतौर पर उन्हें 'पारसी’ के रूप में जाना जाता है)।
हालाँकि पारसी (आधुनिक दिन ईरान) में जोरास्ट्रियनवाद की उत्पत्ति हुई थी, लेकिन दुनिया में सबसे बड़ी आबादी जोरास्ट्रियन की भारत में है।
636-651 BCE में फारस (persia) पर अरब के हमले के दौरान, पारसी समुदाय के लोग पारस से भारतीय उपमहाद्वीप में चले गए इस दौरान कई ईरानी (जिन्हें अब पारसी कहा जाता है) ने अपनी धार्मिक पहचान को संरक्षित करने के लिए फारस से भारत की ओर पलायन करने का विकल्प चुना।
पारसी हिदुओ की तरह 'दाह संस्कार' में नहीं मानते और नाही ईसाईयो की तरह 'दफ़न' में।
, एक ऐसी जगह है जहाँ मृतक के शवों को रखा जाता है और मेहतर पक्षियों (जैसे गिद्ध) को उजागर किया जाता है, जो उनकी मान्यताओं के अनुसार मृतकों से निपटने का सबसे पवित्र तरीका है।
पारसी परंपरा में एक मृत शरीर को अशुद्ध मानती है, अर्थात संभावित प्रदूषक। पृथ्वी या आग के प्रदूषण को रोकने के लिए, मृतकों के शवों को एक टॉवर के ऊपर रखा जाता है और उन्हें सूरज के संपर्क में लाया जाता है ताकि सूरज की गर्मी और गिद्धो की वजह से शव को नष्ट किया जाता है! आज भारत और पूरी दुनिया में पारसी लोगोने 'दाह संस्कार' करना या दफ़न करना शुरू कर दिया है।
पारसी धर्म एक अति प्राचीन धर्म है।इसकी शुरुआत वैदिक काल में ही प्रारंभ हुई थी।
पारसी धर्म के प्रणेता ज़रस्तु नाम के ईश्वर दूत थे, जिन्होंने अहूर माज़दा को मुख्य देवता माना था।
यह धर्म तत्कालीन फारस की खाड़ी याने वर्तमान ईरान के आसपास के क्षेत्र में प्रचलित था।
पारसी धर्म में अग्नि एवं यज्ञ ही प्रमुख रूप से पूजनीय होते हैं। यहां पर ईश्वर अवश्य ही अजन्मा एवं सर्वव्यापी माना गया है।
काल के प्रवाह में पारसी धर्म स्वंय के अस्तित्व के लिए आज भी संघर्ष ही कर रहा है।
इस्लाम के उदय के साथ पारसी धर्म एवं पारसी शासकों का पतन एवं पलायन शुरू हुआ जो आज भी जारी है।पारसियों ने हिंदुस्तान के विकास में काफी योगदान दिया है। टाटा वाडिया गोदरेज प्रमुख औद्योगिक घराने है।

3.12.19

ईसाई धर्म की जानकारी और इतिहास





ईसाई धर्म से जुड़े महत्‍वपूर्ण तथ्‍य:
(1) ईसाई धर्म के संस्थापक हैं ईसा मसीह.
(2) ईसाई धर्म का प्रमुख ग्रंथ है- बाइबिल.
(3) ईसा मसीह का जन्म जेरूसलम के पास बैथलेहम में हुआ था.
(4) ईसा मसीह की माता का नाम मैरी और पिता का नाम जोसेफ था.
(5) ईसा मसीह ने अपने जीवन के 30 साल एक बढ़ई के रूप में बैथलेहम के पास नाजरेथ में बिताए.
(6) ईसाइयों में बहुत से समुदाय हैं मसलन कैथोलिक, प्रोटैस्टैंट, आर्थोडॉक्स, मॉरोनी, एवनजीलक.
(7) क्रिसमस यानी 25 दिसंबर को ईसा मसीह के जन्मदिन के उपलक्ष में मनाया जाता है.
(8) ईसा मसीह के पहले दो शिष्य थे पीटर और एंड्रयू.
(9) ईसा मसीह को सूली पर रोमन गवर्नर पोंटियस ने चढ़ाया था.
(10) ईसा मसीह को 33 ई. में सूली पर चढ़ाया गया था.
(11) ईसाई धर्म का सबसे पवित्र चिह्न क्रॉस है.
(12) ईसाई एकेश्वरवादी हैं, लेकिन वे ईश्वर को त्रीएक के रूप में समझते हैं- परमपिता परमेश्वर, उनके पुत्र ईसा मसीह (यीशु मसीह) और पवित्र आत्मा.

‘ईसाई धर्म’ के प्रवर्तक ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) थे, जिनका जन्म रोमन साम्राज्य के गैलिली प्रान्त के नज़रथ नामक स्थान पर 6 ई. पू. में हुआ था। जिनका जन्म रोमन साम्राज्य के गैलिली प्रान्त के नज़रथ नामक स्थान पर 6 ई. पू. में हुआ था। उनके पिता जोजेफ़ एक बढ़ई थे तथा माता मेरी (मरियम) थीं। वे दोनों यहूदी थे। ईसाई शास्त्रों के अनुसार मेरी को उसके माता-पिता ने देवदासी के रूप में मन्दिर को समर्पित कर दिया था। ईसाई विश्वासों के अनुसार ईसा मसीह के मेरी के गर्भ में आगमन के समय मेरी कुँवारी थी। इसीलिए मेरी को ईसाई धर्मालम्बी ‘वर्जिन मेरी (कुँवारी मेरी) तथा ईसा मसीह को ईश्वरकृत दिव्य पुरुष मानते हैं।
ईसा मसीह के जन्म के समय यहूदी लोग रोमन साम्राज्य के अधीन थे और उससे मुक्ति के लिए व्याकुल थे। उसी समय जॉन द बैप्टिस्ट नामक एक संत ने ज़ोर्डन घाटी में भविष्यवाणी की थी कि यहूदियों की मुक्ति के लिए ईश्वर शीघ्र ही एक मसीहा भेजने वाला है। उस समय ईसा की आयु अधिक नहीं थी, परन्तु कई वर्षों के एकान्तवास के पश्चात् उनमें कुछ विशिष्ट शक्तियों का संचार हुआ और उनके स्पर्श से अंधों को दृष्टि, गूंगों को वाणी तथा मृतकों को जीवन मिलने लगा। फलतः चारों ओर ईसा को प्रसिद्धि मिलने लगी। उन्होंने दीन दुखियों के प्रति प्रेम और सेवा का प्रचार किया।
यरुसलम में उनके आगमन एवं निरन्तर बढ़ती जा रही लोकप्रियता से पुरातनपंथी पुरोहित तथा सत्ताधारी वर्ग सशंकित हो उठा और उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाने का प्रयास किया। यहूदियों की धर्मसभा ने उन पर स्वयं को ईश्वर का पुत्र और मसीहा होने का दावा करने का आरोप लगाया और अन्ततः उन्हें सलीब (क्रॉस) पर लटका कर मृत्युदंड की सज़ा दी गई। परन्तु सलीब पर भी उन्होंने अपने विरुद्ध षड़यंत्र करने वालों के लिए ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उन्हें माफ़ करे, क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या कर रहे हैं।
ईसाई मानते हैं कि मृत्यु के तीसरे दिन ही ईसा मसीह पुनः जीवित हो उठे थे। ईसा मसीह के शिष्यों ने उनके द्वारा बताये गये मार्ग अर्थात् ईसाई धर्म का फ़िलीस्तीन में सर्वप्रथम प्रचार किया, जहाँ से वह रोम और फिर सारे यूरोप में फैला। वर्तमान में यह विश्व का सबसे अधिक अनुयायियों वाला धर्म है। ईसाई लोग ईश्वर को ‘पिता’ और मसीह को ‘ईश्वर पुत्र’ मानते हैं। ईश्वर, ईश्वर पुत्र ईसा मसीह और पवित्र आत्मा–ये तीनों ईसाई त्रयंक (ट्रिनीटी) माने जाते हैं।
ईसाई धर्म की जानकारी –
प्रथम मिशनरियों में से सबसे सफल थे संत पौलुस; उनकी यात्राओं का वर्णन तथा उनके पत्र बाईबिल के उत्तरार्ध में सुरक्षित हैं। उस समय अंतिओक (Antioch) रोमन साम्राज्य का तीसरा शहर था, ईस का उत्तराधिकारी संत पेत्रुस यहीं चले आए और उस केंद्र से संत पौलुस ने एशिया माइनर, मासेदोनिया तथा यूनान में ईसाई धर्म का प्रचार किया। बाद में राजधानी रोम ईसाई धर्म का प्रधान केंद्र बना। वहीं संत पेत्रुस (67 ई.) और संत पौलुस शहीद हो गए। बाइबिल का उत्तरार्ध प्रथम शताब्दी ई. के उत्तरार्ध में लिखा गया।
सन् 100 ई. तक भूमध्यसागर के सभी निकटवर्ती देशों और नगरों में, विशेषकर एशिया माइनर तथा उत्तर अफ्रीका में ईसाई समुदाय विद्यमान थे। तीसरी शताब्दी के अंत तक ईसाई धर्म विशाल रोमन साम्राज्य के सभी नगरों में फैल गया था; इसी समय फारस तथा दक्षिण रूस में भी बहुत से लोग ईसाई बन गए। इस सफलता के कई कारण हैं। एक तो उस समय लोगों में प्रबल धर्मजिज्ञासा थी, दूसरे ईसाई धर्म प्रत्येक मानव का महत्व सिखलाता था, चाहे वह दास अथवा स्त्री ही क्यों न हो। इसके अतिरिक्त ईसाइयों में जो भातृभाव था उससे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् ईसाई संसार में चर्च की एकता के आंदोलन को अधिक महत्व दिया जाने लगा। फलस्वरूप खंडन-मंडन को छोड़कर बाइबिल में विद्यमान तत्वों के आधार पर चर्च के वास्तविक रूप को निर्धारित करने के प्रयास में इसपर अपेक्षाकृत अधिक बल दिया जाने लगा कि चर्च ईसा का आध्यात्मिक शरीर है। ईसा उसका शीर्ष है और सच्चे ईसाई उस शरीर के अंग हैं।
बाइबिल – Bible
ईसाई धर्म का पवित्र ग्रन्थ बाइबिल है, जिसके दो भाग ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट हैं। ईसाईयों का विश्वास है कि बाइबिल की रचना विभिन्न व्यक्तियों द्वारा 2000-2500 वर्ष पूर्व की गई थी। वास्तव में यह ग्रन्थ ई. पू. 9वीं शताब्दी से लेकर ईस्वी प्रथम शताब्दी के बीच लिखे गये 73 लेख शृंखलाओं का संकलन है, जिनमें से 46 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में संकलित हैं। जहाँ ओल्ड टेस्टामेंट में यहूदियों के इतिहास और विश्वासों का वर्णन है, वहीं न्यू टेस्टामेंट में ईसा मसीह के उपदेशों एवं जीवन का विवरण है।
चर्च (Church)
चर्च (Church) शब्द यूनानी विशेषण का अपभ्रंश है जिसका शाब्दिक अर्थ है “प्रभु का”। वास्तव में चर्च (और गिरजा भी) दो अर्थों में प्रयुक्त है; एक तो प्रभु का भवन अर्थात् गिरजाघर तथा दूसरा, ईसाइयों का संगठन। चर्च के अतिरिक्त ‘कलीसिया’ शब्द भी चलता है। यह यूनानी बाइबिल के ‘एक्लेसिया’ शब्द का विकृत रूप है; बाइबिल में इसका अर्थ है – किसी स्थानविशेष अथवा विश्व भर के ईसाइयों का समुदाय। बाद में यह शब्द गिरजाघर के लिये भी प्रयुक्त होने लगा।
सम्प्रदाय– 
यद्यपि ईसाई धर्म के अनेक सम्प्रदाय हैं, परन्तु उनमें दो सर्वप्रमुख हैं—
1). रोमन कैथोलिक चर्च–इसे ‘अपोस्टोलिक चर्च’ भी कहते हैं। यह सम्प्रदाय यह विश्वास करता है कि वेटिकन स्थित पोप ईसा मसीह का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी है और इस रूप में वह ईसाईयत का धर्माधिकारी है। अतः धर्म, आचार एवं संस्कार के विषय में उसका निर्णय अन्तिम माना जाता है। पोप का चुनाव वेटिकन के सिस्टीन गिरजे में इस सम्प्रदाय के श्रेष्ठ पादरियों (कार्डिनलों) द्वारा गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है।
2). प्रोटेस्टैंट–15-16वीं शताब्दी तक पोप की शक्ति अवर्णनीय रूप से बढ़ गई थी और उसका धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, सभी मामलों में हस्तक्षेप बढ़ गया था। पोप की इसी शक्ति को 14वीं शताब्दी में जॉन बाइक्लिफ़ ने और फिर मार्टिन लूथर (जर्मनी में) ने चुनौती दी, जिससे एक नवीन सुधारवादी ईसाई सम्प्रदाय-प्रोटेस्टैंट का जन्म हुआ, जो कि अधिक उदारवादी दृष्टिकोण रखते हैं।
ईसाई धर्म पवित्र आत्मा में विश्वास करता है और मानता है कि पवित्र आत्मा जीवन देने वाला भगवान है। वह पिता और पुत्र से बाहर आता है, और पिता और पुत्र के साथ पूजा और सम्मान किया जाता है। मान लें कि पवित्र आत्मा द्वारा दिया गया नया जीवन पुनर्जन्म ले सकता है। पुनर्जन्म पिता के चुनाव, पुत्र की छुड़ौती, और पवित्र आत्मा के नवीकरण में भी दिखाई देता है।
ईसाईयों का विकास चर्च से अविभाज्य है। चर्च को सभी सम्मानित लोगों की मां कहा जाता है। यह पवित्र और पवित्र है, और यह सार्वभौमिक और सार्वभौमिक भी है। चर्च एक निश्चित स्थान तक सीमित नहीं है, लेकिन पूरी दुनिया में फैल गया है। चर्च ईश्वर और उसके विश्वास की स्वीकृति के कारण एकजुट हो जाता है।
ईसाई मानते हैं कि मसीह में कोई मौत नहीं है, केवल शाश्वत खुशी है। अनन्त जीवन भगवान प्रभु में हमेशा के लिए भगवान द्वारा चुना और संरक्षित किया जाता है। यह भगवान की पसंद है, भगवान की पसंद और आरक्षण के कारण, यीशु मसीह की छुड़ौती ने पवित्र आत्मा से नया जीवन प्राप्त किया है।
ईसाई धर्म ईश्वर से प्यार करने के रूप में अपने सच्चाई और कोर के विश्वास को जोड़ता है (आपको भगवान से प्यार करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए - अपने भगवान) और अपने प्रेमी को अपने आप के रूप में (बदला लेने के लिए, न ही अपने लोगों को दोष देना, बल्कि दूसरों को अपने आप से प्यार करना) सबसे मौलिक सिद्धांतों में से एक प्यार के कानून को सबसे बड़ा कानून मानना है। प्यार में गिरना भी नए नियम में मुख्य आदेश बन जाता है, और मानता है कि यह आध्यात्मिक सच्चा प्यार और पवित्र एकाग्रता मसीह यीशु में अवशोषित है, और इसलिए इसे प्यार का धर्म भी कहा जाता है।
ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म और इस्लाम को तीन प्रमुख धर्म भी कहा जाता है। हालांकि, ईसाई धर्म पैमाने और प्रभाव दोनों के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है। ईसाई धर्म के मानव विकास के इतिहास में हमेशा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अपरिवर्तनीय महत्वपूर्ण भूमिका और दूरगामी प्रभाव पड़ा है। अब तक, जापान को छोड़कर प्रमुख विकसित देशों, ईसाई संस्कृति का प्रभुत्व वाले देश हैं। विशेष रूप से यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और ओशिनिया में, ईसाई धर्म ने मानव सभ्यता के सभी पहलुओं को आकार दिया है, भले ही राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और कलात्मक।

भारत में ईसाई धर्म का प्रवेश – 
कहा जाता है कि भारत में ईसाई धर्म का प्रचार संत टॉमस ने प्रथम शताब्दी में चेन्नई में आकर किया था। किंवदंतियों के मुताबिक, ईसा के बारह प्रमुख शिष्यों में से एक सेंट थॉमस ईस्वी सन 52 में पहुंचे थे। कहते हैं कि उन्होंने उस काल में सर्वप्रथम कुछ ब्राह्मणों को ईसाई बनाया था। इसके बाद उन्होंने आदिवासियों को धर्मान्तरित किया था। इसके बाद बड़े पैमाने पर भारत में ईसाई धर्म ने तब पांव पसारे जब मदर टेरेसा ने भारत आकर अपनी सेवाएं दी। इसके आलावा अंग्रेजों का शासन प्रारंभ हुआ था तब भी ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ था।


सिख धर्म की जानकारी -डॉ.आलोक


दुनियाभर में कई धर्म और जाति के लोग जाते है। सभी धर्म अपनी खास मान्यताओं और रिवाजों के लिए अपनी एक अलग पहचान रखते है। ऐसा ही एक धर्म है सिख धर्म। बाकी धर्मों में जहाँ लोगों के अलग-अलग सरनेम लगाए जाते है वहीं पर केवल सिख धर्म ही एक ऐसा धर्म है जहां सरनेम की जगह पुरुषों के नाम के साथ 'सिंह' लगाया जाता है, तो महिलाओं के नाम के साथ 'कौर' लगाने का रिवाज है। क्या आप जानना चाहेंगे कि ऐसा कब से शुरू हुआ।
हालांकि सिख धर्म में प्रारम्भ में ये रिवाज नहीं था, बल्कि बाद में इसे शुरू किया गया था। सिख धर्म के अनुसार ऐसा माना गया है कि सन् 1699 के आसपास भारतीय समाज में जाति प्रथा का इस कदर बोलबाला था कि ये एक-दूसरे के लिए अभिशाप बन गया था। जातिवाद की वजह से सिखों के दसवें गुरु 'गुरु गोविन्द सिंह' काफी चिंतित रहा करते थे। वे चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता निकले और किसी भी प्रकार से यह कुप्रथा समाप्त हो जाए। इसलिए उन्होंने 1699 में वैशाखी का पर्व मनाया।
उस दिन उन्होंने अपने सभी अनुयायियों को एक ही सरनेम रखने का आदेश दिया, ताकि इससे किसी की जाति का पता ना चले और जातिप्रथा पर लगाम लग सके। इसलिए गुरु गोविन्द सिंह ने पुरुषों को 'सिंह' और महिलाओं को 'कौर' सरनेम से नवाजा। कहा जाता है कि तभी सिख धर्म को मानने वाले पुरुष अपने नाम के साथ सिंह और महिलाएं अपने नाम के साथ कौर लगाती है। इतना ही नहीं सिंह और कौर सरनेम लगाने का भी एक खास अर्थ भी होता है। सिंह और कौर में सिंह का आशय होता है 'शेर' तो कौर का आशय होता है 'राजकुमारी'।गुरु गोविन्द सिंह जी चाहते थे कि उनके अनुयायी सिर्फ एक धर्म के नाम से जाने जाये ना कि अलग-अलग जाति से। इसलिए आप देखंगे कि सिख धर्म में जातिप्रथा ना के बराबर है लेकिन बाकी धर्म जैसे कि हिन्दू और मुस्लिम में जातिप्रथा की स्थिति काफी भयावह है।बेशक़ गुरु साहेबान (सिख गुरु) ने हिन्दू समाज की सबसे बड़ी लाहनत, जाति पाति प्रणाली का, सिद्धांत और अमल के स्तर पर ज़ोरदार खंडन करते हुए, सिख समाज में इसकी पूरी तरह से मनाही कर दी थी। गुरु काल के बाद धीरे धीरे सिखी के बुनियादी सिद्धांत कमज़ोर पड़ने शुरू हो गए। जिन हिंदूवादी अभ्यासों का गुरु साहेबान ने खंडन किया था, उन्होंने सिख धर्म और समाज को फिर से अपने क़ातिलाना शिकंजे में ले लिया। हिन्दूवाद के दुष्प्रभावों का सबसे गाढ़ा इज़हार सिख पंथ में जात पात प्रणाली की फिर से अमल के रूप में हुआ। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण और हवाले मिलते हैं जो उनीसवीं सदी तक सिख पंथ के फिर से जात-पात प्रबंध की मुकम्मल जकड़ में आ जाने की पुष्टि करते हैं।
उनीसवीं सदी के दुसरे अर्ध दौरान बेशक़ सिंह सभा लहर द्वारा आरंभ सुधारमुखी गतिविधियों ने सिख समाज को हिंदूवादी प्रभावों से मुक्त करने में कुछ काबिले-तारीफ़ सफलताएं हांसिल की। लेकिन जात-पात का कोढ़ सिख समाज में इस कदर फ़ैल चुका था कि 'सिंघ सभा लहर' के आगूओं की इंक़लाबी कोशिशों के बावजूद सिख पंथ इस नामुराद रोग के असरों से मुक्त न हो सका। फिर भी सिंह सभा लहर द्वारा सिखी के मूल सिद्धान्तों और मौलिक परम्पराओं की फिर से स्थापति के लिए चलाई वैचारिक मुहीम का इतना असर ज़रूर हुआ कि पंथ के रौशन ख्याल हिस्सों में जात-पात को ख़त्म करने ले लिए न्या जोश और उत्साह पैदा हो गया और उन्होंने सिख समाज को इस हिंदूवादी लाहनत से जुदा करने के लिए तीखी वैचारिक मुहीम शुरू कर दी। नतीजतन, सिख पंथ में जात-पात की खुली तारीफ करने वाले तत्व, खासतौर पर सिखी में, ब्राह्मणवादी खोट मिलाने वाला मुख्य वाहक बना। महंत-पुजारी 'परिवार' सिखी सुधार लहर के हमले की सीधी मार तले आ गया और सिख पंथ के धार्मिक केंद्रों और अभ्यासों में जात-पातिए भेदभाव का खुला प्रदर्शन पहले जितना आम नहीं रहा। पर जहाँ तक आम सामाजिक जीवन का संबंध है, वहां जात पातिए भेदभाव और बाँट-अलगता जैसे की तैसी बरकरार रही। खासतौर पर ग्रामीण समाज में कथित ऊँची जात वर्गों के 'नीच' और 'अछूत' समझे जाते वर्गों के प्रति जातिय अभिमानी तरीकों और बर्ताव में कोई कमी नहीं आई।
सच यह था कि सिख पंथ में से ब्राह्मण वर्ग जिस्मानी तौर पर भले ही गायब हो चुका था लेकिन सोच के स्तर पर वह सिख समाज में ज्यों का त्यों हाज़िर-नाज़िर था। रोज़मर्रा ज़िन्दगी में जात पातिए भेदभाव और विरोध-अलगता के हिसाब से हिन्दू और सिख समाज में कोई मूलभूत अंतर नहीं रहा। हाँ, गुरु साहेबान की इंक़लाबी विचारधारा की प्रेरणा और प्रभाव तले सिख लहर द्वारा अपने आरंभिक दौर में पूरे किये इंक़लाबी कार्यों की बदौलत सिख समाज में जात पातिए दर्जाबंदी की बुन-बनावट में ज़रूर बड़ा बदलाव आ गया था। जहाँ हिन्दू समाज में ब्राह्मण वर्ग का समाजी दर्जा सब से ऊँचा माना जाता है, वहां सिख समाज में धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ग के प्रभुत्व को पूरी तरह से नकारा है।लेकिन समय पड़ने से जैसे ही सिख समाज फिर से जात पातिए प्रणाली की जकड़ में आ गया तो वह वर्ग जिन्होंने खालसा पंथ के इंक़लाबी दौर में ज़्यादा गतिशील भूमिका निभाने का नाम कमाया था और जिन्हें रिवायती हिन्दू जात पातिए दर्जाबंदी में ब्राह्मण वर्ग से एक या दो दर्ज नीचे समझा जाता था, वह सिख समाज में ऊँचा सामाजिक दर्जा हासिल कर गए। इस तरह, ग्रामीण सिख समाज में जट्ट वर्ग ने और शहरी सिख समाज में खत्री-अरोड़ा वर्ग ने 'सवर्ण जातियों' वाला सामाजिक रुतबा हासिल कर लिया जबकि जात पात की जकड़ में आये वर्गों का पहले वाला दर्जा ही बरक़रार रहा। 'पछड़ी' समझी जाने वाली और अन्य जातियों के सामाजिक दर्जे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इस सामाजिक यथार्थ की राजनीतिक क्षेत्र में परछाईं पड़नी स्वाभाविक थी। ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में यह बात ज़्यादा चुभनिए रूप में सामने आई।
गाँव की ग्रामीण ज़िन्दगी की सामाजिक एवं आर्थिक हक़ीक़त यह है कि ग्रामीण दलित वर्ग ज़मीन जायदाद से वंचित, सामाजिक तौर पर सबसे ज़्यादा लताड़ा हुआ, तीखी आर्थिक लूट-खसोट और चुभनिए सामाजिक ज़बर और दबाव का शिकार है। उसकी ज़िन्दगी में हिन्दू सवर्ण जातियों का बहुत सीधा दख़ल नहीं। खेती में मेहनत मज़दूरी करते और ग्रांव में आम जीवन बसर करते उसका ज़्यादातर सीधा वास्ता जट्ट से ही पड़ता है। इस तरह आर्थिक लूट-खसोट और सामाजिक ज़बर, दोनों ही पक्षों से उसका तुरंत विरोध जट्ट किसान से ही है। इस में सीधे रूप में हिन्दू सवर्ण जातियां कहीं भी नहीं आतीं (सिवा ग्रामीण बनिए के, जो दलित वर्ग की आर्थिक मजबूरियों का फायदा उठा के सूदखोरी आदि के ज़रिये उसकी आर्थिक लूट-खसोट में सहभागी बनता है). सो, यह सामाजिक आर्थिक फैक्टर ग्रामीण दलित वर्ग को राजनीतिक तौर पर अकाली दल जिसे कि ग्रामीण क्षेत्र में जट्ट किसानों की राजनीतिक जमात के रूप में ही पहचाना जाता है, के विरोध की तरफ धकेलते हैं। दूसरी तरफ, समूचे भारत में दलित वर्ग, जैसे पंजाब का दलित भाईचारा, भी कोंग्रेस पार्टी को अपना हितैषी पक्ष के रूप में देखता है। उसकी यह धारणा कई पक्षों के मिलेजुले प्रभाव का नतीजा है।
सब से बड़ी बात यह है कि मोहन दास कर्मचंद गाँधी ने आज के इतिहास में छुआछूत विरुद्ध तीखी लड़ाई शुरू करने और भारत में युगों युगों से मानवीय हक़ों से वंचित किये हुए कर्मों के मारे करोड़ों जनों को भारतीय समाज और राज्य में बराबरी के मानवीय अधिकार उपलब्ध कराने का 'पूण्य' कमा के दलित वर्गों के सर पर अहसानों का कर्ज़ चढ़ा दिया कि कोंग्रेसी लीडर पचास सालों तक निरंतर इस कर्ज़े का सूद वसूल करते आ रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित वर्ग को सरकारी नौकरियों से ले कर चुने हुए महकमों तक आरक्षण की सहूलियत और ऐसी ही और रियायतें देने से इस वर्ग की कांग्रेस पार्टी से सांझ और पक्की हो गई। इस के उलट, सिंह सभा लहर द्वारा शुरू सिखी सुधार लहर का यश घट जाने के बाद सिख लीडरों ने जात पात के खात्मे के कार्य को लगभग नज़रअंदाज़ ही कर दिया। भारत की आज़ादी के संग्राम के दौरान सिख लीडरों की तरफ से दलित वर्ग के हितों की पैरवी की शायद ही कोई उत्साहित उदहारण मिलती हो। आज़ादी के बाद बेशक़ अकाली लीडरों ने कांग्रेस पार्टी की दलित वर्ग को रिजर्वेशन देने जैसी नीतियों का खुल्लम-खुल्ला विरोध तो नहीं किया पर सिख समाज के अंदर ही कथित उच्च जातियां की इस मसले पर असली भावनाएं कभी भी गुप्त नहीं रहीं। उनकी जात-पातिए भड़ास अक्सर तहज़ीब की हदें पर पार करतीं और दलित संवेदना को रह रह कर घायल करती रहीं। इस से दलित वर्ग, डर और असुरक्षा की भावना से, कांग्रेस पार्टी का और ज़्यादा आसरा क़ुबूल करने की और धकेला जाता रहा।
1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद अकाली दल को राजनीतिक सत्ता की और बढ़ता देखके पंजाब का दलित वर्ग, ख़ास तौर पर इसके भीतरी ग़ैर-सिख हिस्से अपने आप को खतरे के मुहँ में आया महसूस करने लगे। इसी दौरान आर्थिक तौर पर ज़्यादा मालामाल और राजनीतिक तौर पर अधिक बलशाली हुए धनाढ्य किसान वर्ग में अहंकार का पारा ओर ऊँचा चढ़ चला और 'हरे इंक़लाब' के आरंभिक वर्षों दौरान गाँवों में जट्टों द्वारा दलितों की नाकाबंदी की घटनाएं आम हो गईं। इस तरह पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में जाति-पाति की लकीरों पर राजनीतिक धड़ेबंदी का रुझान और बल पकड़ गया जो अकाली दल के लिए एक बेहद घाटे वाली और कांग्रेस पार्टी के लिए बड़े राजनीतिक फायदे वाली बात थी।
इसलिए, पंजाब में राजनीतिक सत्ता के ऊपर काबिज़ होने के लिए अपने सामाजिक आधार को ज़्यादा खुला करना और अपनी राजनीतिक हिमायत के घेरे को और ज़्यादा वर्गों तक फैलाना अकाली दल की यकदम राजनीतिक ज़रुरत थी। इसके लिए सचेतन सुघड़ रणनीति घड़ने और फिर उसका दृढ़तापूर्वक पालन और पैरवी करने का काम अकाली लीडरशिप का सब से अहम और तुरंत सरोकार वाला काम बनना चाहिए था। सचेत स्तर पर रणनीति घड़ने का मतलब था कि सिख धर्म के बुनियादी सिद्धांतों को मद्देनज़र रखते हुए अकाली दल के दूरअंदेशी उद्देश्यों और तुरंत करने वाले कार्यों में जंचने वाला तालमेल बिठाया जाता और सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए राजनीतिक दावपेंचों के मामले में उपयुक्त लचक लाकर राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का आकर्षक मॉडल ले करके आया जाता। ऐसा करने से पहले सबसे पहले ज़रुरत (और शर्त) यह थी कि सिख राजनीति के सामने इस गंभीर चुनौती को सचेतन क़ुबूल किया जाता और पैदा हुए नए हालातों और समस्याओं के सामने अकाली राजनीति की दरुस्त मार्ग-दिशा तय करने के लिए बौद्धिक स्तर पर गहरे एवं गंभीर यतन किये जाते।
लेकिन अकाली लीडरशिप या सिख बुद्धिजीवियों के स्तर पर ऐसा कोई सचेतन यतन किया हुआ नज़र नहीं आता। इस महत्वपूर्ण मसले के बारे में अकाली दल या उसके अंदर गंभीर विचार -चर्चा छूने और विचार मंथन के ज़रिये सही निर्णय पर पहुँचने का, किसी भी तरफ से, कोई संजीदा कोशिश नहीं हुई। लेकिन समस्या क्योंकि ख़्याली नहीं बल्कि हक़ीक़त में थी और राजनीति की ज़रूरतें इसके तुरंत हल की मांग करती थीं, इस लिए इसे बिना गहरी सोच-विचार के, मौके पर जैसे और जो ठीक लगा वैसे हल कर लेने की अटकलपच्चू (random) पहुँच अपना ली गई। गहरी और गंभीर मसलों के प्रति अपनाई ऐसी बेकायदा पहुँच पर विवेक के मुक़ाबले अंतरप्रेरणा (instinct and/ or intuition) का तत्व ज़्यादा हावी हो गुज़रता है और फैसले लेते समय अक्सर दूरगामी उद्देश्यों और निशानों के मुक़ाबले सामने पड़े मतलब ज़्यादा वज़नदार हो जाते हैं। अकाली दल के मामले में ठीक यही बात हुई।
पंजाब में कांग्रेस पार्टी सिख पंथ की अव्वल दुश्मन और अकाली दल की मुख्य विरोधी है। सही अर्थों में बात करनी हो तो पंजाब में सिख पंथ की असली दुश्मन ताक़त आर्य समाजी वर्ग था जो पंजाब के लगभग समूचे हिन्दू भाईचार को अपनी सांप्रदायिक विचारधारा मिलावटीपन चढ़ाने और अपनी सांप्रदायिक चालबाज़ी के गिर्द लामबंद करने में कमाल की हद तक सफल हो गया था। दरअसल पंजाब में कांग्रेस पार्टी आर्य समाज के एक राजनितिक विंग विचर रही रही। पंजाबी हिंदू वर्ग की असली वचनबद्धता आर्य समाजी विचारधारा से है और कांग्रेस पार्टी उसके लिए एक 'फ्रंट जत्थेबंदी' से ज़्यादा और कोई अहमियद नहीं रखती। पंजाब के हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी के आपसी संबंधों को समझने के लिए यह तथ्य बहुत ही महत्वपूर्ण है।
यह कहना कि कांग्रेस पार्टी पंजाब के हिंदू वर्ग को बरगला रही है या अपने संकुचित राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रही थी या है, सच्चाई को बिगड़े हुए रूप में देखना है। सिख पंथ के संबंध में पंजाबी हिंदू तबके और कांग्रेसी लीडरशिप की बुनियादी पहुँच में कोई टकराव नहीं। दोनों ही हिंदू मत को एक बानगी मानके चलते हैं। दोनों ही सिख धर्म को हिन्दू समाज में जज़्ब कर लेने के सांझे उदेश्य पर पहरा देते हैं। सो, इस दृष्टि से दोनों ही सिख कौम के प्रति बराबर दुर्भावना रखते हैं। भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान पंजाबी हिंदू वर्ग के बड़े हिस्से राजनीतिक तौर पर कांग्रेस पार्टी से जुड़े होने के बावजूद गाँधी की विचारधारा से आर्य समाजी विचारधारा के ज़्यादा प्रभाव तले थे। लाल लाजपत राय से लेकर जगत नारायण तक, सभी आर्य समाजी 'परिवार' की सोच पर सांप्रदायिकता का एक-सामान गाढ़ा रंग चढ़ रखा था। भारत के बंटवारे से पहले सांप्रदायिकता की यह धारा मुख्य रूप से मुस्लिम भाईचारे के खिलाफ इंगित रही। वैसे बीच-मध्य जब भी सिख पंथ ने हिंदू वर्ग से अपनी अलग पहचान जतलाने की कोशिशें की तो उसे तुरंत ही आर्य समाजी वर्ग के क्रोध का सामना करना पड़ा।
भारत की आज़ादी के बाद पंजाब में मुस्लिम फैक्टर नदारद हो जाने से इस सांप्रदायिक धारा का सारा कहर सिख कौम पर टूट पड़ा। भारतीय सरकार की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथों में आ जाने से पंजाबी हिन्दू वर्ग, अपने सांप्रदायिक उद्देश्यों और हितों को पूरा करने के लिए, कांग्रेस पार्टी का और भी ज़्यादा जोशीला हिमायती बन गया। उधर कांग्रेसी शासकों को भी पंजाब में सिख कौम के संबंध में अपने फिरकापरस्त मंसूबों को अंजाम देने के लिए पंजाब के हिन्दू वर्ग के सहयोग और हिमायत की भारी ज़रुरत थी। विचारधारक समरसता के साथ ही यह एक परस्पर उदेश्य था जो पंजाबी हिंदू वर्ग और कांग्रेस पार्टी में मजबूत संयोग-कड़ी बना हुआ था।
पंजाबी हिंदू वर्ग कांग्रेस पार्टी से एक तरफ से थोड़ी लाभकारी पोज़िशन में था। उस की सारी जान कांग्रेस पार्टी की मुट्ठी में नहीं थी। कांग्रेस पार्टी के पंजाबी हिंदू वर्ग की उम्मीदें और मांगों पर पूरा न उतर सकने की सूरत में, उसके लिए कांग्रेस का पल्ला छोड़ किसी अन्य राजनीतिक पाले में चले जाने का रास्ता खुला था। इसके विपरीत पंजाब में कांग्रेस पार्टी के लिए हिन्दू वर्ग की बाजू छोड़ के ज़िंदा रह पाना मुमकिन नहीं था। सिख कौम को ग़ुलाम बना के रखने और अकाली दल को राज्यसत्ता से पर रखने के लिए कांग्रेस शासकों को पंजाब के हिन्दू वर्ग का सहयोग हासिल करना निहायत ज़रूरी था। हिन्दू वर्ग के इलावा कांग्रेस पार्टी का पंजाब में सामाजिक तौर पर पछड़े वर्गों में भी मजबूत आधार था। इस तरह इन वर्गों की मिश्रित हिमायत के साथी ही कांग्रेस पार्टी अकाली दल को राज्यसत्ता से परे रखने के उदेश्य में सफल रही थी। सो अकाली दल के सामने कांग्रेस पार्टी की इस राजनीतिक किलेबंदी में दरार डालने की राजनीतिक चुनौती थी। केवल ऐसा करके ही वह अपने लिए राज्यसत्ता तक पहुँचने का रास्ता समतल कर सकता था।

पंजाब ऐसा प्रांत है जहां दलितों की आबादी सबसे ज्यादा है- करीब 29 प्रतिशत। ये हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म में बंटे हुए हैं। लेकिन इतनी आबादी वाले दलितों की खेतिहर जमीन में हिस्सेदारी केवल 2.5 फीसदी है। दूसरी ओर राज्य की कुल 64 फीसदी सिख आबादी में जाट सिख करीब 32 फीसदी हैं, लेकिन उनके पास 80 फीसदी उपजाऊ जमीनें हैं। भूमि वितरण का यह असंतुलन राजनीति और धार्मिक संगठनों में भी दिखता है, जहां ज्यादातर बड़े पद जाट सिखों के पास हैं। वैसे तो सिख धर्म में जाति व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है और हिंदू वर्णव्यवस्था के उलट वहां सभी की समानता की बात कही गई है। इसके बावजूद भूमि, संख्यात्मक बहुलता और परंपरागत रौबदाब के चलते जाति की चेतना ने गहराई से जड़ें जमाई हुई हैं। खास बात यह है कि पंजाब में व्यापार और साहूकारी से जुड़े रहे खत्रियों के अलावा सभी जातियां हिंदू धर्म व्यवस्था में निम्न जातियां मानी गई हैं, पर कृषि से जुड़े सभी महत्वपूर्ण संसाधनों पर कब्जा कर स्थानीय संस्कृति व राजनीति में उन्होंने ऊंची जाति का दर्जा हासिल कर लिया है। जातिगत चेतना का असर इतना व्यापक है कि विभिन्न सिख जातियों में आपस में विवाह भी नहीं होता। जाट, खत्री और रामगढ़िया सिखों को प्रभुत्वशाली जाति माना जाता है जो मजहबी, रामदसिया और रंगरेता सिखों को अपने से नीचे समझते हैं। जाट सिख व दलित सिखों के बीच टकराव में ही डेरा विवाद की वजहें छिपी हैं।
पंजाब में करीब नौ हजार सिख व गैर सिख डेरे हैं। गैर सिख डेरों से ज्यादातर दलित समझे जाने वाले अनुयायी हैं और बताया जाता है कि डेरा सच्चा सौदा के 70 फीसदी अनुयायी सिख और गैर सिख दलित व अन्य निम्न जातियों से हैं। डेरों की ओर निम्न जातियों के झुकाव को जाट सिखों के दबदबे वाले गुरुद्वारों से अलग एक 'वैकल्पिक आध्यात्मिक-धार्मिक स्थान' की तलाश के रूप में देखा जाता है। विदेशों में बसे कई दलित परिवारों से इन डेरों को मदद मिलती है और दलित पहचान को उभारने में ये डेरे अपना योगदान देते हैं। इससे सिख संगठनों में इन डेरों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है। गांवों में जाट सिखों और दलितों के बीच टकराव बढ़े हैं और दलितों के बहिष्कार की अपीलें भी जारी होती है। 1920 के दशक के मंगूराम के आदिधर्म आंदोलन व आम्बेडकरवाद के असर ने भी पंजाबी दलितों में संसाधनों में हिस्सेदारी की चेतना को बढ़ाया है। इसके अलावा हरित क्रांति ने भी खेत मजदूरी को बढ़ाने और सम्मान की मांगों को उभारने में योगदान दिया है। दलितों को गुरुद्वारों की राजनीति में भी गैरबराबरी का अहसास होता है, इसलिए कई गांवों में अगर वे गुरुद्वारों की प्रबंधन कमिटी में जाट सिखों के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं तो कई जगह उन्होंने अपने अलग गुरुद्वारे बना लिए हैं। पंजाबी समाज की बनावट का अध्ययन कर रहे कई रिसर्चरों ने पाया है कि राज्य के करीब 12 हजार गांवों में से 10 हजार में दलितों ने अपने अलग गुरुद्वारे निमिर्त कर लिए हैं। हाल के बरसों में हुई कई और घटनाएं भी जाट-दलित टकराव को सामने लाती हैं। 2003 में जालंधर के तल्हण गांव में दलितों ने स्थानीय गुरुद्वारे की प्रबंधन कमिटी में अपने प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की थी जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बाद दोनों पक्ष उग्र हो उठे और कई दिनों तक हिंसा जारी रही। इस घटना ने एक बार फिर सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि धार्मिक संगठनों के अंदर की राजनीति में भी समान भागीदारी की दलितों की मांग को प्रमुखता से उभारा था। इसके अलावा मेहम की घटना भी काफी चर्चा में रही जहां बाबा खजान सिंह उदासी के डेरे को गांव के अल्पसंख्यक लेकिन शक्तिशाली जाट सिखों ने जबरन अपने नियंत्रण में ले लिया था और वहां सिख-खालसा प्रतीकों की स्थापना कर दी थी। बाद में दलित सिखों के प्रचंड विरोध के बाद विवाद के हल के लिए डेरे की प्रबंधन कमिटी के संचालन के लिए सरकार ने एक अधिकारी नियुक्त कर दिया। डेरा सच्चा सौदा मामले में भड़की हिंसा में भी जाट सिखों के राजनीतिक दबदबे को स्थापित करने का मकसद था, क्योंकि ये डेरे पंजाब की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी और अकाल तख्त की राजनीति को भी चुनौती देते हैं। इनमें 'गॉडमैन' पनपने के कारण कई विवाद भी खड़े होते हैं, डेरों के कामकाज पर गंभीर सवाल लगते रहे हैं, लेकिन हाशिए पर रहने वाले निम्न जाति के लोग इन्हें सम्मान व प्रतिष्ठा हासिल करने के साधन के रूप में भी देखते हैं।
अवतारवाद और पैगम्बरवाद का खंडन-
सिखमत में हर जीव को अवतार कहा गया है। हर जीव उस निरंकार की अंश है। संसार में कोई भी पंची, पशु, पेड़, इतियादी अवतार हैं। मानुष की योनी में जीव अपना ज्ञान पूरा करने के लिए अवतरित हुआ है। व्यक्ति की पूजा सिख धर्म में नहीं है "मानुख कि टेक बिरथी सब जानत, देने, को एके भगवान"। तमाम अवतार एक निरंकार की शर्त पर पूरे नहीं उतरते कोई भी अजूनी नहीं है। यही कारण है की सिख किसी को परमेशर के रूप में नहीं मानते। हाँ अगर कोई अवतार गुरमत का उपदेस करता है तो सिख उस उपदेश के साथ ज़रूर जुड़े रहते हैं। जैसा की कृष्ण ने गीता में कहा है की आत्मा मरती नहीं और जीव हत्या कुछ नहीं होती, इस बात से तो सिखमत सहमत है लेकिन आगे कृष्ण ने कहा है की कर्म ही धर्म है जिस से सिख धर्म सहमत नहीं।
पैग़म्बर वो है जो निरंकार का सन्देश अथवा ज्ञान आम लोकई में बांटे। जैसा की इस्लाम में कहा है की मुहम्मद आखरी पैगम्बर है सिखों में कहा गया है कि "हर जुग जुग भक्त उपाया"। भक्त समे दर समे पैदा होते हैं और निरंकार का सन्देश लोगों तक पहुंचाते हैं। सिखमत "ला इलाहा इल्ल अल्लाह (अल्लाह् के सिवा और कोई परमेश्वर नहीं है )" से सहमत है लेकिन सिर्फ़ मुहम्मद ही रसूल अल्लाह है इस बात से सहमत नहीं। अर्जुन देव जी कहते हैं "धुर की बानी आई, तिन सगली चिंत मिटाई", अर्थात मुझे धुर से वाणी आई है और मेरी सगल चिंताएं मिट गई हैं किओंकी जिसकी ताक में मैं बैठा था मुझे वो मिल गया है।
धार्मिक ग्रंथ-
मूल रूप में भक्तो अवम सत्गुरुओं की वाणी का संग्रेह जो सतगुरु अर्जुन देव जी ने किया था जिसे आदि ग्रंथ कहा जाता है सिखों के धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध है | यह ग्रंथ ३६ भक्तों का सचा उपदेश है और आश्चर्यजनक बात ये है की ३६ भक्तों ने निरंकार को सम दृष्टि में व्याख्यान किया है | किसी शब्द में कोई भिन्नता नहीं है | सिख आदि ग्रंथ के साथ साथ दसम ग्रंथ, जो की सतगुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी का संग्रेह है को भी मानते हैं | यह ग्रंथ खालसे के अधीन है | पर मूल रूप में आदि ग्रंथ का ज्ञान लेना ही सिखों के लिए सर्वोप्रिया है |
यही नहीं सिख हर उस ग्रंथ को सम्मान देते हैं, जिसमे गुरमत का उपदेश है |
आदि ग्रंथ
गुरु ग्रंथ साहिब

आदि ग्रंथ या आदि गुरु ग्रंथ या गुरु ग्रंथ साहिब या आदि गुरु दरबार या पोथी साहिब, गुरु अर्जुन देव दवारा संगृहित एक धार्मिक ग्रंथ है जिसमे ३६ भक्तों के आत्मिक जीवन के अनुभव दर्ज हैं | आदि ग्रंथ इस लिए कहा जाता है क्योंकि इसमें "आदि" का ज्ञान भरपूर है | जप बनी के मुताबिक "सच" ही आदि है | इसका ज्ञान करवाने वाले ग्रंथ को आदि ग्रंथ कहते हैं | इसके हवाले स्वयम आदि ग्रंथ के भीतर हैं | हलाकि विदवान तबका कहता है क्योंकि ये ग्रंथ में गुरु तेग बहादुर जी की बनी नहीं थी इस लिए यह आदि ग्रंथ है और सतगुरु गोबिंद सिंह जी ने ९वें महले की बनी चढ़ाई इस लिए इस आदि ग्रंथ की जगंह गुरु ग्रंथ कहा जाने लगा |
भक्तो एवं सत्गुरुओं की वाणी पोथिओं के रूप में सतगुरु अर्जुन देव जी के समय मोजूद थीं | भाई गुरदास जी ने यह ग्रंथ लिखा और सतगुरु अर्जुन देव जी दिशा निर्धारक बने | उन्हों ने अपनी वाणी भी ग्रंथ में दर्ज की | यह ग्रंथ की कई नकले भी तैयार हुई |
आदि ग्रंथ के १४३० पन्ने खालसा दवारा मानकित किए गए |
दसम ग्रंथ
दसम ग्रन्थ, सिखों का धर्मग्रन्थ है जो सतगुर गोबिंद सिंह जी की पवित्र वाणी एवं रचनाओ का संग्रह है।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में अनेक रचनाएँ की जिनकी छोटी छोटी पोथियाँ बना दीं। उन की मौत के बाद उन की धर्म पत्नी माता सुन्दरी की आज्ञा से भाई मनी सिंह खालसा और अन्य खालसा भाइयों ने गुरु गोबिंद सिंह जी की सारी रचनाओ को इकठा किया और एक जिल्द में चढ़ा दिया जिसे आज "दसम ग्रन्थ" कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहा जाये तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने रचना की और खालसे ने सम्पादना की। दसम ग्रन्थ का सत्कार सारी सिख कौम करती है।
दसम ग्रंथ की वानियाँ जैसे की जाप साहिब, तव परसाद सवैये और चोपाई साहिब सिखों के रोजाना सजदा, नितनेम, का हिस्सा है और यह वानियाँ खंडे बाटे की पहोल, जिस को आम भाषा में अमृत छकना कहते हैं, को बनाते वक्त पढ़ी जाती हैं। तखत हजूर साहिब, तखत पटना साहिब और निहंग सिंह के गुरुद्वारों में दसम ग्रन्थ का गुरु ग्रन्थ साहिब के साथ परकाश होता हैं और रोज़ हुकाम्नामे भी लिया जाता है।
अन्य ग्रन्थ
सरब्लोह ग्रन्थ ओर भाई गुरदास की वारें शंका ग्रस्त रचनाए हैं | हलाकि खालसा महिमा सर्ब्लोह ग्रन्थ में सुसजित है जो सतगुरु गोबिंद सिंह की प्रमाणित रचना है, बाकी स्र्ब्लोह ग्रन्थ में कर्म कांड, व्यक्ति पूजा इतियादी विशे मोजूद हैं जो सिखों के बुनयादी उसूलों के खिलाफ हैं | भाई गुरदास की वारों में मूर्ती पूजा, कर्म सिधांत आदिक गुरमत विरुद्ध शब्द दर्ज हैं
सिख धर्म का इतिहास के लिए कोई भी इतिहासिक स्रोत को पूरी तरंह से प्र्पख नहीं मन जाता | श्री गुर सोभा ही ऐसा ग्रन्थ मन गया है जो गोबिंद सिंह के निकटवर्ती सिख द्वारा लिखा गया है लेकिन इसमें तारीखें नहीं दी गई हैं | सिखों के और भी इतिहासक ग्रन्थ हैं जैसे की श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ, गुर्बिलास पातशाही १०, श्री गुर सोभा, मन्हीमा परकाश एवं पंथ परकाश, जनमसखियाँ इतियादी | श्री गुर परताप सूरज ग्रन्थ की व्याख्या गुरद्वारों में होती है | कभी गुर्बिलास पातशाही १० की होती थी | १७५० के बाद ज्यादातर इतिहास लिखे गए हैं | इतिहास लिखने वाले विद्वान ज्यादातर सनातनी थे जिस कारण कुछ इतिहासिक पुस्तकों में सतगुरु एवं भक्त चमत्कारी दिखाए हैं जो की गुरमत फलसफे के मुताबिक ठीक नहीं है | गुरु नानक का हवा में उड़ना, मगरमच की सवारी करना, माता गंगा का बाबा बुड्ढा द्वारा गर्ब्वती करना इतियादी घटनाए जम्सखिओं और गुर्बिलास में सुसजित हैं और बाद वाले इतिहासकारों ने इन्ही बातों के ऊपर श्र्धवास मसाला लगा कर लिखा हुआ है | किसी सतगुर एवं भक्त ने अपना संसारी इतिहास नहीं लिखा | सतगुरु गोबिंद सिंह ने भी जितना लिखा है वह संक्षेप और टूक परमाण जितना लिखा है | सिख धर्म इतिहास को इतना महत्व नहीं देता, जो इतिहास गुरबानी समझने के काम आए उतना ही सिख के लिए ज़रूरी है |