18.2.18

महावशीकरण सिद्ध तांत्रिक ताबीज यंत्र


                                         

कई बार हम ऐसी परिस्थिति में आ फंसते हैं जब हमारे पास तंत्र-मंत्र और यन्त्र के उपायों का सहारा ही एक मात्र उपाय बचता है। जब तक हो सके इंसान सांप, सीढ़ी, वैश्या और ज्योतिषी से दूर रहना पसंद करता है पर जैसा की कहावत है की जब घी सीढ़ी उंगली से नहीं निकलता तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है।
महावशीकरण एक ऐसा उपाय है जिसमें हम तंत्र विद्या और मंत्र विद्या और यन्त्र विद्या के ज़रिये दुर्लभ ढंग से किसी से वो काम करा सकते हैं जो वह अपने आपे में नहीं करने को तैयार होता। हमें यह बात एकदम साफ़ कर लेनी चाहिए की यह कार्य केवल और केवल तब ही किया जाये जब और बाकी सारे तरीके विफल हो गए हों। लेकिन आखिर क्यों करें वशीकरण के उपाय ?
क्या मिलता है वशीकरण सिद्ध तांत्रिक ताबीज़ से ?
वशीकरण करने से आप किसी और इंसान को अपने वश में कर सकते हो – जैसे की सब के साथ होता है, वशीकरण करना आवश्यक होता है, बॉस को ऑफसर की डांट की वजह से, बीवी को पति की आदतों के बिगड़ने के वजह से, माँ-बाप को बच्चों की हिफाज़त की वजह से, प्यार-मोहब्बत जताने वाले लोगों को अपना प्यार पाने के लिए, युद्ध पे गए लोगों को क्षत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए।
वशीकरण से इंसान अपनी पर्सनालिटी और व्यक्तित्व को संवार लेता है – जब कोई व्यक्ति अपने आपको आकर्षक नहीं पाता तो वह दुस्सहित हो उठता है, वह बेवजह परेशान रहने लगता है, मायूसी में डूब जाता है और फ़ालतू के ख़यालों में खो जाता है। ऐसे में वशीकरण करने से आप अपने आपको आकर्षक, सुन्दर, एक अच्छी पर्सनालिटी और व्यक्तित्व वाला पाएंगे।
वशीकरण से आप अपना साहस और बल बढ़ा पाएंगे, आप पाएंगे की आप रोज़ाना ही अपना कॉन्फिडेंस बढ़ता देख पाएंगे और समय के साथ और चटक-दार तथा अच्छे हाव-भाव वाले बन जाएंगे, यह सब आपके महावशीकरण सिद्ध तांत्रिक ताबीज़ से हो पायेगा।
वशीकरण से आप अपने प्यार को इस दुनिये के मेले में खो देने से बचा पाएंगे – आपको यह करना होगा की आप बस इस विधि का प्रयोग करें और फिर देख पाएं की वशीकरण से आप अपने खोये या भूले-भटके साथी को वापस आता पाएंगे। आपकी दुनिया में वापस ख़ुशी की लहर दौड़ जाएगी और आप एक सफल इश्क़ के हक़दार हो जायेंगे।
आप अगर शादी-शुदा हैं तो आप जानते हैं की सुहाग में अड़चन पड़ जाना कितना सरल है और उससे दूर करना कितना मुश्किल बात है, अगर आप पहले से ही वशीकरण का प्रयोग करते हैं तो ऐसा नहीं होगा और अगर आप बाद में इसका प्रयोग करते हैं तो आपकी बिगड़ती हुई पर्तिस्थिति बदल जाएगी और आप वापस खुश हो जायेंगे और ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठा पाएंगे।
अगर आप निराशाजनक सोच में पड़ गए हैं या फिर बहुत परेशान रहते हैं तो चाहे आपको कोई लाख समझाए आपकी टेंशन दूर करना तो आसान नहीं हैं मगर अगर आप हमारे बताये हुए रास्ते पे चलेेँगे तो आप पाएंगे की आप का दिमागी कूड़ा अपने-आप बाहर निकल जायेगा और आप एक सुखमई जीवन वापस जी पाएंगे। इस ताबीज़ को बनाने के लिए किसी भी पूर्णिमा या अमावस्या को सवेरे नहा-धो लें और साफ़ कपडे पहन कर पूजा कक्ष में बैठ जाएं, फिर बताये हुए मंत्र को अभिमंत्रित कर के, एक कागज़ के ऊपर लाल कलम से वही मंत्र लिख दें, अब इसे मोड़ कर खोके में बंद करके पहनाने के लिए तैयार कर लें।
मंत्र जो की पढ़ना और लिख देना है है –
“ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्
गोपनीयं प्रयत्‍‌नेन स्वयोनिरिव पार्वति
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्
अथ मन्त्रह
ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
ओम ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहाः
इति मन्त्रह
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनिः I
नमह कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि II
नमस्ते शुम्भ-हन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि I
जाग्रतम हि महादेवि जपं सिद्धम कुरूष्व मे II
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका I
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते II
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी I
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि II
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु
हुं हुं हुंकार-रूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं-धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु-कुरु स्वाहा
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्र-सिद्धिं कुरुष्व मे
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे I
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति II
यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् I
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा II
इति श्रीरुद्रयमले गौरी-तन्त्रे शिव-पार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम “
इस मंत्र को पढ़कर उसे लिख देने के बाद और तावीज़ बनाने के बाद उससे पहना दें।
यह न भूलें वशीकरण ताबीज़ पहनने की जानकारी लोगों को कतई न दें, लोगों को पता चल जाने पर इस ताबीज़ का असर स्वाभाविक रूप से कम हो जायेगा। आप अपना कार्य चुपचाप करें और उसके पश्चात् पूजा कक्ष छोड़ दें और दिनचर्या में लीं हो जाएं। आप कुछ ही दिनों में पाएंगे की आपका काम सफल हो रहा है, लोग जिन्हें आप अपनी तरफ खींचना चाहते हैं आपकी ओर चले आएंगे और जो लोग आपको हानि पहुंचाते हैं वह आपसे दूर जा रहे हैं। यह कार्य संपन्न होना स्वाभाविक है क्यूंकि यह उपाय बहुत ही जाना-माना और कारगर है।
आपको केवल यह ध्यान में रखना होगा की लोग इन चीज़ों के बारे में जाने नहीं। आप इसके पश्चात अपनी रोज़ की पूजा करते रहेें और ताबीज़ की ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं दें, इसकी कोई ज़रुरत ही नहीं है। आपका कार्य संपन्न होगा और आप अपने जीवन में जो कुछ भी खो बैठे थे वापस अपने करीब आता पाएंगे। आपके इस सफल कार्य में दुर्गा सप्तशटी के कुछ श्लोकों का हाँथ है ! यह श्लोक मार्कण्डेय पुराण से लिए गए हैं और इनमें इतनी शक्ति है की ये आपका कार्य अवश्य सफल करवाएंगे।

4.2.18

दूध का कर्ज चुकाया-एक संस्मरण


   डॉ. दयाराम आलोक अध्यापक मेरे साथी रहे हैं।अभी कुछ ही दिनों पूर्व उनकी पत्नी का निधन हो गया था। पगड़ी की रस्म निपटने के बाद एक दिन जब मैं उनके घर गया तो वे सोफे पर बैठे थे। मुझसे बोले आइये विश्वासीजी!
     मैंने पूछा भाभीजी की तबियत खराब थी ? तो उन्होंने कहा खराब ही नही अत्यंत गम्भीर हो गई थी। लगभग बीस दिनों तक ICU में भर्ती रखना पड़ा। बीस पच्चीस हजार रुपये प्रतिदिन खर्च आता रहा।पूरे परिवार ने उनकी खूब सेवा की। विशेषकर हमारे अनिल ने उसके लिए रात दिन एक कर दिए । डेढ़ माह तक तो अपने अस्तपताल गया ही नही। भरसक कोशिश के बाद भी उसकी माँ बच नही सकी।
    सचमुच हमारे अनिल ने माँ के दूध का कर्ज चुका दिया। ये कहते हुए उनकी आंखें छलछला आई। एक अलग ही किस्म के स्वभाव के आलोक जी की आंखों में नमी देखकर तथा भीतर के मोम को पिघलते देखकर मैं भी थोड़ी देर के लिए मोन हो गया।कुछ  देर  बाद मैंने  मौन तोड़ते हुए कहा  कि आलोक जी आप तो जानते ही  हैं ,

होनी होकर रहती है|उसे कोई नहीं टाल सकता|
    खैर,अब आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिएगा,तथा घूमने जाने का क्रम बनाए रखिएगा|यह कहते हुए मैं उनके पास से चला आया |
लेखक-राधेश्याम विश्वासी
रत्नावत कालोनी,
शामगढ़  

31.1.18

वीर शिरोमणि महारराणा प्रताप का जीवन परिचय



     महाराणा प्रताप ने कभी मुगलों की पराधीनता स्वीकार नहीं की और अकबर जैसे शासक को नाकों चने चबवा दिए| महाराणा प्रताप का इतिहास इस बात का गवाह है कि भारतमाता ने ऐसे अनेक वीरों को जन्म दिया है जिन्होंने मरते दम तक अपने देश की रक्षा की है। महाराणा प्रताप का नाम भारत में जन्म लेने वाले शूरवीरों में सबसे ऊपर आता है। महाराणा प्रताप ने जीवनभर संघर्ष किया और सालों तक जंगलों में रहकर जीवन व्यतीत किया, घास की रोटियां खायीं और गुफा में सोये लेकिन मुगलों की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की।
महाराणा को वीरता और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति माना जाता है। उन्होंने आखिरी सांस तक मेवाड़ की रक्षा की। महाराणा की बहादुरी को देखकर उनका सबसे बड़ा दुश्मन अकबर भी उनका कायल हो गया था
।महाराणा का जन्म 9 मई सन 1540 को मेवाड़ के कुम्भलगढ दुर्ग में हुआ था। महाराणा की माता का नाम जैवन्ताबाई और पिता का नाम उदय सिंह था। महाराणा के बचपन का नाम “कीका” था। आगे चलकर महाराणा को मेवाड़ का साम्राज्य सौंप दिया गया।
महाराणा का सबसे बड़ा दुश्मन अकबर –
      उन दिनों अकबर मुगल साम्राज्य का शासक था। अकबर उस समय सबसे शक्तिशाली सम्राट भी था। अकबर के आगे कई राजपूत राजा पहले ही घुटने टेक चुके थे इसलिए अकबर अपनी मुग़ल सेना को अजेय मानता था।
अकबर पूरे भारत पर राज करना चाहता था। इसलिए उसने कई राजपूत राजाओं को हराकर उनका राज्य हथिया लिया तो वहीं कई राजाओं ने मुग़ल सेना के डर से आत्मसमर्पण कर दिया।
अकबर ने महाराणा प्रताप को भी 6 बार संधि वार्ता का प्रस्ताव भेजा था लेकिन महाराणा ने अकबर के आगे झुकने से मना कर दिया और महाराणा के पास अकबर की सेना की तुलना में आधे ही सिपाही थे लेकिन फिर भी उन्होंने अकबर के दांत खट्टे कर दिये।
हल्दी घाटी का युद्ध –
     हल्दी घाटी का युद्ध इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में जाना जाता है। 1576 में हुआ हल्दीघाटी का युद्ध बहुत विनाशक था। राजपूत और मुगलों के बीच हुए इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने वीरता का परिचय दिया और अकबर का अजेय होने का घमंड भी तोड़ डाला। पूरे राज्य ने भी महाराणा का पूरा साथ दिया, राज्य के महिलाओं और बच्चों ने खाना कम कर दिया ताकि सेना को खाने की कमी ना पड़े। महाराणा वीरता से लड़े और मुगलों की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
हल्दी घाटी का युद्ध –
    हल्दी घाटी का युद्ध इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में जाना जाता है। 1576 में हुआ हल्दीघाटी का युद्ध बहुत विनाशक था। राजपूत और मुगलों के बीच हुए इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने वीरता का परिचय दिया और अकबर का अजेय होने का घमंड भी तोड़ डाला। पूरे राज्य ने भी महाराणा का पूरा साथ दिया, राज्य के महिलाओं और बच्चों ने खाना कम कर दिया ताकि सेना को खाने की कमी ना पड़े। महाराणा वीरता से लड़े और मुगलों की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
महाराणा प्रताप का जीवन
1. महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो का था और सीने का कवच 72 किलो का। सामान्य इंसान इतना वजन उठा भी नहीं सकता लेकिन महाराणा प्रताप भाला, कवच, अपनी ढाल और तलवार कुल मिलाकर 208 किलो वजन लेकर युद्ध के मैदान में जाते थे।
2. महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाकर भी देश की रक्षा की थी।
3. महाराणा प्रताप निहत्थे पर कभी वार नहीं करते थे इसलिए वो अपने साथ दो तलवार रखते थे जिससे दुश्मन को भी बराबर का मौका मिले।
4. महाराणा का घोडा चेतक हवा की गति से चलता था। एक बार जब महाराणा प्रताप घायल अवस्था में थे वो चेतक 26 फिट लंबे नाले को भी लाँघ गया था। चेतक की वीरता का वर्णन कई किताबों में भी पढ़ने को मिलता है।
5. महाराणा प्रताप की 11 शादियाँ हुईं थीं।
6. हल्दीघाटी के प्रसिद्ध युद्ध में महाराणा का सेनापति हकीम खान था जो एक मुस्लिम पठान था।
7. अकबर अपनी मुग़ल सेना को अजेय मानता था। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अकबर का ये घमंड भी तोड़ डाला। इस युद्ध के बाद अकबर सपने में भी महाराणा से डरने लगा था।
8. स्वयं अकबर भी महाराणा की बहादुरी का लोहा मानता था। इसका जिक्र कई वीर रस की कविताओं में भी मिलता है।
9. अकबर ने 30 वर्षों तक महाराणा प्रताप को हराने का प्रयास किया था लेकिन वो हर बार वो असफल रहा था।
10. जब महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई तो उनका सबसे बड़ा दुश्मन अकबर भी रो पड़ा था।
11. महाराणा प्रताप की लंबाई 7 फिट 5 इंच थी।
12. अकबर ने महाराणा प्रताप से युद्ध लड़ने से पहले 6 बार संधि करने का न्यौता दिया था लेकिन महाराणा को संधि कुबूल नहीं थी।
13. महाराणा प्रताप के पास अकबर की सेना से आधे सिपाही थे लेकिन फिर भी 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा ने मुगलों की हालत खराब कर दी थी।
14. महाराणा प्रताप अपने वचन के पक्के थे उन्होंने वचन दिया था कि जब तक चित्तौड़ पर वापस कब्ज़ा नहीं कर लेते तब तक ना ही पलंग पर सोयेंगे और ना ही सोने की थाली में खाना खायेंगे।
हमें गर्व है कि हमने उस भारतवर्ष में जन्म लिया है जहाँ महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया। हिंदीसोच की ओर से महाराणा प्रताप को शत शत नमन…

28.1.18

समस्त संकटों से मुक्ति पाएँ दस महाविध्याओं से


दिव्योर्वताम सः मनस्विता: संकलनाम ।
त्रयी शक्ति ते त्रिपुरे घोरा छिन्न्मस्तिके च।।
देवी, अप्सरा, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी और पिशाचिनी आदि में सबसे सात्विक और धर्म का मार्ग है ‘देवी’ की पूजा, साधना और प्रार्थना (prayer) । कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी सती ने दूसरा जन्म पार्वती के रूप में लिया था। इनके दो पुत्र हैं गणेश और कार्तिकेय। मां पार्वती अपने पूर्व जन्म (previous birth) में सती थीं। नौ दुर्गा भी पार्वती का ही रूप हैं। इस माता सती और पार्वती की पूजा-साधना करना सनातन धर्म का मार्ग है बाकि की पूजा आराधना सनातन धर्म (sanatan dharma) का हिस्सा नहीं है।
शास्त्रों अनुसार इन दस महाविद्या में से किसी एक की नित्य पूजा अर्चना करने से लंबे समय से चली आ रही ‍बीमार, भूत-प्रेत, अकारण ही मानहानी, बुरी घटनाएं, गृहकलह, शनि का बुरा प्रभाव, बेरोजगारी, तनाव (stress) आदि सभी तरह के संकट तत्काल ही समाप्त हो जाते हैं और व्यक्ति परम सुख और शांति पाता है। इन माताओं की साधना कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायक और सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सहायक (helpful) मानी गई है।
उत्पत्ति कथा : पुराणों अनुसार जब भगवान शिव (bhagwan shri shiv ji) की पत्नी सती ने दक्ष के यज्ञ में जाना चाहा तब शिवजी ने वहां जाने से मना किया। इस इनकार पर माता ने क्रोधवश पहले काली शक्ति प्रकट की फिर दसों दिशाओं में दस शक्तियां प्रकट कर अपनी शक्ति की झलक दिखला दी। इस अति भयंकरकारी दृश्य (dangerous view) को देखकर शिवजी घबरा गए। क्रोध में सती ने शिव को अपना फैसला सुना दिया, ‘मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी ही। या तो उसमें अपना हिस्सा लूंगी या उसका विध्वंस कर दूंगी।’
हारकर शिवजी सती के सामने आ खड़े हुए। उन्होंने सती से पूछा- ‘कौन हैं ये?’ सती ने बताया,‘ये मेरे दस रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं। पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।’ यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति है। बाद में मां ने अपनी इन्हीं शक्तियां (powers) का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध (kill) करने के लिए किया था।
नौ दुर्गा : 1.शैलपुत्री, 2.ब्रह्मचारिणी, 3.चंद्रघंटा, 4.कुष्मांडा, 5.स्कंदमाता, 6.कात्यायनी, 7.कालरात्रि, 8.महागौरी और 9.सिद्धिदात्री।
दस महा विद्या : 1.लीका, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।
प्रवृति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह (three groups) हैं। पहला:- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला), दूसरा:- उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी), तीसरा:- सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।
यहां दस महाविद्या का परिचय और उनके चमत्कारिक मंत्र दिए जा रहे हैं। पाठक किसी जानकार से पूछकर ही दस महाविद्याओं के मंत्र का जाप या उनकी पूजा करें। यहां मात्र जानकारी हेतु मंत्र दिए जा रहे हैं।
1.काली :  दस महाविद्या में काली प्रथम रूप है। माता का यह रूप साक्षात और जाग्रत है। काली के रूप में माता का किसी भी प्रकार से अपमान करना अर्थात खुद के जीवन को संकट में डालने के समान है। महा दैत्यों का वध करने के लिए माता ने ये रूप धरा था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता की वीरभाव में पूजा (pray) की जाती है। काली माता तत्काल प्रसन्न (sudden happy) होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी है। अत: इनकी साधना या इनका भक्त बनने के पूर्व एकनिष्ठ और कर्मों से पवित्र होना जरूरी होता है।
यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट होने वाली काली माता को नमस्कार। यह काली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव-दानव युद्ध में देवताओं को विजय (win) दिलवाई थी। इनका क्रोध (anger) तभी शांत हुआ था जब शिव इनके चरणों में लेट गए थे।
*नाम : माता कालिका
*शस्त्र : त्रिशूल और तलवार (sword)
*वार : शुक्रवार (friday)
*दिन : अमावस्या
*ग्रंथ : कालिका पुराण
*मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा
*दुर्गा का एक रूप : माता कालिका 10 महाविद्याओं में से एक
*मां काली के 4 रूप हैं:- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।
*राक्षस वध : रक्तबीज।
*कालीका के प्रमुख तीन स्थान है:- कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर इसे भी शक्तिपीठ में शामिल किया गया है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मंदिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
*काली माता का मंत्र:  हकीक की माला से नौ माला ‘क्रीं ह्नीं ह्नुं दक्षिणे कालिके स्वाहा:।’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
2.तारा : तांत्रिकों की प्रमुख देवी तारा। तारने वाली कहने के कारण माता को तारा भी कहा जाता है। सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। शत्रुओं का नाश करने वाली सौन्दर्य और रूप ऐश्वर्य की देवी तारा आर्थिक उन्नति (financial growth) और भोग दान और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं:- तारा , एकजटा और नील सरस्वती।
तारापीठ में देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है। यह पीठ पश्चिम बंगाल (bengal) के बीरभूम जिला में स्थित है। इसलिए यह स्थान तारापीठ के नाम से विख्यात है। प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने इस स्थान पर देवी तारा की उपासना करके सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस मंदिर में वामाखेपा नामक एक साधक ने देवी तारा की साधना करके उनसे सिद्धियां हासिल की थी।
तारा माता के बारे में एक दूसरी कथा है कि वे राजा दक्ष (king daksh) की दूसरी पुत्री थीं। तारा देवी का एक दूसरा मंदिर हिमाचल प्रदेश (himachal pradesh) की राजधानी शिमला से लगभग 13 किमी की दूरी पर स्थित शोघी में है। देवी तारा को समर्पित यह मंदिर, तारा पर्वत पर बना हुआ है। तिब्‍बती बौद्ध धर्म के लिए भी हिन्दू धर्म की देवी ‘तारा’ का काफी महत्‍व है।
चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तारा रूपी देवी की साधना करना तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक माना गया है। जो भी साधक या भक्त माता की मन से प्रार्धना करता है उसकी कैसी भी मनोकामना हो वह तत्काल ही पूर्ण हो जाती है।
तारा माता का मंत्र : नीले कांच की माला से बारह माला प्रतिदिन ‘ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
3. त्रिपुर सुंदरी : षोडशी माहेश्वरी शक्ति की विग्रह वाली शक्ति है। इनकी चार भुजा और तीन नेत्र हैं। इसे ललिता, राज राजेश्वरी और ‍त्रिपुर सुंदरी भी कहा जाता है। इनमें षोडश कलाएं पूर्ण है इसलिए षोडशी भी कहा जाता है। ‍‍भारतीय राज्य त्रिपुरा (tripura) में स्थित त्रिपुर सुंदरी का शक्तिपीठ है माना जाता है कि यहां माता के धारण किए हुए वस्त्र गिरे थे। त्रिपुर सुंदरी शक्तिपीठ भारतवर्ष के अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 पीठों में से एक है।
दक्षिणी-त्रिपुरा उदयपुर शहर से तीन किलोमीटर दूर, राधा किशोर ग्राम में राज-राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का भव्य मंदिर स्थित है, जो उदयपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम (south-west) में पड़ता है। यहां सती के दक्षिण ‘पाद’ का निपात हुआ था। यहां की शक्ति त्रिपुर सुंदरी तथा शिव त्रिपुरेश हैं। इस पीठ स्थान को ‘कूर्भपीठ’ भी कहते हैं।
उल्लेखनीय है कि महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
त्रिपुर सुंदरी माता का मंत्र: रूद्राक्ष माला से दस माला ‘ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
4.भुवनेश्वरी : भुवनेश्वरी को आदिशक्ति और मूल प्रकृति भी कहा गया है। भुवनेश्वरी ही शताक्षी और शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध हुई। पुत्र प्राप्ती के लिए लोग इनकी आराधना करते हैं।
आदि शक्ति भुवनेश्वरी मां का स्वरूप सौम्य एवं अंग कांति अरुण हैं। भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वभाविक गुण है। इस महाविद्या की आराधना से सूर्य के समान तेज और ऊर्जा प्रकट होने लगती है। ऐसा व्यक्ति अच्छे राजनीतिक पद पर आसीन हो सकता है। माता का आशीर्वाद (blessings) मिलने से धनप्राप्त होता है और संसार के सभी शक्ति स्वरूप महाबली उसका चरणस्पर्श करते हैं।
भुवनेश्वरी माता का मंत्र: स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन ‘ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
छिन्नमस्ता : इस पविवर्तन शील जगत का अधिपति कबंध है और उसकी शक्ति छिन्नमस्ता है। इनका सिर कटा हुआ और इनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं बह रही है। इनकी तीन आंखें हैं और ये मदन और रति पर आसीन है। देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कंधे पर यज्ञोपवीत है। इसलिए शांत भाव से इनकी उपासना करने पर यह अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है।
माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन बुद्धि ज्ञान बढ़ (growth in brain and knowledge) जाता है। शरीर रोग मुक्त होता हैं। सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं। यदि साधक योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक पारंगत होकर विख्यात हो जाता है।
कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय (famous) है। झारखंड (jharkhand) की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके का यह मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है।
छीन्नमस्ता का मंत्र :  रूद्राक्ष माला से दस माला प्रतिदिन ‘श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
त्रिपुर भैरवी : त्रिपुर भैरवी की उपासना से सभी बंधन दूर हो जाते हैं। यह बंदीछोड़ माता है। भैरवी के नाना प्रकार के भेद बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं।
 
माता की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। षोडशी को श्रीविद्या भी माना जाता है। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि (growth in business) होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।
जीवन में काम, सौभाग्य और शारीरिक सुख के साथ आरोग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। इसकी साधना से धन सम्पदा की प्राप्ति होती है, मनोवांछित वर या कन्या से विवाह (marriage) होता है। षोडशी का भक्त कभी दुखी नहीं रहता है।
देवी कथा : नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार जब देवी काली के मन में आया कि वह पुनः अपना गौर वर्ण प्राप्त कर लें तो यह सोचकर देवी अन्तर्धान हो जाती हैं। भगवान शिव जब देवी को को अपने समक्ष नहीं पाते तो व्याकुल हो जाते हैं और उन्हें ढूंढने का प्रयास करते हैं। शिवजी, महर्षि नारदजी से देवी के विषय में पूछते हैं तब नारदजी उन्हें देवी का बोध कराते हैं वह कहते हैं कि शक्ति के दर्शन आपको सुमेरु के उत्तर में हो सकते हैं। वहीं देवी की प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात संभव हो सकेगी। तब भोले शिवजी की आज्ञानुसार नारदजी देवी को खोजने (search) के लिए वहां जाते हैं। महर्षि नारदजी जब वहां पहुंचते हैं तो देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखते हैं यह प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो जाती हैं और उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट होता है और इस प्रकार उससे छाया विग्रह ‘त्रिपुर-भैरवी’ का प्राकट्य होता है।
त्रिपुर भैरवी का मंत्र : मुंगे की माला से पंद्रह माला ‘ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
7. धूमावती : धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसलिए यह विधवा माता मानी गई है। इनकी साधना से जीवन में निडरता और निश्चंतता आती है। इनकी साधना या प्रार्थना से आत्मबल का विकास होता है। इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती है।
मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें ‘सुतरा’ कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है।
इस महाविद्या की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महाविद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम संयम (control) और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला लोभ-लालच से दूर रहें। शराब और मांस (whiskey and chicken) को छूए तक नहीं।
धूमावती का मंत्र : मोती की माला से नौ माला ‘ऊँ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
8. बगलामुखी : माता बगलामुखी की साधना युद्ध में विजय होने और शत्रुओं के नाश के लिए की जाती है। बगला मुखी के देश में तीन ही स्थान है। कृष्ण और अर्जुन ने महाभातर के युद्ध के पूर्व माता बगलामुखी की पूजा अर्चना की थी। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है।
जिसकी साधना सप्तऋषियों ने वैदिक काल में समय समय पर की है। इसकी साधना से जहां घोर शत्रु अपने ही विनाश बुद्धि से पराजित हो जाते हैं वहां साधक का जीवन निष्कंटक तथा लोकप्रिय बन जाता है।
बगलामुखी का मंत्र: हल्दी (turmeric) या पीले कांच की माला से आठ माला ‘ऊँ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:’ दूसरा मंत्र- ‘ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।‘ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम (rules) किसी जानकार से पूछें।
भारत में मां बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है।
9. मातंगी : मतंग शिव का नाम है। शिव की यह शक्ति असुरों को मोहित (hypnotize) करने वाली और साधकों को अभिष्ट फल देने वाली है। गृहस्थ जीवन (family life) को श्रेष्ठ बनाने के लिए लोग इनकी पूजा करते हैं। अक्षय तृतीया अर्थात वैशाख शुक्ल की तृतीया को इनकी जयंती आती है।
 
यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक (head) पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं।
पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।
मातंगी माता का मंत्र: स्फटिक की माला से बारह माला ‘ऊँ ह्नीं ऐ भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
10.कमला : दरिद्रता, संकट, गृहकलह और अशांति को दूर करती है कमलारानी। इनकी सेवा और भक्ति से व्यक्ति सुख और समृद्धि पूर्ण रहकर शांतिमय जीवन बिताता है।
श्वेत वर्ण के चार हाथी सूंड में सुवर्ण कलश लेकर सुवर्ण के समान कांति लिए हुए मां को स्नान करा रहे हैं। कमल पर आसीन कमल पुष्प धारण किए हुए मां सुशोभित होती हैं। समृद्धि, धन, नारी, पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है। इस महाविद्या की साधना नदी तालाब या समुद्र (sea) में गिरने वाले जल में आकंठ डूब कर की जाती है। इसकी पूजा करने से व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी (rich) और विद्यावान होता है। व्यक्ति का यश और व्यापार या प्रभुत्व संसांर भर में प्रचारित हो जाता है।
कमला माता का मंत्र : कमलगट्टे की माला से रोजाना दस माला ‘हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:।’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।

24.1.18

तिलक लगाने के नियम,मंत्र और फायदे

                                   


      हिन्दू धर्म में कुछ ऐसी परंपराएं हैं जिनका महत्व तो बहुत है, लेकिन समय के साथ-साथ वह धूमिल पड़ती जा रही है। प्राचीन काल में जब भी राजा महाराजा शुभ कार्यों के लिए जाते थे तो माथे पर तिलक लगवाकर जाते थे। कोई राजा महाराजा युद्ध के लिए भी जाते थे, तो विजय के लिए अपने ईष्ट को याद करते थे और माथे पर तिलक लगाकर जाते थे। यूं तो माथे पर तिलक लगाने के लिए अलावा हिन्दू परंपराओं में गले, हृदय, दोनों बाजू, नाभि, पीठ, दोनों बगल आदि मिलाकर शरीर के कुल 12 स्थानों पर तिलक लगाने का विधान है। वैसे शास्त्रों में विस्तार से मस्तिष्क पर तिलक लगाने के महत्व के बारे में बताया गया है। हालांकि, अब तो इस विधान को वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि मस्तक पर तिलक लगाने से शांति और ऊर्जा मिलती है। भारत में कई तरह के तिलक प्रचलित हैं। चंदन, गोपीचंदन, सिंदूर, रोली, भस्म इत्यादि। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि किस दिन कौन-सा तिलक लगाकर घर से शुभ कार्यों के लिए निकले। जिससे हर कार्यों में सफलता मिले और मस्तिष्क को शांति और बल मिले?
        किसी के माथे पर तिलक लगा देखकर मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर टीका लगाने से फायदा क्या है? क्या यह महज दूसरों के सामने दिखावे के मकसद से किया जाता है या फिर तिलक धारण का कुछ वैज्ञानिक आधार भी है? दरअसल, टीका लगाने के पीछे आध्यात्म‍िक भावना के साथ-साथ दूसरे तरह के लाभ की कामना भी होती है.
     आम तौर पर चंदन, कुमकुम, मिट्टी, हल्दी, भस्म आदि का तिलक लगाने का विधान है. अगर कोई तिलक लगाने का लाभ तो लेना चाहता है, पर दूसरों को यह दिखाना नहीं चाहता, तो शास्त्रों में इसका भी उपाय बताया गया है. कहा गया है कि ऐसी स्थ‍िति में ललाट पर जल से तिलक लगा लेना चाहिए.
इससे लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर कुछ लाभ बड़ी आसानी से मिल जाते हैं. आगे तिलक धारण करने के फायदों की चर्चा की गई है:
1. तिलक करने से व्यक्त‍ित्व प्रभावशाली हो जाता है. दरअसल, तिलक लगाने का मनोवैज्ञानिक असर होता है, क्योंकि इससे व्यक्त‍ि के आत्मविश्वास और आत्मबल में भरपूर इजाफा होता है.
2. ललाट पर नियमित रूप से तिलक लगाने से मस्तक में तरावट आती है. लोग शांति व सुकून अनुभव करते हैं. यह कई तरह की मानसिक बीमारियों से बचाता है.
3. दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे उदासी दूर होती है और मन में उत्साह जागता है. यह उत्साह लोगों को अच्छे कामों में लगाता है.
4. इससे सिरदर्द की समस्या में कमी आती है.
5. हल्दी से युक्त तिलक लगाने से त्वचा शुद्ध होती है. हल्दी में एंटी बैक्ट्र‍ियल तत्व होते हैं, जो रोगों से मुक्त करता है.
6. धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंदन का तिलक लगाने से मनुष्य के पापों का नाश होता है. लोग कई तरह के संकट से बच जाते हैं. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है.
7. माना जाता है कि चंदन का तिलक लगाने वाले का घर अन्न-धन से भरा रहता है और सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है.
हमारे धर्मं चन्दन के तिलक का बहुत महत्व बताया गया है आइये जानते इसके बैज्ञानिक कारण और इसे कैसे लगाया जाता है !!
भगवान को चंदन अर्पण :
भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे यानी हम ठंडे दिमाग से काम करे। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है।
चंदन तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व -
★ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंदन का तिलक(Chandan Tilak) लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है।
कोड स्निपेट कॉपी करें मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है।
★ मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट विकार नहीं होता।
★ मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें ।
तिलक का महत्व :
★ हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है
★ इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है
★ विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।
★ चंदन का तीलक महापुण्यदायी है | आपदा हर देता है |
चंदनस्य महतपुण्यं पवित्रं पाप नाशनम |
आपदं हरति नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा ||

तिलक लगाने का मन्त्र : Tilak Lagane Ka Mantraकान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।
स्नान एवं धौत वस्त्र धारण करने के उपरान्त वैष्णव ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, शैव त्रिपुण्ड, गाणपत्य रोली या सिन्दूर का तिलक शाक्त एवं जैन क्रमशः लाल और केसरिया बिन्दु लगाते हैं। धार्मिक तिलक स्वयं के द्वारा लगाया जाता है, जबकि सांस्कृतिक तिलक दूसरा लगाता है।
नारद पुराण में उल्लेख आया है-
१. ब्राह्मण को ऊर्ध्वपुण्ड्र,
२. क्षत्रिय को त्रिपुण्ड,
३. वैश्य को अर्धचन्द्र,
४. शुद्र को वर्तुलाकार चन्दन से ललाट को अंकित करना चाहिये।
योगी सन्यासी ऋषि साधकों तथा इस विषय से सम्बन्धित ग्रन्थों के अनुसार भृकुटि के मध्य भाग देदीप्यमान है।
१.ऊर्ध्वपुण्ड्र चन्दन :
★ वैष्णव सम्प्रदायों का कलात्मक भाल तिलक ऊर्ध्वपुण्ड्र कहलाता है। चन्दन, गोपीचन्दन, हरिचन्दन या रोली से भृकुटि के मध्य में नासाग्र या नासामूल से ललाट पर केश पर्यन्त अंकित खड़ी दो रेखाएं ऊर्ध्वपुण्ड्र कही जाती हैं। |
★ वैष्णव ऊर्ध्वपुण्ड्र के विषय में पुराणों में दो प्रकार की मान्यताएं मिलती हैं।
नारद पुराण में – इसे विष्णु की गदा का द्योतक माना गया है.
ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद में – ऊर्ध्वपुण्ड्र को विष्णु के चरण पाद का प्रतीक बताकर विस्तार से इसकी व्याख्या की है। |
पुराणों में – 
ऊर्ध्वपुण्ड्र की दक्षिण रेखा को विष्णु अवतार राम या कृष्ण के “दक्षिण चरण तल” का प्रतिबिम्ब माना गया है, जिसमें वज्र, अंकुश, अंबर, कमल, यव, अष्टकोण, ध्वजा, चक्र, स्वास्तिक तथा ऊर्ध्वरेख है.
★ तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र की बायीं केश पर्यन्त रेखा विष्णु का “बायाँ चरण तल” है जो गोपद, शंख, जम्बूफल, कलश, सुधाकुण्ड, अर्धचन्द्र, षटकोण, मीन, बिन्दु, त्रिकोण तथा इन्द्रधनुष के मंगलकारी चिन्हों से युक्त है।
★ इन मंगलकारी चिन्हों के धारण करने से वज्र से – बल तथा पाप संहार, अंकुश से – मनानिग्रह, अम्बर से – भय विनाश, कमल से – भक्ति, अष्टकोण से – अष्टसिद्धि, ध्वजा से – ऊर्ध्व गति, चक्र से – शत्रुदमन, स्वास्तिक से- कल्याण, ऊर्ध्वरेखा से – भवसागर तरण, पुरूष से – शक्ति और सात्त्विक गुणों की प्राप्ति, गोपद से – भक्ति, शंख से – विजय और बुद्धि से – पुरूषार्थ, त्रिकोण से – योग्य, अर्धचन्द्र से – शक्ति, इन्द्रधनुष से – मृत्यु भय निवारण होता है।
2. त्रिपुण्ड चन्दन :★ विष्णु उपासक वैष्णवों के समान ही शिव उपासक ललाट पर भस्म या केसर युक्त चन्दन द्वारा भौहों के मध्य भाग से लेकर जहाँ तक भौहों का अन्त है उतना बड़ा त्रिपुण्ड और ठीक नाक के ऊपर लाल रोली का बिन्दु या तिलक धारण करते हैं। मध्यमा, अनामिका और तर्जनी से तीन रेखाएँ तथा बीच में रोली का अंगुष्ठ द्वारा प्रतिलोम भाव से की गई रेखा त्रिपुण्ड कहलाती है।
★ शिवपुराण में त्रिपुण्ड को योग और मोक्ष दायक बताया गया है। शिव साहित्य में त्रिपुण्ड की तीन रेखाओं के नौ-नौ के क्रम में सत्ताईस देवता बताए गये हैं। वैष्णव द्वादय तिलक के समान ही त्रिपुण्ड धारण करने के लिये बत्तीस या सोलह अथवा शरीर के आठ अंगों में लगाने का आदेश है तथा स्थानों एवं अवयवों के देवों का अलग-अलग विवेचन किया गया है। शैव ग्रन्थों में विधिवत त्रिपुण्ड धारण कर रूद्राक्ष से महामृत्युजंय का जप करने वाले साधक के दर्शन को साक्षात रूद्र के दर्शन का फल बताया गया है।
★ अप्रकाशिता उपनिषद के बहिवत्रयं तच्च जगत् त्रय, तच्च शक्तित्रर्य स्यात् द्वारा तीन अग्नि, तीन जगत और तीन शक्ति ज्ञान इच्छा और क्रिया का द्योतक बताकर कहा है कि जिसने त्रिपुण्ड धारण कर रखा है, उसे देवात् कोई देख ले तो वह सभी बाधाओं से विमुक्त हो जाता है। त्रिपुण्ड के बीच लाल तिलक या बिन्दु कारण तत्त्व बिन्दु माना जाता है। गणेश भक्त गाणपत्य अपनी भुजाओं पर गणेश के एक दाँत की तप्त मुद्रा दागते हैं तथा गणपति मुख की छाप लगाकर मस्तक पर लाल रोली या सिन्दूर का तिलक धारण कर गजवदन की उपासना करते हैं।
चन्दन के प्रकार :१. हरि चन्दन – पद्मपुराण के अनुसार तुलसी के काष्ठ को घिसकर उसमें कपूर, अररू या केसर के मिलाने से हरिचन्दन बनता है।
२. गोपीचन्दन-
★ गोपीचन्दन द्वारका के पास स्थित गोपी सरोवर की रज है, जिसे वैष्णवों में परम पवित्र माना जाता है। स्कन्द पुराण में उल्लेख आया है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों की भक्ति से प्रभावित होकर द्वारका में गोपी सरोवर का निर्माण किया था, जिसमें स्नान करने से उनको सुन्दर का सदा सर्वदा के लिये स्नेह प्राप्त हुआ था। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर वैष्णवों में गोपी चन्दन का ऊर्ध्वपुण्ड्र मस्तक पर लगाया जाता है।
★ इसी पुराण के पाताल खण्ड में कहा गया है कि गोपीचन्दन का तिलक धारण करने मात्र से ब्राह्मण से लेकर चांडाल तक पवित्र हो जाता है। जिसे वैष्णव सम्प्रदाय में गोपी चन्दन के समान पवित्र माना गया है.
★ स्कन्दपुराण में गोमती, गोकुल और गोपीचन्दन को पवित्र और दुर्लभ बताया गया है तथा कहा गया है कि जिसके घर में गोपीचन्दन की मृत्तिका विराजमान हैं, वहाँ श्रीकृष्ण सहित द्वारिकापुरी स्थित है।
सामान्य तिलक का आकार :धार्मिक तिलक के समान ही हमारे पारिवारिक या सामाजिक चर्या में तिलक इतना समाया हुआ है कि इसके अभाव में हमारा कोई भी मंगलमय कार्य हो ही नहीं सकता। इसका रूप या आकार दीपक की ज्याति, बाँस की पत्ती, कमल, कली, मछली या शंख के समान होना चाहिए। धर्म शास्त्र के ग्रन्थों के अनुसार इसका आकार दो से दस अंगुल तक हो सकता है। तिलक से पूर्व ‘श्री’ स्वरूपा बिन्दी लगानी चाहिये उसके पश्चात् अंगुठे से विलोम भाव से तिलक लगाने का विधान है। अंगुठा दो बार फेरा जाता है।
तिलक किस अंगुली से लगाना चाहिए :★ ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार तिलक में “अंगुठे के प्रयोग से – शक्ति, मध्यमा के प्रयोग से – दीर्घायु, अनामिका के प्रयोग से- समृद्धि तथा तर्जनी से लगाने पर – मुक्ति प्राप्त होती है” तिलक विज्ञान विषयक समस्त ग्रन्थ तिलक अंकन में नाखून स्पर्श तथा लगे तिलक को पौंछना अनिष्टकारी बतलाते हैं।
★ देवताओं पर केवल अनामिका से तिलक बिन्दु लगाया जाता है। तिलक की विधि सांस्कृतिक सौन्दर्य सहित जीवन की मंगल दृष्टि को मनुष्य के सर्वाधिक मूल्यवान् तथा ज्ञान विज्ञान के प्रमुख केन्द्र मस्तक पर अंकित करती है।
तिलक के मध्य में चावल :
★ तिलक के मध्य में चावल लगाये जाते हैं। तिलक के चावल शिव के परिचायक हैं। शिव कल्याण के देवता हैं जिनका वर्ण शुक्ल है।
★ लाल तिलक पर सफेद चावल धारण कर हम जीवन में शिव व शक्ति के साम्य का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। इच्छा और क्रिया के साथ ज्ञान का समावेश हो।
★ सफेद गोपी चन्दन तथा लाल बिन्दु इसी सत्य के साम्य का सूचक है।
★ शव के मस्तक पर रोली तिलक के मध्य चावल नहीं लगाते, क्योंकि शव में शिव तत्त्व तिरोहित है। वहाँ शिव शक्ति साम्य की मंगल कामना का कोई अर्थ ही नहीं है।

20.1.18

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी और अमर गाथा


नाम– राणी लक्ष्मीबाई गंगाधरराव
जन्म– 19 नवम्बर, 1835 वाराणसी
पिता– श्री. मोरोपन्त
माता– भागीरथी
पति    – राजा गंगाधरराव के साथ


” भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक वीर महिलाएं हुई है, जिन्होंने बहादुरी तथा साहस के साथ युद्ध भूमि में शत्रु से लोहा लिया. इनमे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. रानी वीरता, साहस, दयालुता, अद्वितीय सौन्दर्य का अनुपम संगम थी. दृढ़ता, आत्मविश्वास व देशभक्ति उनके हथियार थे जिससे अंग्रेजो को मात खानी पड़ी”.
     लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1835 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से उसे मनु कहा जाता था। मनु की माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान एवं धार्मिक महिला थीं। मनु जब चार वर्ष की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। क्योंकि घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गये जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया। लोग उसे प्यार से "छबीली" कहकर बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली। सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दियापर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।
    मनु का विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई किन्तु विधाता ने तो उन्हे किसी खास प्रयोजन से धरती पर भेजा था। पुत्र की खुशी वो ज्यादा दिन तक न मना सकीं दुर्भाग्यवश शिशु तीन माह का होतो होते चल बसा। गंगाधर राव ये आघात सह न सके। लोगों के आग्रह पर उन्होने एक पुत्र गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रक्खा गया। गंगाधर की मृत्यु के पश्चात जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ये कैसे सहन कर सकती थीं। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।
      घुड़सवारी करने में रानी लक्ष्मीबाई बचपन से ही निपुण थी। उनके पास बहोत से जाबाज़ घोड़े भी थे जिनमे उनके पसंदीदा सारंगी, पवन और बादल भी शामिल है। जिसमे परम्पराओ और इतिहास के अनुसार 1858 के समय किले से भागते समय बादल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाद में रानी महल, जिसमे रानी लक्ष्मीबाई रहती थी वह एक म्यूजियम में बदल गया था। जिसमे 9 से 12 वी शताब्दी की पुरानी पुरातात्विक चीजो का समावेश किया गया है। जनवरी 1858 में अंग्रेज सेना झांसी की तरफ बढी |अंगेजो की सेना को झांसी को चारो ओर से घेर लिया | मार्च 1858 में अंग्रेजो ने भारी बमबारी शुरू कर दी | लक्ष्मीबाई ने मदद के लिए तात्या टोपे से अपील की और 20000 सैनिको के साथ तात्या टोपे अंग्रेजो से लड़े लेकिन पराजित हो गये | तात्या टोपे से लड़ाई के दौरान अंग्रेज सेना झांसी की तरफ बढ़ रही थी और घेर रही थी | अंग्रेजो की टुकडिया अब किले में प्रवेश कर गयी और मार्ग में आने वाले हर आदमी या औरत को मार दिया |
      दो सप्ताह तक उनके बीच लड़ाई चलती रही और अंत में अंग्रेजो ने झांसी पर अधिकार कर लिया | हालांकि रानी लक्ष्मीबाई किसी तरह अपने घोड़े बादल पर बैठकर अपने पुत्र को अपनी पीठ पर बांधकर किले से बच निकली लेकिन रास्ते में उसके प्रिय घोड़े बादल की मौत हो गयी |उसने कालपी में शरण ली जहा पर वो महान योद्धा तात्या टोपे से मिली | 22 मई को अंग्रेजो ने कालपी पर भी आक्रमण कर दिया और रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में फिर तात्या टोपे की सेना हार गयी | एक बार फिर रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे को ग्वालियर की तरफ भागना पड़ा
     उनकी जीवनी के अनुसार ऐसा दावा किया गया था की दामोदर राव उनकी सेना में ही एक था। और उसीने ग्वालियर का युद्ध लड़ा था। ग्वालियर के युद्ध में वह अपने सभी सैनिको के साथ वीरता से लड़ा था। जिसमे तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओ ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिको की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्ज़ा कर लिया।
ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अन्तर्गत अंग्रेजों ने बालक दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ नीति के तहत झाँसी राज्य का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में करने का फैसला कर लिया। हालाँकि रानी लक्ष्मीबाई ने अँगरेज़ वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर कर दिया पर अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध कोई फैसला हो ही नहीं सकता था इसलिए बहुत बहस के बाद इसे खारिज कर दिया गया। अंग्रेजों ने झाँसी राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगादाहर राव के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काटने का हुक्म दे दिया। अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को झाँसी का किला छोड़ने को कहा जिसके बाद उन्हें रानीमहल में जाना पड़ा। 7 मार्च 1854 को झांसी पर अंगरेजों का अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और हर हाल में झाँसी की रक्षा करने का निश्चय किया।

      सन 1858 के जनवरी महीने में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया। लगभग दो हफ़्तों के संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने शहर पर कब्जा कर लिया पर रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्र दामोदर राव के साथ अंग्रेजी सेना से बच कर भाग निकली। झाँसी से भागकर रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं।
      7 मार्च, 1854 को ब्रिटिश सरकार ने एक सरकारी गजट जारी किया, जिसके अनुसार झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलने का आदेश दिया गया था. रानी लक्ष्मीबाई को ब्रिटिश अफसर एलिस द्वारा यह आदेश मिलने पर उन्होंने इसे मानने से इंकार कर दिया और कहा ‘ मेरी झाँसी नहीं दूंगी’और अब झाँसी विद्रोह का केन्द्रीय बिंदु बन गया. रानी लक्ष्मीबाई ने कुछ अन्य राज्यों की मदद से एक सेना तैयार की, जिसमे केवल पुरुष ही नहीं, अपितु महिलाएं भी शामिल थी; जिन्हें युध्द में लड़ने के लिए प्रशिक्षण दिया गया था. उनकी सेना में अनेक महारथी भी थे, जैसे : गुलाम खान, दोस्त खान, खुदा बक्श, सुन्दर – मुन्दर, काशी बाई, लाला भाऊ बक्शी, मोतीबाई, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह, आदि. उनकी सेना में लगभग 14,000 सैनिक थे.
10 मई, 1857 को मेरठ में भारतीय विद्रोह प्रारंभ हुआ, जिसका कारण था कि जो बंदूकों की नयी गोलियाँ थी, उस पर सूअर और गौमांस की परत चढ़ी थी. इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर ठेस लगी थी और इस कारण यह विद्रोह देश भर में फ़ैल गया था . इस विद्रोह को दबाना ब्रिटिश सरकार के लिए ज्यादा जरुरी था, अतः उन्होंने झाँसी को फ़िलहाल रानी लक्ष्मीबाई के अधीन छोड़ने का निर्णय लिया. इस दौरान सितम्बर – अक्टूबर, 1857 में रानी लक्ष्मीबाई को अपने पड़ोसी देशो ओरछा और दतिया के राजाओ के साथ युध्द करना पड़ा क्योकिं उन्होंने झाँसी पर चढ़ाई कर दी थी.

म्रुत्यु:

    रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श। रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।
      अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूरोज़ ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं।
झांसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया था। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया। 
     उन्होंने किले की दीवारों पर तोपे लगा दी. रानी की कुशल रणनीति और किलेबंदी देखकर अंग्रेजो ने दांतों तले अंगुलियाँ दबा ली. अंग्रेज सेना ने किले पर चारो ओर से आक्रमण कर दिया. 8 दिन तक घमासान युद्ध हुआ. रानी ने अपने महल के सोने व चाँदी का सामान भी गोले बनाने के लिए दे दिया.
     रानी ने संकल्प लिया की अंतिम सांस तक झाँसी के किले पर फिरंगियों का झंडा नहीं फहराने देंगी. लेकिन सेना के एक सरदार ने गद्दारी की और अंग्रेजी सेना के लिए किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया. अंग्रेजी सेना किले में घुस आई. झाँसी के वीर सैनिको ने अपनी रानी के नेतृत्व में दृढ़ता से दुश्मन का सामना किया. शत्रु की सेना ने झाँसी की सेना को घेर लिया. किले के मुख्यद्वार के रक्षक सरदार खुदाबख्स और तोपखाने के अधिकारी सरदार गुलाम गौंस खान की वीरतापूर्ण लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.
  

30.12.17

महान संस्कृत कवि भर्तृहरि का जीवन परिचय // Introduction of life of great Sanskrit poet Bhartruhari



    भर्तृहरि एक महान संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक) की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था इसलिये इनका एक लोकप्रचलित नाम बाबा भरथरी भी है।
जनश्रुति और परम्परा के अनुसार भर्तृहरि विक्रमसंवत् के प्रवर्तक सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के अग्रज माने जाते हैं। विक्रमसंवत् ईसवी सन् से 56 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है, जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा। भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थे, अतः इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा। विक्रमसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन् 78 और कुछ लोग ईसवी सन् 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। ये दोनों मत भी अग्राह्य प्रतीत होते हैं। फारसी ग्रंथ कलितौ दिमनः में पंचतंत्र का एक पद्य शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श का भाव उद्धृत है। पंचतंत्र में अनेक ग्रंथों के पद्यों का संकलन है। संभवतः पंचतंत्र में इसे नीतिशतक से ग्रहण किया गया होगा। फारसी ग्रंथ 571 ईसवी से 581 ई० के एक फारसी शासक के निमित्त निर्मित हुआ था। इसलिए राजा भर्तृहरि अनुमानतः 550 ई० से पूर्व हम लोगों के बीच आए थे। भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे। इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीति, वैराग्य तथा शृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक-काव्य लिखे हैं। इस शतकत्रय के अतिरिक्त, वाक्यपदीय नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है। कुछ लोग भट्टिकाव्य के रचयिता भट्टि से भी उनका एक्य मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नाथपंथ के वैराग्य नामक उपपंथ के यह ही प्रवर्तक थे। चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के अनुसार इन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। परंतु अन्य सूत्रों के अनुसार ये अद्वैत वेदान्ताचार्य थे। चीनी यात्री इत्सिंग के यात्रा विवरण से यह ज्ञात होता है कि 651 ईस्वी में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हुई थी। इस प्रकार इनका काल सातवीं शताब्दी का प्रतीत होता है, परन्तु भारतीय पुराणों में इनके सम्बन्ध में उल्लेख होने से संकेत मिलता है कि इत्सिंग द्वारा वर्णित भर्तृहरि कोई अन्य रहे होंगे। महाराज भर्तृहरि निःसन्देह विक्रमसंवत की पहली सदी से पूर्व में उपस्थित थे। वे उज्जैन के अधिपति थे। उनके पिता महाराज गन्धर्वसेन बहुत योग्य शासक थे। उनके दो विवाह हुए। पहले से विवाह से महाराज भर्तृहरि

और दूसरे से महाराज विक्रमादित्य हुए थे। पिता की मृत्यु के बाद भर्तृहरि ने राजकार्य संभाला। विक्रम के सबल कन्धों पर शासनभार देकर वह निश्चिन्त हो गए। उनका जीवन कुछ विलासी हो गया था। वह असाधारण कवि और राजनीतिज्ञ थे। इसके साथ ही संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने अपने पाण्डित्य और नीतिज्ञता और काव्य ज्ञान का सदुपयोग शृंगार और नीतिपूर्ण रचना से साहित्य संवर्धन में किया।
   एक बार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिये गये हुए थे। वहाँ काफी समय तक भटकते रहने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला। निराश पति-पत्नी जब घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें हिरनों का एक झुण्ड दिखाई दिया। जिसके आगे एक मृग चल रहा था। भर्तृहरि ने उस पर प्रहार करना चाहा तभी पिंगला ने उन्हें रोकते हुए अनुरोध किया कि महाराज, यह मृगराज ७ सौ हिरनियों का पति और पालनकर्ता है। इसलिये आप उसका शिकार न करें। भर्तृहरि ने पत्नी की बात नहीं मानी और हिरन को मार डाला जिससे वह मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़ा। प्राण छोड़ते-छोड़ते हिरन ने राजा भर्तृहरि से कहा-तुमने यह ठीक नहीं किया। अब जो मैं कहता हूँ उसका पालन करो। मेरी मृत्यु के बाद मेरे सींग श्रृंगीबाबा को, मेरे नेत्र चंचल नारी को, मेरी त्वचा साधु-संतों को, मेरे पैर भागने वाले चोरों को और मेरे शरीर की मिट्टी पापी राजा को दे दो। हिरन की करुणामयी बातें सुनकर भर्तृहरि का हृदय द्रवित हो उठा। हिरन का कलेवर घोड़े पर लाद कर वह मार्ग में चलने लगे।

रास्ते में उनकी मुलाकात बाबा गोरखनाथ से हुई। भर्तृहरि ने इस घटना से अवगत कराते हुए उनसे हिरन को जीवित करने की प्रार्थना की। इस पर बाबा गोरखनाथ ने कहा- मैं एक शर्त पर इसे जीवनदान दे सकता हूँ कि इसके जीवित हो जाने पर तुम्हें मेरा शिष्य बनना पड़ेगा। राजा ने गोरखनाथ की बात मान ली।
    भर्तृहरि ने वैराग्य क्यों ग्रहण किया यह बतलाने वाली अन्य किंवदन्तियां भी हैं जो उन्हें राजा तथा विक्रमादित्य का ज्येष्ठ भ्राता बतलाती हैं। इनके ग्रंथों से ज्ञात होता है कि इन्हें ऐसी प्रियतमा से निराशा हुई थी जिसे ये बहुत प्रेम करते थे। नीति-शतक के प्रारम्भिक श्लोक में भी निराश प्रेम की झलक मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने प्रेम में धोखा खाने पर वैराग्य जीवन ग्रहण कर लिया था, जिसका विवरण इस प्रकार है। इस अनुश्रुति के अनुसार एक बार राजा भर्तृहरि के दरबार में एक साधु आया तथा राजा के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उन्हें एक अमर फल प्रदान किया। इस फल को खाकर राजा या कोई भी व्यक्ति अमर को सकता था। राजा ने इस फल को अपनी प्रिय

रानी पिंगला को खाने के लिए दे दिया, किन्तु रानी ने उसे स्वयं न खाकर अपने एक प्रिय सेनानायक को दे दिया जिसका सम्बन्ध राजनर्तिकी से था। उसने भी फल को स्वयं न खाकर उसे उस राजनर्तिकी को दे दिया। इस प्रकार यह अमर फल राजनर्तिकी के पास पहुँच गया। फल को पाकर उस राजनर्तिकी ने इसे राजा को देने का विचार किया। वह राजदरबार में पहुँची तथा राजा को फल अर्पित कर दिया। रानी पिंगला को दिया हुआ फल राजनर्तिकी से पाकर राजा आश्चर्यचकित रह गये तथा इसे उसके पास पहुँचने का वृत्तान्त पूछा। राजनर्तिकी ने संक्षेप में राजा को सब कुछ बतला दिया। इस घटना का राजा के ऊपर अत्यन्त गहरा प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने संसार की नश्वरता को जानकर संन्यास लेने का निश्चय कर लिया और अपने छोटे भाई विक्रम को राज्य का उत्तराधिकारी बनाकर वन में तपस्या करने चले गये। इनके तीनों ही शतक उत्कृष्टतम संस्कृत काव्य हैं। इनके अनेक पद्य व्यक्तिगत अनुभूति से अनुप्राणित हैं तथा उनमें आत्म-दर्शन का तत्त्व पूर्णरूपेण परिलक्षित होता है।
   अपने जीवन काल में उन्होंने शृंगार, नीति शास्त्रों की तो रचना की ही थी, अब उन्होंने वैराग्य शतक की रचना भी कर डाली और विषय वासनाओं की कटु आलोचना की। इन तीन काव्य शतकों के अलावा व्याकरण शास्त्र का परम प्रसिद्ध ग्रन्थ वाक्यपदीय भी उनके महान पाण्डित्य का परिचायक है। वह शब्द विद्या के मौलिक आचार्य थे। शब्द शास्त्र ब्रह्मा का साक्षात् रुप है। अतएव वे शिवभक्त होने के साथ-साथ ब्रह्म रूपी शब्दभक्त भी थे। शब्द ब्रह्म का ही अर्थ रुप नानात्मक जगत-विवर्त है। योगीजन शब्द ब्रह्म से तादात्म्य हो जाने को ही मोक्ष मानते हैं। भर्तृहरि शब्द ब्रह्म के योगी थे। उनका वैराग्य दर्शन परमात्मा के साक्षात्कार का पर्याय है। सह कारण है कि आज भी शब्दो की दुनिया के रचनाकार सदा के अमर हो जाते है। भर्तृहरि एक महान् संस्कृत कवि थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं।

इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक ) की उपदेशात्मक कहानियां भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था, इसलिए इनका एक लोक प्रचलित नाम बाबा गोपीचन्द भरथरी भी है। भर्तृहरि संस्कृत मुक्तक काव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरल, मनोरम, मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग, विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियां जन-जन में प्रचलित रही हैं और समय-समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।
    भर्तृहरि संस्कृत मुक्तककाव्य परम्परा के अग्रणी कवि हैं। इन्हीं तीन शतकों के कारण उन्हें एक सफल और उत्तम कवि माना जाता है। इनकी भाषा सरल, मनोरम, मधुर और प्रवाहमयी है। भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि वह पाठक के हृदय और मन दोनों को प्रभावित करती है। उनके शतकों में छन्दों की विविधता है। भाव और विषय के अनुकूल छन्द का प्रयोग, विषय के अनुरुप उदाहरण आदि से उनकी सूक्तियाँ जन-जन में प्रचलित रही हैं और समय-समय पर जीवन में मार्गदर्शन और प्रेरणा देती रही हैं।

पति का वशीकरण कैसे करें?//Pati ka vashikaran Kaise kare.


 आप किसी सप्ताह के शुक्रवार का इंतजार करें और उस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करे. रात को जब आपके पति सोने के लिए जाएँ तो आप 3 इलायची को अपने शरीर से स्पर्श कराकर उनके पास रख दें. अगले दिन सुबह उठकर आप जब उनके लिए चाय या खाना बनायें तो इन इलायचियों को पीसकर उनके खाने में मिला दें. आप इस उपाय को 3 से 4 सप्ताह तक अवश्य करें आपको खुद फर्क दिखने लगेगा. · कुछ पत्नियों को डर रहता है कि उनका पति उनको छोड़कर किसी अन्य स्त्री के पास चला जाएगा. जिसकी वजह से वे काफी चिंतित रहने लगती है किन्तु उनकी चिंता का समाधान हमारा ये उपाय है, जिसके लिए वे नारियल, कपूर और थोड़े धतूरे के बीज को पीसकर उसका पाउडर तैयार कर लें. इसके बाद आप इसमें थोडा शहद मिलाकर उसका लेप तैयार कर लें. आप इस लेप से प्रतिदिन खुद को और अपने पति को लेप करे. इस तरह आपका पति कही आपको छोड़कर नही जाता है

27.12.17

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत


प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास के विषय में जानकारी मुख्यता चार स्त्रोतों से प्राप्त होती है ।
(1) धर्म ग्रंथ
(2) ऐतिहासिक ग्रंथ
(3) विदेशियों का विवरण
(4) पुरातत्व संबंधी साक्ष्य
धर्म ग्रंथ एवं ऐतिहासिक ग्रंथ से मिलनेवाली महत्वपूर्ण जानकारी
भारत का सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ वेद है जिसके संकलनकर्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास को माना जाता है। वेद चार हैं
(1) ऋग्वेद
(2) यजुर्वेद
(3) सामवेद
(4) अर्थववेद
ऋग्वेद - ऋचाओ के क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है । इस में 10 मंडल 1028 सूक्त ( वाल खिल्य पाठ के 11 सूत्र सहित ) एवं 10462 ऋचाये है। इन ऋचाओ को पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहते हैं । इस वेद से आर्य के राजनीतिक प्रणाली एवं इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है ।
विश्वामित्र द्वारा रचित ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता सावित्री को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है।
नवे मंडल में देवता सोम का उल्लेख है इसके आठवें मंडल में हस्त लिखित रचनाओं को खिल कहा जाता है।
चतुष्वर्ण समाज की कल्पना का आदि स्रोत ऋग्वेद के दसवें मंडल में वर्णित पुरुष सूक्त है । जिसके अनुसार चार वर्ण बाम्हण , क्षत्रिय , सूद्र और वैश्य आदि पुरुष ब्रह्मा के क्रमश: मुख , भुजा, जंघा एवं चरणों से उत्पन्न हुए हैं ।
नोट- धर्मसूत्र चार प्रमुख जातियों की स्थितियों व्यवसाय एवं दायित्वों कर्तव्य तथा विशेष अधिकारों में स्पष्ट विभेद करता है।
वामन अवतार के 3 पगों के आख्यान का प्राचीनतम स्त्रोत ऋग्वेद है ।

ऋग्वेद में इंद्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओ की रचना की गई है ।
प्राचीन इतिहास के साधन के रुप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है
यजुर्वेद - सस्वर पाठ के लिए मंत्र तथा बलि के समय अनुपालन के लिए नियमों का संकलन यजुर्वेद कहलाता है। इसके पाठकर्ता को अध्वर्यु कहते हैं ।यह एक ऐसा वेद है जो गद्य एवं पद्य दोनों में है ।
शामवेद - यह गाए जा सकने वाली ऋचाओ का संकलन है ।इसके पाठकर्ता को उद्रातृ कहते हैं । इसे भारतीय संगीत का जनक माना जाता है ।
अथर्ववेद -अथर्व ऋषि द्वारा रचित इस वेद में रोग निवारण ,तंत्र मंत्र ,जादू टोना, शाप , वशीकरण आशीर्वाद ,की स्तुति , प्रयश्चित , औषधि , अनुसंधान विवाह ,प्रेम ,राजकर्म, मातृभूमि आदि से सम्बन्धित विषयों के संबंध में मंत्र तथा सामान्य मनुष्य के विचारों विश्वास है अंधविश्वास हो आदि का वर्णन है ।
इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है ।
सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का वेद अथर्ववेद है ।
वेदों को भलीभांति समझने के लिए 6 वेदांगों की रचना हुई है। यह है -
(1) शिक्षा
(2) ज्योतिष
(3) कल्प
(4) व्याकरण
(5) निरुक्त
(6) छंद
भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है ।इसके रचयिता लोमहर्ष अथवा उनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं ।इनकी संख्या 18 है इसमें केवल पांच -मत्स्य, वायु, विष्णु ,ब्राह्मण एवं भागवत में ही राजाओं की वंशावली पाई जाती है पुराणों में मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन एवं प्रमाणित है।
अधिकतर पुराण सरल संस्कृत श्लोक में लिखे गए हैं। स्त्रियां तथा सूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी। वह पुराण सुन सकते थे पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे ।
स्मृति ग्रंथों में सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक मनुस्मृति मानी जाती है यह शुंग काल का मानक ग्रंथ है ।
नारद स्मृति गुप्त युग के विषय में जानकारी प्रदान करता है ।
जातक में बुद्ध की पूर्व जन्म की कहानी वर्णित है ।
हीनयान का प्रमुख ग्रंथ कथावस्तु है ।जिसमें महात्मा बुद्ध का जीवन चरित्र का अनेक कथनको के साथ वर्णन है
जैन साहित्य को आगम कहा गया है जैन धर्म का प्रारंभिक इतिहास कल्पसूत्र से ज्ञात होता है ।
जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महावीर के जीवन मृत्यु के साथ अन्य स्म्कालिको के साथ उनके संबंधों का विवरण मिलता है ।
अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य हैं यह 15 वर्णों एवं 180 प्रकरणों में विभाजित है जिसमें मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है ।
संस्कृत साहित्य के ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमबद्ध लिखने का सर्व प्रथम प्रयास कल्हण ने किया कल्हण द्वारा रचित पुस्तक राजतरंगिणी है ।जिसका संबंध कश्मीर की इतिहास से है ।
अरबों की सिंध विजय का वृतांत चचनामा (लेखक अली अहमद )में सुरक्षित है।
अष्टाध्यायी संस्कृत भाषा व्याकरण की प्रथम पुस्तक है इसके लेखक पाणिनि है । इससे मौर्य की पहले का इतिहास तथा मौर्य युगीन राजनीतिक अवस्था की जानकारी प्राप्त होती है ।
कात्यायन की गार्गी संहिता एक ज्योतिष ग्रंथ है फिर भी इससे भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है ।
पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे उनकी महाभाष्य से शुंगो के इतिहास का पता चलता है।
विदेशी यात्रियों के विवरणों से मिलने वाली जानकारी
(1) यूनानी - रोमन लेखक
टेटियस- यह ईरान का राजवैद्य था भारत के संबंध में इसका विवरण आश्चर्यजनक कहानियां से पर आधरित होने के कारण अविश्वसनीय है ।
हेरोडोटस - इसे इतिहास का पिता कहा जाता है जिसने अपनी पुस्तक हिस्टोरीका में पांचवी शताब्दी ईसापूर्व के भारत फारस संबंध का वर्णन किया है। परंतु इसका विवरण भी अनुसूचियों एवं अफवाहों पर आधारित है।
सिकंदर के साथ आने वाले लेखकों में- निर्याकस , आनेसिक्रटस, तथा आस्टियोबुलस के विवरण अधिक प्रमाणित एवं विश्वसनीय है ।
मेगास्थनीज यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था। जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था उसने अपनी पुस्तक इंडिका में मौर्य युगीन समाज की संस्कृति के विषय में लिखा ।
डाईमेकस यह सीरिया नरेश एंटीयोकस का राजदूत था जो बिंदुसार के दरबार में आया था ।इसका विवरण मौर्य युग से संबंधित है ।
डायोनिसिय- यह मिश्र नरेश टालमी का राजदूत था जो अशोक के दरबार में आया था ।
टालमी ने दूसरी शताब्दी में भारत का भूगोल नामक पुस्तक लिखी ।
प्लिनी -इसने सर्वप्रथम पहली शताब्दी में नेचुरल हिस्ट्री नामक पुस्तक लिखी इसमें भारतीय पशुओं पेड़ पौधों खनिज पदार्थो आदि के बारे में विवरण मिलता है।
पेरिप्लस ऑफ़ द इरिथ्रयन -इस पुस्तक के लेखक के बारे में जानकारी नहीं है यह लेखक करीब 80 ईसवी में हिन्द महासागर की यात्रा पर आया था उस समय के भारत के बंदरगाहों तथा व्यापारिक वस्तुओं के बारे में जानकारी दी गई है।
(2) चीनी लेखक -
फहीयान - यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आया था। इसने अपने विवरण में मध्य प्रदेश के समाज एवं संस्कृति के बारे में वर्णन किया है इसने मध्य प्रदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया है
संयुगन -यह 518 ई वी में भारत आया जिसने अपने 3 वर्षों की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्रतियां एकत्रित की।

ह्वेनसांग -यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था वह 629 ईसवी में चीन से भारत के लिए प्रस्थान किया और लगभग 1 वर्ष की यात्रा के बाद सर्वप्रथम वह भारतीय राज्य कपीसा पहुंचा । भारत में 15 वर्षों तक ठहरकर 645 इस्वी में चीन लौट गया ।वह बिहार में नालंदा जिला में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा भारत के बौद्ध ग्रंथ को एकत्रित कर ले जाने के लिए आया था इसका भ्रमण वृतांत सि-यू-की नाम से प्रसिद्ध है । जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है जिसने हर्ष कालीन समाज धर्म तथा राजनीति के बारे में वर्णन किया है। इसके अनुसार सिंध का राजा शुद्र था । ह्वेनसांग के अध्यन के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे।
इत्सिंग - सातवीं शताब्दी के अंत में भारत आया उसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया।
अरवी लेखक
अलबरूनी यह मोहम्मद गजनबी के साथ भारत आया था अरबी में लिखी गई उसकी कृति किताब-उल-हिंद या तहकीक ए हिंद (भारत की खोज) आज भी इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है इस में राजपूत कालीन समाज धर्म रीति रिवाज राजनीति पर सुंदर प्रकाश डाला गया है ।
अन्य लेखक
तारा नाथ - यह एक तिब्बती लेखक था जिसने कन्ग्युर तथा तन्ग्युर नामक ग्रंथ की रचना की इनसे भी भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है
मार्कोपोलो यह 13 वीं शताब्दी के अंत में पांड्य देश की यात्रा पर आया था इसका विवरण पांड्य इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी है
पूरातत्व सम्बन्धी सक्ष्यो से मिलने वाली जानकारियां-
1400 इसवी पूर्व के अभिलेख बोगजकोई (एशिया माइनर )से वैदिक देवता मित्र ,अरुण, वरुण, इंद्र एवं नासत्य के नाम मिलते हैं ।
मध्य भारत में भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण यवन राजदूत होलियोडोरस के वेसनगर (विदिशा ) के गरुड़ स्तंभ लेख से प्राप्त होता है ।
सर्वप्रथम भारतवर्ष का जिक्र हाथीगुंफा अभिलेख में है।
सर्वप्रथम दुर्भिक्ष की जानकारी देने वाला अभिलेख सौहगौरा अभिलेख है ।
सर्वप्रथम भारत पर होने वाले हूण आक्रमण की जानकारी भीतरी स्तंभ लेख से प्राप्त होता है ।
सती प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य एरण अभिलेख (शासक भानुगुप्त) से प्राप्त होती है।
रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी मंदसौर अभिलेख से प्राप्त होता है ।
अभिलेखों का अध्ययन की इपीग्राफी कहलाता है।
कश्मीर नवपाषाण पुरास्थल बुर्जहोम से गर्तआवास (गड्ढा घर )का साक्ष्य मिला है इसमें उतरने के लिए सीढ़ियां होती थी ।
प्राचीनतम सिक्को को आहत सिक्का कहा जाता है इसी को साहित्य में काषार्पण कहा गया है ।
सर्वप्रथम सिक्कों पर लेख लिखने का कार्य यवन शासकों ने किया।
समुद्रगुप्त की वीणा बजाती हुई मुद्रा वाले सिक्के से उसके संगीत प्रेमी होने का प्रमाण मिलता है ।
आरिकमेडू (पुदुच्चेरी के निकट )से रोम सिक्के प्राप्त हुए हैं। जो प्राचीन काल में भारत रोम व्यापार के द्योतक है ।