22.3.17

1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया


1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया??

1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया|एक कुतर्क आखिर हिन्दू 1000 सालों तक हुए इस्लामी हमलों में कैसे सुरक्षित बचा ?
इस्लाम की आंधी जिसने आधे एशिया को अरबी मजहब का गुलाम बना दिया यहाँ से आगे क्यों नहीं बढ़ पाया
इन्टरनेट पर मुस्लिम ये बात बहुत कहते हैं जो कि कुछ कुतर्की मुस्लिम विद्वानों की सोच का नतीजा है जो वो इस्लामी शासनकाल के खून और लाशों के ढेर को छुपाने , गैर मुस्लिम के ऊपर किये गए अत्याचारों को झूठा साबित करने , मंदिरों की लूट और कत्लेआम को राजनीतिकरण से जोड़ कर , इस्लाम को शान्ति का मजहब साबित करने और खुद को पाक साफ़ साबित करने के लिए करते हैं |वैसे तो बहुत से देश में इस्लामीकरण और उसके बाद हुए कत्लेआम की निशानियाँ भी शेष नहीं है पर फिर भी बहुत सी सभ्यताएं इतना सब होने के बाद भी सर उठा के खड़ी हुई हैं इनमे तत्कालीन पारस यूरोप का एक बड़ा हिस्सा और भारत प्रमुख हैं |जहाँ पारस आज बहुत हद तक इस्लामीकरण की चपेट में है पर आज से कुछ साल पहले वहां की संस्कृति भारत की तरह विकसित थी इतिहास में नजर डालने पे पता चलता है की भारत के राजाओं में राजनीतिक एवं पारिवारिक सम्बन्ध थे |
   आखिर 1000 साल में पूरे आर्यावर्त का इस्लामीकरण क्यों नहीं हो पाया जबकि मुस्लिम शासक पूरी ताकत से मंदिरों को तोड़ के मस्जिदे बनवा रहे थे लूट रहे थे धार्मिक स्थानों पे कब्रिस्तान बसाए जा रहे थे , हिन्दुओं को मारा जा रहा था और महिलाओं से ज्यादतियां हो रही थी फिर भी मुस्लिम विचारक इस बात से परेशान हो जाते हैं आखिर इतने सब के बाद भी ये हिन्दू बच कैसे गया आज भी मुस्लिम सिर्फ ३० % हो पाए जब बांग्लादेशियों को भी बसा लिया |
1 – हिन्दूवीरों की तलवारें
तलवारें जो सदा मलेक्षों के खून की प्यासी रहीं जिन्होंने अपने जीते जी मुस्लिम आक्रान्ताओं को अपने राज्यों में घुसने नहीं दिया डेक्कन वीर शिवाजी और मराठा राजाओं ने 1670 से औरंगजेब की सेनाओं को हराते हुए कुछ ही वर्षों में पुरे मुग़ल साम्राज्य को उखाड़ फेका और 1818 तक राज्य किया उन्होंने हिन्दुकुश पर्वत के आखिरी छोर अफगानिस्तान तक भगवा झंडे गाड दिए |
राजस्थान में राजपूतों और महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने कभी मलेचों को टिकने ही नहीं दिया |
     

भरतपुर और मथुरा में जाट वीरों ने दुशमनो को मार मार के भगाया , वीरदुर्गादास राठौर जैसे राजाओं ने , बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल, विजयगढ़ के राजा कृष्णदेव ने इस्लामी शासन जड़ो को कभी उत्तर भारत में मजबूत नहीं होने दिया हिन्दू समाज के लिए हमेशा ऐसे राज्य उपलब्ध थे जहाँ वो सुरक्षित थे |
दूसरी तरफ सिख गुरुओं ने बंदा बैरागी हरी सिंह नलवा और महराजा रणजीत सिंह ने भी अपने अपने छेत्रों में मुस्लिम आक्रांताओ की इट से इट बजा दी |
कुल मिलाके जितनी तेजी से मुस्लिम शासक सत्ता में आये उतनी ही तेजी से सम्पूर्ण भारत में शुर वीरों ने उनसे अपनी तलवारें भी तेज की |
2 – हिन्दुओं में मलेक्षों के प्रति नफरत –
हिन्दुओं के कत्लेआम , औरतों ( विधवा , शादीशुदा , या नाबालिग लड़कियों ) के प्रति होने वाले मुस्लिम सेनाओं और राजाओं के व्यभिचारो , बलात धर्मान्तरण , मंदिरों की लूट और तोड़फोड़ , मंदिरों में गाये की हत्या , धार्मिक स्थलों को तोड़ फोड़ के मस्जिद और कब्रिस्तान बनाने की वजह से समस्त हिन्दू समाज में मलेक्षों के प्रति नफरत थी भले ही बलात धर्मान्तरित किसी एक ही परिवार के लोग होते थे पर वे सभी सामजिक रूप से समाज से निष्काषित ही थे जिस कारण समाज में एक भावना काम कर रही थी और लोग अत्याचारों को सहते हुए भी धर्मान्तरित नहीं हुए |
मुख्य आजीविका का साधन कृषि था और पूरे देश की जमीनें खाली जब कही मुस्लिम शासन पहुचता था हिन्दू समाज वो क्षेत्र ही छोड़ देते थे और नए स्थानों पे बस के नारकीय जीवन से बच जाते थे और अपनी और अपने घर वालों की इज्जत आबरू और धर्म की रक्षा कर लेते थे | ऐसा सदियों से हो रहा था तो ये कोई नई बात नहीं थी मुस्लिम शासन काल से पहले भी जब कोइ राजा युद्ध हार जाता था तो या तो वो किसी मित्र राज्य में शरण लेता था मंत्रियों के साथ या बंदी बना लिया जाता था पर जो मुस्लिम सेनाये करती थी वो कोई नहीं क्योंकि मुस्लिम सेनाओ को हिन्दू लड़कियों को अपने हरम में भरने की आदत थी तो यही था जो वो कर सकते थे |
उदाहरण के लिए जब गुजरात में मुस्लिम शासन आया तो सौराष्ट्र के भगेल राजा रावल चले गए |
उत्तर भारत के झांसी चले गए |
जब शिवाजी का शासन आया तो बहुत से ब्राह्मण वहां चले गए |
ये सरल तरीका था की शिकार ही वहां से हट जाए जहाँ शिकारी पहुचे और इस्लामी शासन में अशक्त छोटे राज्यों की प्रजा के द्वारा अपनाया गया | हिन्दुओं ने लगातार प्रवास का नुकसान स्वीकार किया पर इस्लाम में परिवर्तन नहीं किया |
3 – जजिया –



हिन्दुओं ने मुस्लिम शासकों के द्वारा लगाया गया घ्रणित शरिया टैक्स जजिया स्वीकार किया और पर जनेऊ को नहीं छोड़ा | उच्च कुलीन हिन्दुओं और राजाओं को इस्लाम में परिवर्तन के लिए पैसे / पोस्ट / मुस्लिम महिलाओं ( हरम की ) का भी प्रोत्साहन दिया गया पर शहद ही किसी ने इन प्रस्तावों को स्वीकार किया सभी ने घ्रणित इस्लामी टैक्स को भुगतान किया पर हिन्दू धर्म को नहीं छोड़ा | तलवार को छोड़ कर हुए इन धृष्ट विचारों के युद्ध में भी समाज ने न झुकते हुए पूरी क्षमता से खुद को बचाए रक्खा | अकबर के नवरतन आदि इन्ही चालों का हिस्सा थे हिन्दुओं को आकर्षित करने के लिए |
4 – भक्ति आन्दोलन –
हिंदूइस्म को समेट के रखने में संतो का अविश्वसनीय योगदान रहा धर्मान्तरित हिन्दुओं एवं दुखी हिन्दू समाज को अलग अलग संतों ने श्रेष्टतम हिन्दू धर्म का सन्देश देते हुए उन्हें आपस में जोड़े रक्खा ये भक्ति आन्दोलन का ही असर था की कुछ पीढ़ी पूर्व धर्मान्तरित हुए हिन्दू तो क्या जन्मजात अरबी मुस्लिम भी हिंदूइस्म में खिचे चले आये |
रसखान और औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा बेगम और भतीजी ताज बेगम महान कृष्ण भक्त हुई जिन्होंने हिन्दुइज्म में न आ पाने के बाद भी भक्तिरस से हिन्दू या मुसलमान क्या सम्पूर्ण आर्यावर्त को तृप्त कर दिया |
ये सब संभव हुआ भक्ति आन्दोलन के कारण |
 
भक्ति आन्दोलन के द्वारा हिन्दू धर्म ने इस्लाम के प्रचार, जोर-जबरजस्ती एवं राजनैतिक हस्तक्षेप का कड़ा मुकाबला किया। इसका बहुत हद तक इस्लामी विचारधाराओं पे असर पड़ा जिसके बचाव के लिए सूफीवाद का जाल फेका गया जिसे हम आज भी पीर फ़कीर कब्र और साईं के रूप में देख रहे हैं |
भक्ति आन्दोलन बहुत कम समय में पूरे दक्षिणी एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप) में फैला तथा लम्बे काल तक चला।
इसमें समाज के सभी वर्गों (निम्न जातियाँ, उच्च जातियाँ, स्त्री-पुरुष, सनातनी, सिख, मुसलमान आदि) का प्रतिनिधित्व रहा।
5 – शुद्धि आन्दोलन –
शुद्धि आन्दोलन का उद्देश्य बलात धर्मान्तरित लोगों को वापस हिन्दू धर्म में लाना था दयांनंद द्वारा चलाये गये ‘शुद्धि आन्दोलन’ के अन्तर्गत उन लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में आने का मौका मिला जिन्होने किसी कारणवश इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। एनी बेसेंट ने कहा था कि स्वामी दयानन्द ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होने कहा कि
“ ‘भारत भारतीयों के लिए है। “
शुद्धि आन्दोलन ने कुछ ही समय में लाखों बलात धर्मान्तरित मुसलमानों को स्वधर्म में वापसी करवाई |
6 – मुस्लिम शासकों के अरबी शौक –
अधिकतर मुस्लिम शासक अरबी मरदाना बीमारियों से पीड़ित थे | बाबर जहाँ समलैंगिक और नशेडी था वही शाहजहाँ जहाँगीर अकबर आदि अपने हरम भरने में व्यस्त थे | शाहजहाँ शराब में डूबा रहता था |
7 – इस्लाम का नैतिक रूप से आर्य विरुद्ध होना –
इस्लामी आचरण नैतिक रूप से उसकी शिक्षाओ के कारण वेद विरुद्ध था तो किसी भी आर्य के मन में वो कैसे घुसता ? अधिकतर मुसलमान मांसाहारी और कब पूजक हो जाते थे उन्हें नहाने और शरीर की शुद्धता से कोई मतलब नहीं था जबकि हिन्दू सुबह शाम नहाते थे , मॉस , शराब और बहुविवाह आदि प्रथाएं मुस्लिमो में थी तो जो भी मुसलमान था उसका समाज सिर्फ उतना ही था जहाँ वो है अन्य समाज से वो पूर्णतया निष्काषित था इसीलिए उस समय के समाज ने भी मलेक्ष जैसे शब्द का इस्तेमाल मुसलमानों के लिए किया था |
अंत में अरबों को शारीरिक विजय तो अवश्य प्राप्त हुई, परन्तु धार्मिक रूप में हिन्दू धर्म के युक्ति-युक्त सिद्धान्तों के सामने इस्लाम को पराजय प्राप्त हुई। इसी सत्य को मौलाना अल्ताफ हुसैन हालीजी ने इन शब्दों में स्वीकार किया है-
वह दीने हिजाजीका बेबाक बेड़ा।

https://pparihar.com/ से साभार 

14.2.17

मनुष्य को क्रोध क्यों नहीं करना चाहिए?


  क्या आपने सोचा है कि आपके मन में गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है ? क्या आपने कभी सोचा है कि क्रोध व गुस्सा आपके लिए हानिकारक है या लाभदायक ? यदि यह आपके लिए हानिकारक है तो क्या आप जानते हैं कि क्रोद्ध व गुस्सा पर नियंत्रण कैसे करें
अपने दैनिक जीवन में हम अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग कारणों से क्रोध करते रहते हैं । लेकिन यदि हम बाद में ठंडे दिमाग से उस पर सोचते है तो हमें यह अहसास होता है की उस समय हमारा क्रोध करना नादानी थी । हम उस क्षण को बिना क्रोध किए भी संभाल सकते थे । ज्यादातर मामलों में क्रोध करना हमारी ओवर-रिएक्शन (अति-प्रतिक्रिया) होतीं हैं । इसके अलावा क्रोध करने के हमारे जीवन पर कई बुरे प्रभाव भी पड़ते हैं जिनका हम यहां अलग-अलग विश्लेषण करते हैं।
व्यक्ति के रिश्तों पर : जिस व्यक्ति पर क्रोध किया जाता है उससे रिश्तों पर भी प्रभाव पडता है । यदि वह व्यक्ति महत्वपूर्ण है तो उससे रिश्ते खराब होना नुकसानदायक भी हो सकता है । 
 
*तमो गुण बढ़ने से अहंकार और अज्ञान उत्पन्न होता है तथा सब प्रकार के भेद अहंकार से उत्पन्न होते हैं। भेद उत्पन्न होते ही लोग एक दूसरे से तुलना करने लगते हैं तथा दूसरे में कमी निकालने लगते हैं। कमी निकालनेवाले नजरिए की वजह से सभी में कमी निकालना एक स्वभाव सा बन जाता है। अज्ञानता के कारण ही लोगों में सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाता है। ऐसे में व्यक्ति दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं। दोषारोपण करने से क्रोध व गुस्सा उत्पन्न हो जाते हैं।
व्यक्ति की मनोदशा पर :
 क्रोध में व्यक्ति की मनोदशा अर्द्ध-पागल की हो जाती है । उसका अपने संवेगों पर नियंत्रण नहीं रहता है ऐसी स्थिति में वह कुछ भी कर सकता है ।
क्रोध समस्या का समाधान नहीं-
*कभी-कभी परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि व्यक्ति का क्रोध में आ जाना स्वाभाविक हो जाता है । लेकिन क्रोध समस्या का समाधान नहीं हैं । क्रोध एक प्रकार की आग होतीं हैं । जैसे लकड़ी में आग लगाती है तो वह दूसरे को जलाये या न जलाये पहले स्वयं जलती है । इसी प्रकार क्रोध में व्यक्ति स्वयं को ही जलता है । इसके अलावा क्रोध में व्यक्ति कई बार ऐसे काम कर बैठता है जिसके कारण उसकी गलती नहीं होते हुए भी अपने आपको कसूरवार बना बैठता है ।
*व्यक्ति के गुण पर :
 क्रोध व्यक्ति का एक अवगुण है । क्रोधी व्यक्ति की लोगों से कम पटती है घर, परिवार तथा कार्य स्थल पर उसको चाहने वाले लोग कम होते है ।
व्यक्ति के कार्यों पर :
 क्रोध में व्यक्ति कई बार ऐसे कार्य कर बैठता है जिसकी उसको बाद में भारी कीमत चुकानी पड सकती है । झगड़ा, मारपीट, हत्या जैसे अपराध व्यक्ति क्रोध में ही करता है ।
*व्यक्ति की वाणी पर :
 क्रोध में व्यक्ति का भाषा का स्तर अकसर गिर जाता है । और कई बार वह क्रोध में शालीनता की सारी हदें पार करके गाली गलौज पर उत्तर जाता है ।
व्यक्ति के निर्णयों पर : 
 
क्रोध में लिये गए निर्णय ज्यादातर गलत होते है । जिसका नुकसान व्यक्ति को बाद में जीवन भर उठाना पड सकता है । और उसको ऐसे निर्णयों का पछतावा जीवन भर रह सकता है ।
*क्रोध को काबू में कैसे करें
उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर हम यह कह सकते है कि क्रोध करने से नुकसान ही नुकसान है इस कारण इसको काबू में करने में ही समझदारी है अब प्रश्न उठता है की क्रोध को काबू में कैसे करे ? क्रोध को रोकने की ऐसे तो कोई निश्चित विधि नहीं है । लेकिन यदि व्यक्ति निम्न उपाय करें तो उसको क्रोध को काबू में करने में कम या ज्यादा कुछ तो सहायता मिल ही सकती है ।
*सबसे पहले व्यक्ति को क्रोध के उपरोक्त दुष्परिणाम तथा इसकी निरर्थकता को अच्छी तरह समझना चाहिए क्योंकि तभी व्यक्ति के मन में इससे छुटकारा पाने की पक्की इच्छा आती हैं । और एक बार मन में पक्की इच्छा आ जानें के बाद क्रोध से छुटकारा पाने की शुरूआत हो जाती है ।
 *.क्रोध को काबू में करने के लिए प्रतिदिन क्रोध आने की संख्या को प्रयास करके कम करने की कोशिश करें । इसके लिए जब भी क्रोध आये लंबी सांस ले ले या पानी पी ले या दोनों ही करें ।
*.किसी की गलती पर क्रोध आने पर सोचें की इस संसार में संपूर्ण कोई भी नहीं है गलती किसी से भी हो सकती है ।
*यह सोचें की जो जैसा करेगा वैसा भरेगा सज़ा देना ईश्वर का काम है और एक न एक दिन ईश्वर किये की सज़ा देता ही है ।
*जीवन में अलग-अलग परिस्थिति में स्वयं से जो भी सबसे अच्छे से अच्छा हो सकता है वह करें इसके बाद जो भी फल मिलता है उसको ईश्वर का आशीर्वाद तथा प्रसाद समझ कर स्वीकार करें ।
*जीवन में अध्यात्म को अपनाये इससे व्यक्ति को मन की शांति मिलती हैं।
*जिस समय क्रोध आ रहा है उस समय एक बार उस जगह से स्वयं को हटा ले और थोडा इधर उधर टहल ले या बाथरुम चले जाये । जब क्रोध कुछ शांत हो जाये तब वापिस आ जाये ।
*क्रोध आने पर इसके दुष्परिणाम तथा निरर्थकता के बारे में सोचने लगे ।

 
* गुस्सा उत्पन्न होने से मानसिक तनाव उत्पन्न हो जाता है।मानसिक तनाव उत्पन्न होने से मन की शांति ख़त्म हो जाती है और दोनों के बीच झगड़ा छिड़ जाता है। इस कारण लोगों का पतन हो जाता है। लोगों का पतन होने से कुछ भी बुरा होने का दोष भगवान पर मढ़ देता है। वह कहता है कि मैंने भगवान का इतना पूजा-पाठ किया और बदले में उन्होंने मुझे ये परेशानियां दीं। लेकिन इसके विपड़ीत जब कुछ अच्छा होता है, तब वह खुद को ही शाबाशी देता है।इसलिए यदि आप इस पड़ेशानी में घिर गए हैं तोतमो गुण को नष्ट करने के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चाहिए कि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ परमेश्वर के परायण हो कर ध्यान में बैठे। क्योंकि जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में होती है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। (गीता २:६१) मनुष्य की बुद्धि स्थिर होजाने से एकदम सही और एकदम गलत में फर्क समझ में आने लगता है। सही और गलत में फर्क समझ में आजाने से क्रोध व गुस्सा नष्ट हो जाता है। क्रोध व गुस्सा के नष्ट होते ही सबके लिए प्रेम उपजने लगता है। इसलिए तू पहले सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी क्रोध व गुस्सा को बल पूर्वक मार डाल । गीता ३ :४२ में परमेश्वर ने कहा कि स्थूल शरीर से बलवान इन्द्रियाँ है; इन्द्रियों से बलवान मन है; मन से बलवान बुद्धि है और बुद्धि से बलवान आत्मा है।

27.1.17

प्रेम-किससे करें ?(Love-To whom?)-डॉ॰कछवाल

मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि प्रेम कोई छोटा सा शब्द नहीं है कि उसके बारे में तुरंत ही कोई अर्थ ,उसका कोई मतलब निकल जाये |यह शब्द अपने भीतर एक समग्रता लिए हुए है ,एक प्रकार की गहराई समेटे हुए है |प्रेम शब्द को और प्रेम को हलके में लेना बहुत ही अनुचित होगा |जिस प्रकार से आजकल इस शब्द का प्रयोग किया जा रहा है,लगता है थोड़े समय बाद ही यह शब्द ,यह प्रेम अपनी विश्वसनीयता ही खो देगा |प्रेम में धोखा,प्रेम में हत्या -क्या है यह सब?क्यों प्रेम का इतना उपहास किया जा रहा है ?ऐसा केवल वे ही लोग कर रहे हैं जिन्हें भाषा का केवल छिछला ज्ञान है |आजकल ऐसे कई व्यक्ति आपको मिल जायेंगे जो कहते फिरते हैं कि उसने फलां लड़की से प्रेम किया और उसने धोखा दे दिया |क्या प्रेम अब केवल विपरीत लिंग के व्यक्ति को करने तक ही सीमित रह गया है ?क्या प्रेम करते हुए भी कोई धोखा दे सकता है ?
कितनी बड़ी विडंबना है कि जब भी कोई हमें कहता है कि वह किसी के प्रेम में है तो हम तुरंत उससे उस लड़के या लड़की का नाम जानना चाहते हैं |क्या प्रेम केवल विपरीत लिंग के व्यक्ति से ही होता है ?नहीं|प्रेम अगर होता है तो सम्पूर्णता के साथ होता है ,इस ब्रह्माण्ड में स्थित प्रत्येक व्यक्ति,वस्तु और प्रकृति से | यहाँ उपस्थित कोई भी व्यक्ति ,वस्तु कुरूप नहीं है |सभी अपने भीतर एक तरह की सुंदरता समेटे हुए है | प्रत्येक में सुंदरता को देखने वाला ही प्रेम करने का अधिकारी होता है |सौंदर्य देखने के लिए भी विशेष प्रकार की दृष्टि चाहिए |उसके लिए केवल नेत्रों का होना ही प्रयाप्त नहीं है |
आप इतने वर्षों से महानगर में ,शहर में या गांव में रहते आये हैं |क्या आपको अपने वहाँ की सुंदरता नज़र आयी है ?आप दिनभर यहाँ ,इस संसार के क्रियाकलापों में इतने व्यस्त रहते हैं कि आपको कहीं भी कोई सुंदरता नज़र आती ही नहीं है |

फिर भी आप कहते हैं कि आप किसी से प्रेम करते हैं |अगर आपको प्रकृति की सुंदरता ही नज़र नहीं आती तो कैसा प्रेम और किससे प्रेम ?प्रेम का प्रारम्भ बिना सुंदरता के हो ही नहीं सकता |सौंदर्य आपके चारों और बिखरा हुआ है और आप उसको देख नहीं पा रहे है ,यह आपकी विफलता है ,न कि सौंदर्य की |कभी प्रातः जल्दी उठकर बाहर मैदान में ,खेतों में घूमने निकले|सूर्योदय का नज़ारा देखें-कितना सुन्दर लगता है यह दृश्य|व्यक्ति एक बार तो स्वयं को ही भूल जाता है |समंदर के किनारे चले जाईये|देखिये किस तरह से लहरें एक दूसरे के ऊपर से उछलती हुई किनारे को छूकर लौट जाती है |कभी प्रारम्भिक स्कूल में जाईये और देखिये छोटे छोटे बच्चे बिना किसी भेदभाव के एक दूसरे के साथ मस्ती करते है|आप यह सब देख सकते हैं अगर आप सिर्फ सवयं के बारे में ही नहीं सोच रहे हो तो|अन्यथा आपको केवल आपसे सम्बन्धित दृश्य ही नज़र आएगा |न सूर्योदय का मनोरम दृश्य,न ही समुद्र में उठती लहरें और न ही बच्चों की मासूमियत,कुछ भी नज़र नहीं आएगा |आप इस सौंदर्य से वंचित ही रहेंगे |फिर आपमें कैसा प्रेम,आपके लिए किसका प्रेम ?


दिनभर आप अपने कार्यों में,पैसे कमाने में,संसार की झूठी जिम्मेदारियां उठाने में इतने अधिक व्यस्त रहते हैं कि आपका भीतरी सौंदर्य तक निखर नहीं पाता,बाहर के सौंदर्य को देखने का तो प्रश्न ही नहीं|आपके पास ऐसी दृष्टि भी नहीं है कि स्वयं का सौदर्य भी देख सको |इसका एक ही अर्थ है कि आप अपने से भी प्रेम नहीं कर रहे हैं |फिर और किसी से प्रेम क्या कर पाएंगे?जब आप स्वयं को इतना समय देंगे कि खुद को जान सके,खुद को प्रेम कर सकें उस दिन यह प्रश्न ही समाप्त हो जायेगा कि प्रेम किससे करें ?आप सभी से प्रेम करने लगेंगे|इतना परिवर्तन आते ही चारों और प्रेम ही प्रेम होगा,आपका आंतरिक सौंदर्य ,बाहर नज़र आने लगेगा और आप सबसे प्रेम करने लगेंगे और सब आपसे |जब यह सब होगा,संसार भी सुन्दर लगने लगेगा |यही प्रेम का साध्य है कि संसार में सबसे प्रेम करें |
प्रेमी ढूंढें प्रेमी को,प्रेमी मिला ना कोय |
प्रेमी से प्रेमी मिले, सब विष,अमृत होय ||

ओशो रजनीश की नजर में रावण:


छठवां प्रश्न : ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?
ओशो- निश्चित ही, रावण ब्रह्मज्ञानी था और रावण के साथ बहुत अनाचार हुआ है और दक्षिण में जो आज रावण के प्रति फिर से समादर का भाव पैदा हो रहा है, वह अगर ठीक रास्ता ले ले तो अतीत में हमने जो भूल की है, उसका सुधार हो सकता है। लेकिन वह भी गलत रास्ता लेता मालूम पड़ रहा है दक्षिण का आंदोलन। वे रावण को तो आदर देना शुरू कर रहे हैं, राम को अनादर देना शुरू कर रहे हैं। आदमी की मूढ़ता का अंत नहीं है, वह अतियों पर डोलता है। वह कभी संतुलित तो हो ही नहीं सकता। यहां तुम रावण को जलाते रहे हो, वहां अब उन्होंने राम को जलाना शुरू किया है। तुमने एक भूल की थी, अब वे दूसरी भूल कर रहे हैं।
 

रावण ब्रह्मज्ञानी था। यह भी परमात्मा की मर्जी थी कि वह यह पार्ट अदा करे। उसने यह भली तरह अदा किया। और कहते हैं, जब राम के बाण से वह मरा तो उसने कहा कि मेरी जन्मों-जन्मों की आकांक्षा पूरी हुई कि राम केहाथों मारा जाऊं, इससे बड़ी और कोई आकांक्षा हो भी नहीं सकती, क्योंकि जो राम के हाथ मारा गया, वह सीधा मोक्ष चला जाता है।
    गुरु के हाथ जो मारा गया, वह और कहां जाएगा? और जैसे पांडवों को कहा है कृष्ण ने कि मरते हुए भीष्म से जाकर धर्म की शिक्षा ले लो, वैसे ही राम ने लक्ष्मण को भेजा है रावण के पास कि वह मर न जाए, वह परम ज्ञानी है,उससे कुछ ज्ञान के सूत्र ले आ। उस बहती गंगा से थोड़ा तू भी पानी पी ले। लेकिन कठिनाई क्या है? कठिनाई हमारी यह है कि हमारी समझ चुनाव की है। अगर हम राम को चुनते हैं, तो रावण दुश्मन हो गया। अगर हम रावण को चुनते हैं, तो राम दुश्मन हो गए। और दोनों को तो हम चुन नहीं सकते, क्योंकि हमको लगता है, दोनों तो बड़े विरोधी हैं, इनको हम कैसे चुनें! 
और जो दोनों को चुन ले, वही रामलीला का सार समझा, क्योंकि रामलीला अकेली राम की लीला नहीं है, रावण के बिना हो भी नहीं सकती। थोड़ा रावण को हटा लो रामलीला से, फिर रामलीला बिलकुल ठप हो जाएगी, वहीं गिर जाएगी। सब सहारे उखड़ जाएंगे। राम खड़े न हो सकेंगे बिना रावण के। राम को रावण का सहारा है। प्रकाश हो नहीं सकता बिना अंधेरे के। अंधेरा प्रकाश को बड़ा सहारा है। जीवन हो नहीं सकता बिना मृत्यु के। मृत्यु के हाथों पर ही जीवन टिका है। जीवन विपरीत में से चल रहा है।
     राम और रावण, मृत्यु और जीवन, दोनों विरोध वस्तुत: विरोधी नहीं हैं, सहयोगी हैं। और जिसने ऐसा देखा, उसी ने समझा कि रामलीला का अर्थ क्या है। तब विरोध नाटक रह जाता है। तब भीतर कोई वैमनस्य नहीं है। न तो राम के मन में कोई वैमनस्य है, न रावण के मन में कोई वैमनस्य है। और इसीलिए तो हमने इस कथा को धार्मिक कहा है। अगर वैमनस्य हो तो कथा नहीं रही, इतिहास हो गया।
इस फर्क को भी ठीक से समझ लो। पुराण और इतिहास का यही फर्क है। इतिहास साधारण आदमियों की जीवन घटनाएं हैं। वहां संघर्ष है, विरोध है, वैमनस्य है, दुश्मनी है। पुराण! पुराण नाटक है, लीला है। वहां वास्तविक नहीं है वैमनस्य; दिखावा है, खेल है। जो मिला है अभिनय, उसे पूरा करना है।
     कथा यह है कि वाल्मीकि ने राम के होने के पहले ही रामायण लिखी। अब जब लिख ही दी थी, तो फिर राम को पूरा करना पड़ा। कर भी क्या सकते थे। जब वाल्मीकि जैसा आदमी लिख दे, तो तुम करोगे क्या! फिर उसको पूरा करना ही पड़ा। यह बड़ी मीठी बात है। दृष्टा कह देते हैं, फिर उसे पूरा करना पड़ता है। इसका अर्थ कुल इतना ही है, जैसे कि नाटक की कथा तो पहले ही लिखी होती है, फिर कथा को पूरा करते हैं नाटक में।  

नाटक में कथा पैदा नहीं होती। कथा पहले पैदा होती है, फिर कथा के अनुसार नाटक चलता है।क्या किसको कहना है, सब तय होता है। जीवन का सारा खेल तय है। क्या होना है, तय है। तुम नाहक ही अपना बोझ उठाए चल रहे हो। अगर तुम समझ लो कि सिर्फ नाटक है जीवन, तो तुम्हारा जीवन रामलीला हो गया, तुम पुराण-पुरुष हो गए, फिर तुम्हारा इतिहास से कोई नाता न रहा। फिर तुम इस भ्रांति में नहीं हो कि तुम कर रहे हो। फिर तुम जानते हो कि जो उसने कहा है, हो रहा है। हम उसकी मर्जी पूरी कर रहे हैं। अगर वह रावण बनने को कहे, तो ठीक। रावण को तुम मार तो नहीं डालते! जो आदमी रावण का पार्ट करता है          रामलीला में, उसको तुम मार तो नहीं डालते कि इसने रावण का पार्ट किया है, इसको मार डालो। जैसे ही मंच के बाहर आया, बात खत्म हो गई। अगर उसने पार्ट अच्छा किया, तो उसे भी तगमे देते हो।
   असली सवाल पार्ट अच्छा करने का है। राम का हो कि रावण का, यह बात अर्थपूर्ण नहीं है। ढंग से पूरा किया जाए, कुशलता से पूरा किया जाए। अभिनय पूरा-पूरा हो, तो तुम पुराण-पुरुष हो गए।लड़ो बिना वैमनस्य के, संघर्ष करो बिना किसी अपने मन के; जहां जीवन ले जाए बहो। तब तुम्हारे जीवन में लीला आ गई। लीला आते ही निर्भार हो जाता है मन। लीला आते ही चित्त की सब उलझनें कट जाती हैं। जब खेल ही है तो चिंता क्या रही! फिर एक सपना हो जाता है।
    इसी अर्थ में हमने संसार को माया कहा है। माया का अर्थ इतना ही है कि तुम माया की तरह इसे लेना। अगर तुम इसे माया की तरह ले सको, तो भीतर तुम ब्रह्म को खोज लोगे। अगर तुमने इसे सत्य की तरह लिया, तो तुम भीतर के ब्रह्म को गंवा दोगे।
-ओशो (गीता दर्शन : भाग-8, प्रवचन- 211/06)

24.1.17

कामना ही मनुष्य के दुखों का कारण - स्वामी नित्यानंद गिरि




मनुष्य के दुख का, संताप का, परेशानियों व दुर्गति का कारण है कामना, इच्छा, वासना, इच्छा पूरी होती है तो सुख होता है और इच्छा की अपूर्ति में दुख होता है इच्छा में बाधा लगने से ही क्रोध की उत्पत्ति होती है |

अगर कोई क्रोधी है, तो इसका कारण है उसके भीतर इच्छाएं दबी पड़ी हैं। सत्संग से, सेवा से परोपकार से इच्छाओं का संबंध होता है कर्मयोगी दूसरों की इच्छाएं (शस्त्रयुक्त) पूरी करके सेवा करके सुख पहुंचा के अपनी इच्छाओं से रहित हो जाता है जो दूसरों की शास्त्रोंचित इच्छाएं पूरी करता है। उसे अपनी इच्छाओं से दुखी नहीं होना पड़ता।
ज्ञान योगी इच्छओं का कारण अज्ञान को मिटाकर इच्छा रहित होना है। मुझे चाह रहित बना देंगे इच्छा के दो कारण हैं। एक तो पूर्व जन्म के संस्कार जो अर्न्तमन में पड़े रहते हैं। समय-समय पर वो प्रकट होते रहते हैं और उनमें इच्छाएं, वासनाएं उत्पन्न होती रहती हैं। पूर्वजन्म के भोगों के संस्कार हैं वो और दूसरा कारण है।

वर्तमान में किसी वस्तु व्यक्ति को हम देखकर बहुत महत्व देते हैं तो उसकी इच्छा पैदा हो जाती है। इसका मूल कारण है देहाभिमान। इच्छा किसी कारण से उत्पन्न हुई हो साधक को विवेक पूर्वक उसका परिणाम देखना चाहिए।

18.1.17

क्या पूरब पश्चिम एक होँगे?ओशो विज़न


मैं हमेशा ऐसा अनुभव क्यों करता हूं, जैसे कि मेरा एक हिस्सा दूसरे हिस्से के विरुद्ध लड़ रहा है?
मनुष्य का इतिहास एक अत्यंत दुखद घटना रहा है, और इसके दुखद होने का कारण समझना बहुत कठिन नहीं है। उसे खोजने के लिए तुम्हें ज्यादा दूर जाना न पड़ेगा, वह प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है।
मनुष्य के पूरे अतीत ने मनुष्य में एक विभाजन पैदा कर दिया है, हर आदमी के भीतर निरंतर एक शीत युद्ध चल रहा है। यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है, तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है। तुम्हारी बीमारी सामाजिक है। और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है, वह है: तुम्हें दुश्मनों के दो खेमों में बांटना-भौतिकवादी और अध्यात्मवादी, जोरबा और बुद्ध।
वस्तुतः तुम बंटे हुए नहीं हो। वास्तविकता यह है कि तुम अखंड हो - एक स्वर में, एक लय में आबद्ध। लेकिन तुम्हारे मन में यह संस्कार गहरा बैठा है कि तुम एक नहीं हो, अखंड नहीं हो, पूर्ण नहीं हो। तुम्हें अपने शरीर के खिलाफ लड़ना होगा। यदि आध्यात्मिक होना चाहते हो तो तुम्हें अपने शरीर को हर संभव तरीके से जीतना पड़ेगा, उसे हराना पड़ेगा, उसे सताना और नष्ट करना पड़ेगा।
पूरी दुनिया में यह धारणा स्वीकृत रही है। विभिन्न धर्मों में, विभिन्न संस्कृतियों में उसके रंग-रूप भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किंतु आधारभूत सिद्धांत वही है-मनुष्य को विभाजित करो, उसमें संघर्ष पैदा करो, जिससे एक हिस्सा श्रेष्ठ अनुभव करने लगे, पवित्र बन जाए, पुण्यात्मा बन जाए, और दूसरे हिस्से की पापी की तरह निंदा करना शुरू कर दे।
मगर कठिनाई यह है कि तुम एक हो, तुम्हें खंडित करने का कोई उपाय नहीं है। हर विभाजन तुम में दुख पैदा करने वाला है। विभाजन का अर्थ होगा कि तुम्हारी आत्मा का आधा भाग, दूसरे आधे भाग से लड़ रहा है। और यदि तुम स्वयं के भीतर लड़ रहे हो, तो कैसे विश्राम को उपलब्ध होओगे?
पूरी की पूरी मनुष्यता अब तक स्किजोफ्रेनिक ढंग से, खंडित-मानसिकता में जीती रही है। प्रत्येक व्यक्ति टुकड़ों में, खंडों में तोड़ दिया गया है। तुम्हारे धर्म, तुम्हारे दर्शनशास्त्र, तुम्हारे सिद्धांत, घाव भरने वाले नहीं, वरन घाव करने के साधन रहे हैं-वे अंतर्युद्ध और संघर्ष के कारण रहे हैं। तुम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हो।

तुम्हारा दायां हाथ, बाएं हाथ को चोट पहुंचाता है, बायां हाथ, दाएं हाथ को घायल करता है, और अंतत: तुम्हारे दोनों हाथ लहूलुहान हो जाते हैं।
पश्चिम ने चार्वाक को चुना, जोरबा को चुना। विक्षिप्तता से बचने का दूसरा रास्ता न था-एक हिस्से को पूर्णतः नष्ट करना पड़ा । पश्चिम ने मनुष्य के आंतरिक सत्य को, उसकी चेतना को अस्वीकार कर दिया-आदमी केवल शरीर है, कहीं कोई आत्मा नहीं है-खाओ, पीओ, और मौज करो, बस यही एकमात्र धर्म है। यह मन की शांति पाने का एक उपाय था, संघर्ष से बाहर आने का, एक निर्णय और निष्कर्ष पर पहुंचने का-क्योंकि यह स्वीकृत हो गया कि तुम एक हो-केवल पदार्थ, केवल शरीर।
ऊपर-ऊपर से देखो तो ऐसा लगता है कि पूरब और पश्चिम अलग-अलग चीजें कर रहे हैं, किंतु गहराई से समझो तो वे एक ही चीज कर रहे हैं। सचाई यह है कि वे एक होने का बौद्धिक रूप से प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि "दो' होने का मतलब है निरंतर बेचैनी में, सतत संघर्ष में होना; इससे बेहतर है कि "दूसरे' का ख्याल ही भूल जाओ।
इसी संदर्भ में तुम्हें यह स्मरण दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि आधुनिक विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि पदार्थ का होना एक भ्रम है। पदार्थ का अस्तित्व नहीं है, वह केवल दिखाई देता है। वे इस निष्पत्ति पर एक बिलकुल भिन्न मार्ग से पहुंचे हैं-पदार्थ का सूक्ष्म अन्वेषण करते हुए उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे पदार्थ में गहरे जाते हैं, वैसे-वैसे उसकी भौतिकता; उसका पदार्थ-पन कम से कम होता जाता है, और परमाणु के बाद एक ऐसा बिंदु आता है जहां कोई पदार्थ नहीं बचता, सिर्फ इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं, जो विद्युत कण हैं, वे पदार्थ नहीं, सिर्फ ऊर्जा तरंगें हैं।
पश्चिमी प्रतिभा को केवल पदार्थ के साथ काम करने की छूट थी। पूरब में प्रतिभा के लिए पहली चुनौती थी-अंतर्यात्रा। सिर्फ द्वितीय श्रेणी के लोगों ने, मध्यम कोटि के लोगों ने बाहरी सांसारिक चीजों के लिए श्रम किया। जो वास्तव में बुद्धिमान थे, उन्होंने सदा ध्यान की दिशा में गति की।
धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई। पश्चिम भौतिकवादी हो गया-इसकी पूरी जिम्मेवारी ईसाई चर्च की है, और पूर्वीय मनुष्यता अधिक से अधिक अध्यात्मवादी हो गई। प्रत्येक व्यक्ति में जो विभाजन, जो विखंडन किया गया था; वही विस्तृत पैमाने पर पूरब और पश्चिम का विभाजन बन गया।
एक महान कवि ने लिखा है: "पूरब" पूरब है; और "पश्चिम" पश्चिम है; और दोनों कभी नहीं मिलेंगे। और इस कवि रुडयार्ड किपलिंग की पूरब में अत्यधिक रुचि थी। वह कई वर्षों तक भारत में रहा-वह सरकारी नौकरी में था। पर इस भेद को देख कर-कि संपूर्ण पूर्वीय चेतना भीतर गति करती है, और पश्चिमी चेतना बहिर्मुखी है...वे कैसे मिल सकते हैं?
मेरा पूरा काम रुडयार्ड किपलिंग को गलत सिद्ध करना है। मैं कहना चाहूंगा कि न पश्चिम पश्चिम है; न पूरब पूरब है-वे दोनों पहले से ही मिले हुए हैं। न कोई पूरब है, न कोई पश्चिम है। उनके दृष्टिकोण बहुत भिन्न रहे लेकिन वे समझे जा सकते हैं।

मेरी दृष्टि यह है, मेरा सारा प्रयास यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक सेतु निर्मित हो, ताकि तुम एक हो जाओ, पूर्ण हो जाओ। देह से दुश्मनी न करो, वह तुम्हारा घर है। अपनी आत्मा से शत्रुता न साधो, क्योंकि बिना चेतना के हो सकता है तुम्हारा घर खूब सजा-धजा हो, पर वह खाली मकान होगा - बिना मालिक के - सूना। शरीर और आत्मा जब साथ-साथ हों, तो एक सौंदर्य पैदा होता है-एक पूर्ण जीवन! एक भरा-पूरा जीवन!! 
प्रतीक रूप में मैंने शरीर के लिए जोरबा को और आत्मा के लिए बुद्ध को चुना है। चाहे मैं जोरबा के विषय में कहूं, या बुद्ध के बारे में बोलूं, मेरे प्रत्येक वक्तव्य में वे दोनों ही स्वतः समाहित हो जाते हैं, क्योंकि मेरे लिए वे अभिन्न हैं। यह सिर्फ बल देने की बात है कि किस पर ज्यादा जोर देना है।
जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा-क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे। पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उनतीस वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए, जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा।
गौतम बुद्ध के पिता ने पूरे राज्य की सारी सुंदर लड़कियों को एकत्रित करके बुद्ध के भोग-विलास की व्यवस्था की थी। उन्होंने भिन्न-भिन्न ऋतुओं के लिए, अलग-अलग जगहों पर तीन शानदार महल बनवाए। उनके पास सुंदर बाग-बगीचे और झीलें थीं। बुद्ध का पूरा जीवन सुख-सुविधा संपन्न था, शुद्ध भोग-विलास था! पर उससे वे उकता गए, और यह प्रश्न उनके मन में महत्वपूर्ण होने लगा कि क्या यही सब कुछ है? फिर मैं कल के लिए क्यों जीए जा रहा हूं। जीवन का कुछ अर्थ, कुछ और अभिप्राय होना चाहिए, अन्यथा जीवन सारहीन है।
बुद्धत्व की खोज प्रारंभ होती है-जोरबा को भरपूर जी लेने से। हर आदमी बुद्ध नहीं हो पाता, उसका मूल कारण है कि जोरबा अनजीया रह जाता है। मेरा तर्क देखते हो न! मैं कहता हूं कि जोरबा को जी भर के, पूर्णता से जी लो, तो तुम स्वाभाविक ढंग से

बुद्ध के जीवन में प्रवेश कर जाओगे। अपने शरीर का सुख लो, अपने पार्थिव अस्तित्व को भोगो, इसमें कोई पाप नहीं है। इसके पर्दे में, इसके पीछे छिपा है तुम्हारा आध्यात्मिक विकास, तुम्हारा आत्मिक आनंद! जब तुम भौतिक सुखों से थक जाओगे, केवल तब तुम पूछोगे, "क्या इसके अतिरिक्त कुछ और भी है?" स्मरण रहे, यह प्रश्न मात्र बुद्धिगत नहीं हो सकता, इसे अस्तित्वगत होना पड़ेगा। "क्या कुछ और भी है?" जब यह प्रश्न अस्तित्वगत होगा, तभी तुम अपने भीतर वह "कुछ और" उपलब्ध कर पाओगे।
वस्तुतः वह सुख ही है जो तुम्हें इस आनंद तक ले आया है। जोरबा और बुद्ध के बीच में कोई संघर्ष नहीं है, कोई झगड़ा नहीं है। जोरबा तीर का निशान है, एक संकेत है - यदि तुम उस दिशा में ठीक से अनुसरण करो, तो बुद्ध तक पहुंच जाओगे।निश्चित ही बहुत कुछ और भी है। जोरबा तो केवल शुरुआत है। एक बार बुद्धत्व की ज्योति जल जाए, जागरण की आभा तुम्हारी आत्मा पर फैल जाए, तब तुम जानोगे कि सांसारिक सुख छाया भी न था... वहां इतना अधिक आनंद है, परमानंद! लेकिन वह आनंद सुख के: विपरीत नहीं है
ओशो,
बियांड एनलाइटनमेंट, #7

9.1.17

सूर्य काम-वासना का केंद्र होता है : ओशो


बाहर के सूर्य की भांति मनुष्य के भीतर भी सूर्य छिपा हुआ है, बाहर के चांद की ही भांति मनुष्य के भीतर भी चांद छिपा हुआ है। और पंतजलि का रस इसी में है कि वे अंतर्जगत के आंतरिक व्यक्तित्व का संपूर्ण भूगोल.हमें दे देना चाहते हैं। इसलिए जब वे कहते हैं कि - 'भुवन ज्ञानम्‌ सूर्ये संयमात।' - सूर्य पर संयम संपन्न करने से सौर ज्ञान की उपलब्धि होती है।' तो उनका संकेत उस सूर्य की ओर नहीं है जो बाहर है। उनका मतलब उस सूर्य से है जो हमारे भीतर है। 
हमारे भीतर सूर्य कहां है? हमारे अंतस के सौर-तंत्र का केंद्र कहा है? वह केंद्र ठीक प्रजनन-तंत्र की गहनता में छिपा हुआ है। इसीलिए कामवासना में एक प्रकार की ऊष्णता, एक प्रकार की गर्मी होती है।
कामवासना का केंद्र सूर्य होता है। इसीलिए तो कामवासना व्यक्ति को इतना ऊष्ण और उत्तेजित कर देती है। जब कोई व्यक्ति कामवासना में उतरता है तो वह उत्तप्त से उत्तप्त होता चला जाता है। व्यक्ति कामवासना के प्रवाह में एक तरह से ज्वर-ग्रस्त हो जाता है, पसीने से एकदम तर-बतर हो जाता है, उसकी श्वास भी अलग ढंग से चलने लगती है। और उसके बाद व्यक्ति थककर सो जाता है। जब व्यक्ति कामवासना से थक जाता है तो तुरंत भीतर चंद्र ऊर्जा सक्रिय हो जाती है।  

जब सूर्य छिप जाता है तब चंद्र का उदय होता है। इसीलिए तो काम-क्रीड़ा के तुरंत बाद व्यक्ति को नींद आने लगती है। सूर्य ऊर्जा का काम समाप्त हो चुका, अब चंद्र ऊर्जा का कार्य प्रारंभ होता है।
भीतर की सूर्य ऊर्जा काम-केंद्र है। उस सूर्य ऊर्जा पर संयम केंद्रित करने से, व्यक्ति भीतर के संपूर्ण सौर-तंत्र को जान ले सकता है। काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाताहै। काम-केंद्र के सभी रहस्यों को जान सकता है। लेकिन बाहर के सूर्य के साथ उसका कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति भीतर के सूर्य को जान लेता है तो उसके प्रतिबिंब से वह बाहर के सूर्य को भी जान सकता है। सूर्य इस अस्तित्व के सौर-मंडल का काम-केंद्र है। इसी कारण जिसमें भी जीवन है, प्राण है, उसको सूर्य की रोशनी, सूर्य की गर्मी को आवश्यकता है। जैसे कि वृक्ष अधिक से अधिक ऊपर जाना चाहते हैं। किसी अन्य देश की अपेक्षा अफ्रीका में वृक्ष सबसे अधिक ऊँचे हैं। कारण अफ्रीका के जंगल इतने घने हैं और इस कारण वृक्षों में वापस में इतनी अधिक प्रतियोगिता है कि अगर वृक्ष ऊपर नहीं उठेगा तो सूर्य की किरणोंतक पहुंच ही नहीं पाएगा, उसे सूर्य की रोशनी मिलेगी ही नहीं। और अगर सूर्य की रोशनी वृक्ष को नहीं मिलेगी तो वह मर जाएगा। इस तरह से सूर्य वृक्ष को उपलब्ध न होगा और वृक्ष सूर्य को उपलब्ध न होगा, वृक्ष को. उपलब्ध न होगा और वृक्ष सूर्य को उपलब्ध न होगा, वृक्ष को सूर्य की जीवन ऊर्जा मिल ही न पाएगी।
जैसे सूर्य जीवन है, वैसे ही कामवासना भी जीवन है। इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही है, और ठीक इसी तरह से कामवासना से ही जीवन जन्म लेता है- सभी प्रकार के जीवन का जन्म काम से ही होता है।
 

अफ्रीका में वृक्ष अधिक से अधिक ऊंचे जाना चाहते हैं, ताकि वे सूर्य को उपलब्ध हो सकें और सूर्य उन्हें उपलब्ध हो सके। इन वृक्षों को ही देखो। जिस तरह से वृक्ष इस ओर हैं- यह पाइन के वृक्ष, ठीक वैसे हीवृक्ष दूसरी ओर भी हैं- और उस तरफ के वृक्ष छोटे ही रह गए हैं। इस तरह के वृक्ष ऊपर छोटे ही रह गए हैं। इस तरह के वृक्ष ऊपर ऊपर बढ़ते ही चले जा रहे हैं। क्योंकि इस ओर सूर्य की किरणें अधिक पहुँच रही हैं, दूसरी ओर सूर्य की किरणें अधिक नहीं पहुँच पा रही हैं।
काम भीतर का सूर्य है, और सूर्य सौर-मंडल का काम-केंद्र है। भीतर के सूर्य के प्रतिबिंब के माध्यम से व्यक्ति बाहर के सौर-तंत्र का ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है, लेकिन बुनियादी बात तो आंतरिक सौर-तंत्र को.समझने की है।
'सूर्य पर संयम संपन्न करने से, संपूर्ण सौर-ज्ञान की उपलब्धि होती है।'
इस पृथ्वी के लोगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, सूर्य-व्यक्ति और चंद्र-व्यक्ति, या हम उन्हें यांग और यिन भी कह सकते हैं। सूर्य पुरुष का गुण है; स्त्री चंद्र का गुण है। सूर्य आक्रामक होता है, सूर्य सकारात्मक है; चंद्र ग्रहणशील होता है, निष्क्रिय होता है।
सारे जगत के लोगों को सूर्य और चंद्र इन दो रूपों में विभक्त किया जा सकता है। और हम अपने शरीर को भी सूर्य और चंद्र में विभक्त कर सकते हैं; योग ने इसे इसी भांति विभक्त किया है।
योग में तो संपूर्ण शरीर को ही विभक्त कर दिया गया है : मन का एक हिस्सा पुरुष है, मन का दूसरा हिस्सा स्त्री है। और व्यक्ति को सूर्य से चंद्र की ओर बढ़ना है, और अंत में दोनों के भी पार जाना है, दोनों का.अतिक्रमण करना है।
पतंजलि : योग-सूत्र भाग चार
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

श्री श्री रवि शंकर के अनमोल विचार

Quote 1: Love is not an emotion. It is your very existence.
In Hindi: प्रेम कोई भावना नहीं है. यह आपका अस्तित्व है.
Quote 2: I tell you, deep inside you is a fountain of bliss, a fountain of joy. Deep inside your center core is truth, light, love, there is no guilt there, there is no fear there. Psychologists have never looked deep enough.
In Hindi: मैं आपसे बताता हूँ, आपके भीतर एक परमानंद का फव्वारा है, प्रसन्नता का झरना है. आपके मूल के भीतर सत्य,प्रकाश, प्रेम है, वहां कोई अपराध बोध नहीं है, वहां कोई डर नहीं है. मनोवैज्ञानिकों ने कभी इतनी गहराई में नहीं देखा.
Quote 3: Faith is realizing that you always get what you need.
In Hindi: श्रद्धा यह समझने में है कि आप हमेशा वो पा जाते हैं जिसकी आपकी ज़रुरत होती है.
Quote 4: Today is a gift from God – that is why it is called the present.
In Hindi: “आज” भगवान का दिया हुआ एक उपहार है- इसीलिए इसे “प्रेजेंट” कहते हैं.
Quote 5: Human evolution has two steps -from being somebody to being nobody;and from being nobody to being everybody.This knowledge can bringsharing and caring throughout the world.
Quote 6: When you share your misery, it will not diminish. When you fail to share your joy, it diminishes. Share your problems only with the Divine, not with anyone else, as that will only increase the problems. Share your joy with everyone.
In Hindi: जब आप अपना दुःख बांटते हैं , वो कम नहीं होता. जब आप अपनी ख़ुशी बांटने से रह जाते हैं, वो कम हो जाती है.अपनी समस्याओं को सिर्फ ईश्वर से सांझा करें , और किसी से नहीं, क्योंकि ऐसा करना सिर्फ आपकी समस्या को बढ़ाएगा.अपनी ख़ुशी सबके साथ बांटें.
Quote 7: Listen to others; yet do not listen. If your mind gets stuck in their problems, not only are they miserable, but you also become miserable.”
 

In Hindi: दूसरों को सुनो ; फिर भी मत सुनो . अगर तुम्हारा दिमाग उनकी समस्याओं में उलझ जाएगा, ना सिर्फ वो दुखी होंगे , बल्कि तुम भी दुखी हो जओगे.
Quote 8: Life is nothing to be very serious about. Life is a ball in your hands to play with. Don’t hold on to the ball.
In Hindi: जीवन ऐसा कुछ नहीं है जिसके प्रति बहुत गंभीर रहा जाए . जीवन तुम्हारे हाथों में खेलने के लिए एक गेंद है . गेंद को पकड़े मत रहो.
Quote 9: In always wanting to be comfortable, you become lazy.In always wanting perfection, you become angry.In always wanting to be rich, you become greedy.
In Hindi: हमेशा आराम की चाहत में , तुम आलसी हो जाते हो. हमेशा पूर्णता की चाहत में तुम क्रोधित हो जाते हो.हमेशा अमीर बनने की चाहत में तुम लालची हो जाते हो.
Quote 10: Wise is the one who learns from another´s mistakes. Less wise is the one who learns only from his own mistakes. The fool keeps making the same mistakes again and again and never learns from them.
In Hindi: बुद्धिमान वो है जो औरों की गलती से सीखता है. थोडा कम बुद्धिमान वो है जो सिर्फ अपनी गलती से सीखता है.मूर्ख एक ही गलती बार बार दोहराते रहते हैं और उनसे कभी सीख नहीं लेते.
Quote 11: Knowledge is a burden if it robs you of innocence.Knowledge is a burden if it is not integrated into life.Knowledge is a burden if it doesn’t bring joy.Knowledge is a burden if it gives you an idea that you are wise.Knowledge is a burden if it doesn’t set you free.Knowledge is a burden if it makes you feel you are special.
In Hindi: ज्ञान बोझ है यदि वह आपके भोलेपन को छीनता है .ज्ञान बोझ है यदि वह आपके जीवन में एकीकृत नहीं है .ज्ञान बोझ है यदि वह प्रसन्नता नही लाता .ज्ञान बोझ है यदि वह आपको यह विचार देता है कि आप बुद्धिमान हैं . ज्ञान बोझ है यदि वह आपको स्वतंत्र नहीं करता .ज्ञान बोझ है यदि वह आपको यह प्रतीत कराता है कि आप विशेष हैं .
Quote 12: To love someone whom you like is insignificant.To love someone because they love you is of no consequence.To love someone whom you do not like means you have learned a lesson in life.To love someone who blames you for no reason shows that you have learned the art of living.
In Hindi: किसी ऐसे से प्रेम करना जिसे तुम चाहते हो नगण्य है किसी से इसलिए प्रेम करना क्योंकि वो तुमसे प्रेम करता है महत्त्वहीन है .किसी ऐसे से प्रेम करना जिसे तुम नहीं चाहते , मतलब तुमने जीवन का एक सबक सीख लिया है .किसी ऐसे से प्रेम करना जो बिना वजह तुम पर दोष मढ़े; दर्शाता है कि तुमने जीने की कला सीख ली है .
Quote 13: A poor man celebrates the New Year once a year. A rich man celebrates each day. But the richest man celebrates every moment.
In Hindi: एक निर्धन व्यक्ति नया साल वर्ष में एक बार मनाता है . एक धनाड्य व्यक्ति हर दिन . लेकिन जो सबसे समृद्ध होता है वह हर क्षण मनाता है .
Quote 14: Look into the motives behind your actions. Often you don’t go for things you really want.
In Hindi: अपने कार्य के पीछे की मंशा को देखो . अक्सर तुम उस चीज के लिए नहीं जाते जो तुम्हे सच में चाहिए .
Quote 15: If you do good for people, you are doing it out of your nature.
 

In Hindi: यदि तुम लोगों का भला करते हो , तुम अपनी प्रकृति की वजह से करते हो .
Quote 16: How far to heaven? Just open your eyes and look. You are in heaven.
In Hindi: स्वर्ग से कितना दूर ? बस अपनी आँखें खोलो और देखो . तुम स्वर्ग में हो
Quote 17: You are Divine. You are part of me. I am part of you.
In Hindi: तुम दिव्य हो .तुम मेरा हिस्सा हो . मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ
Quote 18: You have been given the highest blessing, the most precious knowledge on this planet. You are the Divine Self; you are part of the Self. Walk with that confidence. It is not arrogance. It is, again, Love.
In Hindi: तुम्हे सर्वोच्च आशीर्वाद दिया गया है , इस गृह का सबसे अनमोल ज्ञान दिया गया है . तुम दिव्य हो ; तुम परमात्मा का हिस्सा हो . विश्वास के साथ बढ़ो . यह अहंकार नहीं है . यह पुनः : प्रेम है .
Quote 19: Your mind is trying to find an escape and does not want to rise to that level to which the master is trying to raise you, trying to pull you up.
In Hindi: तुम्हारा मस्तिष्क भागने की सोच रहा है और उस अस्तर पर जाने का प्रयास नहीं कर रहा है जहाँ गुरु ले जाना चाहते हैं , तुम्हे उठाना चाहते हैं .
Quote 20: Want, or desire, arises when you are not happy. Have you seen this? When you are very happy then there is contentment. Contentment means no want.
In Hindi: चाहत , या इच्छा तब पैदा होती है जब आप खुश नहीं होते . क्या आपने देखा है ? जब आप बहुत खुश होते हैं तब संतोष होता है . संतोष का अर्थ है कोई इच्छा ना होना .
Quote 21: Want is always hanging on to the I. When the I itself is dissolving, want also dissolves, disappears.
In Hindi: इच्छा हमेशा मैं पर लटकती रहती है . जब स्वयं मैं लुप्त हो रहा हो , इच्छा भी समाप्त हो जाती है , ओझल हो जाती है .

Quote 22: मन को जितना हठ योग है, मन से हार मानकर सरणागत होना प्रेम है, प्रेम मैं सदा हार ही होती है, देखो हम जिसे प्रेम करते हैं उसके सामने झुकते हैं| वह चाहे कुछ भी कहे, चाहे कुछ भी करे|
Quote 23: ध्यान करने से मन साफ़ होता है, जैसे पानी गंदा है पानी में हलचल है, तो हम अपना प्रतिबिम्ब नही देख पाते है, उसी तरह मन में हलचल है, तो हम अपना स्वरुप नही देख पाते, इसलिए ध्यान करना ज़रूरी ही|
Quote 24: “मेरे जीवन का क्या उद्देश्य है?” यह एक प्रश्न हमारे system में, हमारी आत्मा में मानवीय मौल्यों को प्रकाशित करता है| परन्तु इस प्रश्न के उत्तर को पाने में जल्दी मत करो| प्रश्न के साथ रहो| प्रश्न अपने में एक औजार है |जिसके सहारे तुम अपने अन्दर की गहरी में उतर सकते हो|

Quote 25: प्रभु ने आपको अपार प्रेम दिया है, घुट-घुटकर क्यों जीते हो, प्रेम से जियो
Quote 26: प्रेम माँगने से कम होता है, देने से बढ़ता है| क्यों की हर व्यक्ति प्रेम चाहता है. प्रेम चाहने से नही, देने से होता है|
Quote 27: हम जिससे प्रेम करते हैं, उसकी हर बात बहुत ध्यान से सुनते है| उसका हर काम, हर बात बहुत ही अच्‍छी लगती है, सुंदर लगती है| सबसे प्रेम करो, सब सुंदर लगेंगे|

तुम कामना करते हो पर हारना नहीं चाहते: ओशो


वह व्यक्ति जो स्वस्थ, निर्भार, निर्बोझ, ताजा, युवा, कुंआरा अनुभव करता है, वही समझ पाएगा कि संतोष क्या है। अन्यथा तो तुम कभी न समझ पाओगे कि संतोष क्या होता है-यह केवल एक शब्द बना रहेगा।
संतोष का अर्थ हैः जो कुछ है सुंदर है; यह अनुभूति कि जो कुछ भी है श्रेष्ठतम है, इससे बेहतर संभव नहीं। एक गहन स्वीकार की अनुभूति है संतोष; संपूर्ण अस्तित्व जैसा है उस के प्रति ‘हां’ कहने की अनुभूति है संतोष।
साधारणतया मन कहता है, ‘कुछ भी ठीक नहीं है।’ साधारणतया मन खोजता ही रहता है शिकायतें- ‘यह गलत है, वह गलत है।’ साधारणतया मन इनकार करता है: वह ‘न’ कहने वाला होता है, वह ‘नहीं’ सरलता से कह देता है। मन के लिए ‘हां’ कहना बड़ा कठिन है, क्योंकि जब तुम ‘हां’ कहते हो, तो मन ठहर जाता है; तब मन की कोई जरुरत नहीं होती।
क्या तुमने ध्यान दिया है इस बात पर? जब तुम ‘नहीं’ कहते हो, तो मन आगे और आगे सोच सकता है; क्योंकि ‘नहीं’ पर अंत नहीं होता। नहीं के आगे कोई पूर्ण-विराम नहीं है; वह तो एक शुरुआत है। 'नहीं' एक शुरुआत है; 'हां' अंत है।

जब तुम 'हां' कहते हो, तो एक पूर्ण विराम आ जाता है; अब मन के पास सोचने के लिए कुछ नहीं रहता, बड़बड़ाने-कुनमुनाने के लिए, खीझने के लिए, शिकायत करने के लिए कुछ नहीं रहता- कुछ भी नहीं रहता। जब तुम 'हां' कहते हो, तो मन ठहर जाता है; और मन का वह ठहरना ही संतोष है।
संतोष कोई सांत्वना नहीं है- यह स्मरण रहे। मैंने बहुत से लोग देखे हैं जो सोचते हैं कि वे संतुष्ट हैं, क्योंकि वे तसल्ली दे रहे हैं स्वयं को। नहीं, संतोष सांत्वना नहीं है, सांत्वना एक खोटा सिक्का है। जब तुम सांत्वना देते हो स्वयं को, तो तुम संतुष्ट नहीं होते।

वस्तुतः भीतर बहुत गहरा असंतोष होता है।  
लेकिन यह समझ कर कि असंतोष चिंता निर्मित करता है, यह समझ कर कि असंतोष परेशानी खड़ी करता है, यह समझ कर कि असंतोष से कुछ हल तो होता नहीं-बौद्धिक रूप से तुमने समझा-बुझा लिया होता है अपने को कि ‘यह कोई ढंग नहीं है।’
तो तुमने एक झूठा संतोष ओढ़ लिया होता है स्वयं पर; तुम कहते रहते हो, ‘मैं संतुष्ट हूं। मैं सिंहासनो के पीछे नहीं भागता; मैं धन के लिए नहीं लालायित होता; मैं किसी बात की आकांक्षा नहीं करता।’ लेकिन तुम आकांक्षा करते हो। अन्यथा यह आकांक्षा न करने की बात कहां से आती?

तुम कामना करते हो, तुम आकांक्षा करते हो, लेकिन तुमने जान लिया है कि करीब-करीब असंभव ही है पहुंच पाना; तो तुम चालाकी करते हो, तुम होशियारी करते हो। तुम स्वयं से कहते हो, ‘असंभव है पहुंच पाना।’ भीतर तुम जानते होः असंभव है पहुंच पाना, लेकिन तुम हारना नहीं चाहते, तुम नपुंसक नहीं अनुभव करना चाहते, तुम दीन-हीन नहीं अनुभव करना चाहते, तो तुम कहते हो, ‘मैं चाहता ही नहीं।’
तुमने सुनी होगी एक बहुत सुंदर कहानी। एक लोमड़ी एक बगीचे में जाती है। वह ऊपर देखती हैः अंगूरों के सुंदर गुच्छे लटक रहे हैं। वह कूदती है, लेकिन उसकी छलांग पर्याप्त नहीं है। वह पहुंच नहीं पाती। वह बहुत कोशिश करती है, लेकिन वह पहुंच नहीं पाती।

फिर वह चारों ओर देखती है कि किसी ने उसकी हार देखी तो नहीं। फिर वह अकड़ कर चल पड़ती है। एक नन्हा खरगोश जो झाड़ी में छिपा हुआ था बाहर आता है और पूछता है, ‘मौसी, क्या हुआ?’ उसने देख लिया कि लोमड़ी हार गई, वह पहुंच नहीं पाई। लेकिन लोमड़ी कहती है, कुछ नहीं अंगूर खट्टे हैं।

8.1.17

राधास्वामी : कुंज गली से गूंजी गुरुओं की वाणी




आगरा। वृंदावन की कुंज गलियों से निकले राधा-कृष्ण के बोल तो सबको निहाल करते हैं। परंतु आगरा की ऐसी गली के बारे में कुछ ही लोगों ने सुना है। यह है प्राचीन पन्नी गली। सबसे पहले यहीं से झंकृत हुई थी राधास्वामी मत की ध्वनि, जो आज पूरे विश्व में गुंजायमान है। देश-विदेश में इसके कई करोड़ अनुयायी सत्संगी हैं।कश्मीरी बाजार की इस गली में प्रवेश करने के बाद कुछ दूरी पर दायीं ओर यह सत्संग भवन है। इसके ऊपरी कक्ष में राधास्वामी मत के संस्थापक कुल मालिक परम पुरुष पूरन धनी स्वामीजी महाराज [शिवदयालजी महाराज] का जन्म 24 अगस्त 1818 को हुआ। बचपन से ही उनका मन सुरत साधना योग में लगने लगा। वह इस भवन में सत्संग करने लगे। इस सत्संग को उन्होंने राधास्वामी नाम दिया। इसी दौरान उनके कुछ शिष्य बन गए। इनमें से उनके चयनित शिष्य यहां नियमित आते। उन्हें प्रेम, शांति और सद्भावना का संदेश दिया जाता।
धीरे-धीरे इस मत के अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी। आखिर इस मत के द्वितीय गुरु परम पुरुष पूरन धनी हजूर महाराज [राय बहादुर सालिगराम महाराज] की विशेष प्रार्थना पर स्वामीजी महाराज ने इसी भवन के आंगन में 15 फरवरी 1861 में इस मत को आम जनता के लिए शुरू किया। बाद में स्वामीजी महाराज ने इसी भवन में सन् 1878 ई. में अपना चोला छोड़ दिया। इनकी समाधि स्वामी बाग में है, जहां भव्य स्मारक निर्माणाधीन है। जबकि हुजूर महाराज की पवित्र समाधि पीपलमंडी के हुजूरी भवन में है। वहां वर्तमान गुरु दादाजी महाराज [डॉ.अगम प्रसाद माथुर] द्वारा जगत कल्याण के लिए नियमित प्रवचन दिए जाते हैं।
प्रतिदिन होता है सत्संग
पन्नी गली के इस सत्संग भवन के सेवादार नत्थी प्रसाद और लाल बहादुर ने बताया कि यहां प्रतिदिन प्रात: सत्संग होता है। इसके अलावा प्रत्येक गुरुवार को बड़ा सत्संग होता है। स्वामीजी महाराज के जन्म दिवस जन्माष्टमी पर भव्य एवं विशाल सत्संग यहां किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से सत्संगी आते हैं।
प्राचीनता की झलक
जिस कक्ष में स्वामीजी महाराज का जन्म हुआ था, वहां उनका चित्र रखा हुआ है। ऊपरी मंजिल पर सत्संग भवन है, वहां स्वामीजी महाराज की चरण पादुकाएं रखी हुई हैं। जहां नियमित सत्संग होता है। भवन की देखरेख अचल सरन सेठ और प्रीतम बाबू के निर्देशन में होती है। इस भवन में व्यवस्था दुरुस्त है, लेकिन इसकी प्राचीनता को ज्यों का त्यों रखा गया है।

तीव्र गति से बढ़ा मत
स्थापना के बाद इस मत का तेजी से विस्तार हुआ। इसकी शाखाएं बढ़ती गईं।राधास्वामी व्यास सबसे अधिक मजबूत और विस्तृत है राधास्वामी व्यास शाखा, जिसके 500 से अधिक सत्संग केंद्र हैं। इसके 50 लाख से ज्यादा अनुयायी देश-विदेश में हैं। आदि केंद्र हजूरी भवन, पीपलमंडी के लाखों अनुयाई देश-विदेश में हैं। स्वामी बाग में प्रतिदिन सत्संग होता है, इनके भी बेशुमार अनुयायी हैं। राधास्वामी सत्संग सभा, दयालबाग का अपना अलग अस्तित्व है। इसके गुरु, प्रो. पीएस सत्संगी शैक्षिक और आध्यात्मिक संदेश देते हैं। इसके अलावा अन्य शाखाएं भी हो गयी हैं। जितनी भी शाखाएं इस मत की हैं, सभी का केंद्र बिंदु पन्नी गली का यह सत्संग और हजूरी भवन है।
क्या है मत का आधार
इस मत का मुख्य आधार सुरत शब्द योग है, जो एक आंतरिक साधना या अभ्यास है। यह संत मत और आध्यात्मिक परंपरा में अपनाई जाने वाली योग पद्धति है। संस्कृत में सुरत का अर्थ आत्मा, शब्द का अर्थ ध्वनि और योग का अर्थ जुड़ना है। इसी शब्द को ध्वनि की धारा या श्रव्य जीवन धारा कहते हैं। इसके आधार पर सत्संगियों को सुरत शब्द का संदेश दिया जाता है।