26.5.17

झाड़ू के चमत्कारी टोटके, जो करेंगे आपको मालामाल





अगर हमारे द्वारा झाड़ू के मान-सम्मान में कमी होती है, तो इसका असर निश्चित ही हमारे जीवन, हमारी कमाई, परिवार की आर्थिक संपन्नता पर पड़ता है। यह घर में रह रहे व्यक्तियों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
अत: झाड़ू का नियमित उपयोग करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है.
* सूर्यास्त होने के बाद कभी भी झाड़ू और पोछा गलती से नहीं लगाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस गलती की वजह से आपके बुरे दिन शुरू हो सकते हैं।
* झाड़ू बुहारने के बाद हमेशा साफ करके रखें, झाड़ू गिली नहीं छोड़ना चाहिए।
* सपने में झाड़ू देखने का मतलब होता है, आपका आर्थिक नुकसान होने वाला है।
* बहुत ज्यादा समय से उपयोग में नहीं आ रही पुरानी झाड़ू को घर में न रखें।
* जब भी नई झाड़ू उपयोग में लानी हो तो, शनिवार से उसका उपयोग शुरू करें। शास्त्रों के अनुसार झाड़ू को भी महालक्ष्मी का ही एक स्वरूप माना गया है। झाड़ू से दरिद्रता रूपी गंदगी को बाहर किया जाता है। जिन घरों के कोने-कोने में भी सफाई रहती है, वहां का वातावरण सकारात्मक रहता है। घर के कई वास्तु दोष भी दूर होते हैं। साथ ही, इनसे जुड़ी कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है।
 

महालक्ष्मी की कृपा पाने के लिए करें झाड़ू का ये उपाय-
देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए घर के आसपास किसी भी मंदिर में तीन झाड़ू रख आएं। यह पुराने समय से चली आ रही परंपरा है। पुराने समय में लोग अक्सर मंदिरों में झाड़ू दान किया करते थे।
माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किसी बहुत बड़े तंत्र-मंत्र-यंत्र की जरूरत नहीं है ना ही किसी पूजा-पाठ की। मां को प्रसन्न कर मनचाहा वरदान करने के लिए आपको केवल झाड़ू से जुड़ी कुछ बातों को ध्यान रखना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार झाडू को मां महालक्ष्मी का ही रूप माना गया है। माना जाता है कि जिस घर में पूरी तरह से साफ-सफाई रहती है वहां वास्तु दोष भी खत्म होता है और घर में आती है।
मां लक्ष्मी की कृपाप्राप्ति के अपने घर के आसपास के किसी मंदिर में ब्रह्म मुहूर्त (सुबह सूर्योदय के समय) में तीन झाडूओं(Brooms) का गुप्त दान (बिना किसी को बताए) करें। झाडू दान करने में इन बातों का ध्यान रखें।
मंदिर में झाडू दान करने के पहले शुभ मुहूर्त अवश्य देख लें। यदि उस दिन कोई शुभ योग (यथा पुष्य या रवि नक्षत्र) हो, त्यौहार (जैसे दीवाली, दशहरा आदि) हो तो इस दान की महत्ता बहुत बढ़ जाती है और घर में स्थाई लक्ष्मी का वास होता है। जिस दिन भी यह काम करना हो, उसके एक दिन पहले ही आपको 3 झाडू खरीदकर ले आना चाहिए।
जब भी किसी नए घर में प्रवेश करें, उस समय नई झाड़ू लेकर ही घर के अंदर जाना चाहिए। यह शुभ शकुन माना जाता है। इससे नए घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहेगी।
झाडू (Broom) को सदैव छिपा कर रखें। मेहमानों को दिखते स्थान पर झाडू रखना अपशकुन माना जाता है। परन्तु रात के समय घर के मुख्य दरवाजे के सामने झाडू रखने से घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती।
भोजन कक्ष, रसोई अथवा भंडार गृह में कभी झाडू न रखें। इससे घर के संसाधनों में कमी आती है।
झाड़ू(Broom) को कभी भी खड़ी करके नहीं रखना चाहिए। यह अपशकुन माना गया है।
झाड़ू(Broom) पर गलती से भी पैर नहीं रखना चाहिए। ऐसा होने पर लक्ष्मी रूठ जाती हैं। यह अपशकुन है।

  

25.5.17

चावल के 10 चमत्कारिक टोटके करेंगे आपको मालामाल !


चावल को अक्षत कहा जाता है। अक्षत का अर्थ होता है अखंडित। चावल को पूर्णता का प्रतीक और देवताओं का भोग माना गया है। हमारी श्रद्धा और भक्ति खंडित ना हो, सदैव बढ़ती जाए इसीलिए चावल भगवान को अर्पित किए जाते हैं। भारत में किसी को आशीर्वाद देते वक्त कहा जाता है- धन और धान्य से संपन्न हो। इसमें धान्य का अर्थ चावल ही होता है।
इसे धान भी कहते हैं। यह चार रूप में होता है: ब्राउन, रेड, ब्लैक और वाइट चावल। जब धान को कूट कर उसके छिलके को अलग कर दिया जाता है तो हमें ब्राउन राइस प्राप्त होता है। यह सुनहरे या भूरे रंग का होता है। चमकीले काले चावलों को जब पकाया जाता है, तो वे पर्पल रंग में बदल जाते हैं।
हिन्दू धर्म में चावल का बहुत महत्व है। इसी वजह से हर तरह की पूजा में चावल का प्रयोग किया जाता है। कोई भी पूजा, यज्ञ आदि अनुष्ठान बिना चावल के पूर्ण नहीं हो सकता। चावल अर्थात अक्षत का मतलब जिसका क्षय नहीं हुआ है। हिन्दुओं में किसी भी शुभ कार्यों पर माथे पर रोली के साथ चावल लगाकर तिलक किया जाता है
भारत विश्व में चीन के बाद चावल का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है। दुनियाभर में चावल की 40 हजार प्रजातियां हैं। जिसमें से 4 हजार किस्मों का व्यापारिक उत्पादन होता है। जैसे उत्तर भारत में गेहूं का उपयोग अधिक होता है उसी तरह दक्षिण भारत में चावाल प्रतिदिन के भोजन में शामिल है। भारतीय अपने दैनिक भोजन में चावल को प्राथमिकता देते हैं। विशेषत: भारत के पूर्व और दक्षिण में रहने वाले लोगों का मुख्य.भोजन चावल है।
शिव को अर्पित करें चावल : 
प्रति सोमवार शिवलिंग पूजन में बैठने से पूर्व अपने पास करीब आधा किलो या एक किलो चावल का ढेर लेकर बैठें। फिर शिवलिंग का विधिवत पूजन करें। पूजा पूर्ण होने के बाद चावल के ढेर से एक मुट्ठी चावल लेकर शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद बचे हुए चावल को मंदिर में दान कर दें या किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दे दें। ऐसा हर सोमवार को करें। कम से कम पांच सोमवार करें। इस उपाय को अपनाने से धन संबंधी समस्या दूर हो जाएगी।
लक्ष्मी पूजन में चावल : 
यह उपाय किसी भी शुभ मुहूर्त, होली के दिन या किसी भी पूर्णिमा के दिन कर सकते हैं। इसके लिए सुबह जल्दी उठें और सभी नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद लाल रंग का कोई रेशमी कपड़ा लें। इस लाल कपड़े में पीले चावल के 21 अखंडित दानें रखें। यानि कोई टूटा हुआ दाना न रखें। चावल को पीला करने के लिए हल्दी का प्रयोग करें। उन दानों को कपड़े में बांध लें। अब माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक चौकी बनाएं और उस पर यह लाल कपड़े में बंधे चावल भी रखें। इसके बाद उनकी नियमपूर्वक पूजा करें। पूजन के बाद यह लाल कपड़े में बंधे चावल अपने पर्स में छिपाकर रख लें। ऐसा करने पर महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और धन संबंधी मामलों में चल रही रुकावटें दूर हो जाती हैं।
 
ध्यान रखें कि पर्स में किसी भी प्रकार की अधार्मिक वस्तु कतई न रखें। इसके अलावा पर्स में चाबियां नहीं रखनी चाहिए। सिक्के और नोट अलग-अलग व्यस्थित ढंग से रखे होने चाहिए। नोट के साथ बिल या अन्य पेपर न रखें। किसी भी प्रकार की अनावश्यक वस्तु पर्स में न रखें। यदि पर्स में पीले चावल रखेंगे तो महालक्ष्मी की कृपा भी आप बनी रहेगी।
चावल का सेवन : 
चावल का सेवन किस तरह करना चाहिए यह जानना जरूरी है। इस उपाय से भी धन और अच्छी सेहत की प्राप्ति होती है। यदि आप चावल का इस्तेमाल प्रतिदिन के भोजन में कर रहे हैं तो ध्यान रखें कि चावल कभी भी सूर्यास्त के बाद न खाएं।
रात के भोजन में चावल, दही जैसी चीजों से बचना चाहिए। कहते हैं ऐसे में लक्ष्मी जी का अपमान होता है। चावल को भोजन की थाली में दाहिने ओर रखना चाहिए। चावल को थाली में कभी जूठा नहीं छोड़ना चाहिए।
 
शत्रु परेशानी हटाने के लिए :
 साबुत उड़द की काली दाल के 38 और चावल के 40 दाने मिलाकर किसी गड्ढे में दबा दें और ऊपर से नीबू निचोड़ दें। नीबू निचोड़ते समय शत्रु का नाम लेते रहें, उसका शमन होगा और वह आपके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठा पाएगा। चावल हवन : चावल को तिल और दूध के साथ मिलाकर उससे माता का हवन करने से श्रीप्राप्ति होती है और दरिद्रता दूर भागती है। यह हवन किसी शुभ मुहूर्त में करें और विधिपूर्वक करें।
सुयोग्य वर हेतु : 
किसी भी माह की शुक्लपक्ष की चतुर्थी से चांदी की छोटी कटोरी में गाय का दूध लेकर उसमें शक्कर एवं उबले हुए चावल मिलाकर चंद्रोदय के समय चंद्रमा को तुलसी की पत्ती डालकर यह नेवैद्य बताएं व प्रदक्षिणा करें। इस प्रकार यह नियम 45 दिनों तक करें। 45 दिन पूर्ण होने पर एक कन्या को भोजन करवाकर वस्त्र और मेंहदी दान करें। ऐसा करने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होकर शीघ्र मांगलिक कार्य संपन्न होगा।
चंद्र देगा शुभ फल :
 यदि आपकी कुंडली में चंद्र अशुभ फल दे रहा है तो आ अपनी माता से एक मुट्ठीभर चावल विधिपूर्वक दान ले लें।
नौकरी संबंधी परेशानी का निदान : 
यदि आपको नौकरी संबंधी कोई परेशानी है तो आप कुछ दिनों तक मीठे चावल कौओं को खिलाएं। इससे आपकी समस्या का निदान हो जाएगा।
पितृदोष दूर करने हेतु : 
अमावस्या के दिन चावल की खीर बनाकर उसमें रोटी चूर लें और यह कौओं के लिए घर की छत पर रख दें। इस उपाय से आपके घर में रहने वाले सदस्यों पर पितृ देवताओं की विशेष कृपा होगी। पितर देवता की कृपा से ही धन संबंधी कार्यों में भी विशेष सफलता प्राप्त होती है। पितरों को खीस बहुत पसंद होती है। इसलिए प्रत्येक माह की अमावस्या को खीर बनाकर ब्राह्मण को भोजन के साथ खिलाने पर महान पुण्य की प्राप्ति होती है। जीवन से अस्थिरताएं दूर होती है। इस दिन संध्या के समय पितरों के निमित्त थोड़ी खीर पीपल के नीचे भी रखनी चाहिए।
मनोकामना पूर्ण होगी : 
किसी शुक्रवार की रात 10 बजे के बाद अपने सामने चौकी पर एक कलश रखें। कलश के ऊपर शुद्ध केसर से स्वस्तिक का चिह्न बनाकर उसमें पानी भर दें। इसके बाद उसमें चावल, दूर्वा और एक रूपया डाल दें। फिर एक छोटी सी प्लेट में चावल भरकर उसे कलश के ऊपर रखें। उसके ऊपर श्रीयंत्र स्थापित कर दें। इसके बाद उसके निकट चौमुखी दीपक जलाकर उसका कुंकुम और चावल से पूजन करें। इसके बाद 10 मिनट तक लक्ष्मी का ध्यान करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।  

15.5.17

भारतीय मीडिया आख़िर हिन्दू विरोधी क्यों है ?



मीडिया हिन्दू विरोधी क्यों है ? 
इसका जवाब इन रिश्तों में मिलेगा ।
    पहले इन रिश्तेदारियों पर एक नज़र डालिये । तब आप खुद ही समझ जायेंगे कि कैसे और क्यों " मीडिया का अधिकांश हिस्सा " हिन्दुओं और हिन्दुत्व का विरोधी है । किस प्रकार इन लोगों ने एक " नापाक गठजोड़ " तैयार कर लिया है । किस तरह ये सब लोग मिलकर सत्ता संस्थान के शिखरों के करीब रहते हैं । किस तरह से इन प्रभावशाली ? लोगों का सरकारी नीतियों में दखल होता है आदि ।
पेश हैं - रिश्ते ही रिश्ते ( दिल्ली की दीवारों पर लिखा होता है । वैसे वाले नहीं । ये हैं असली रिश्ते )
- सुज़ाना अरुंधती रॉय । प्रणव रॉय ( एनडीटीवी ) की भांजी हैं । ( नेहरु डायनेस्टी टीवी - NDTV )
- अरुंधति एक संस्था के लिए भी काम करती है । उसका नाम है - जस्टिस फॉर अफजल गुरु ।
- इस संस्था के मेम्बर हैं - प्रशांत भूषण । संदीप पांडे । शबनम हाशमी । हर्ष मंदर । अरुणा रॉय आदि ।
- हर्ष मंदार । शबनम हाशमी । अरुणा रॉय एक सरकारी संगठन NAC के सदस्य हैं । जिसने हिन्दू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा बिल का निर्माण किया ।
- प्रणव रॉय " काउंसिल आन फ़ारेन रिलेशन्स " के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं ।
- इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं - मुकेश अम्बानी ।
- प्रणव रॉय की पत्नी है - राधिका राय ।
- राधिका राय । बृन्दा करात की बहन है ।
- बृन्दा करात । प्रकाश करात CPI की पत्नी हैं ।
- प्रकाश करात चेन्नै के " डिबेटिंग क्लब " ग्रुप के सदस्य थे ।
- एन राम । पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे ।
- इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी - रैडिकल रीव्यू ।
- CPI ( M ) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं - सीमा चिश्ती ।
सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की " रेजिडेण्ट एडीटर " हैं ।
- बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं ।
- बरखा दत्त की माँ हैं - श्रीमती प्रभा दत्त ।
- प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं ।
- राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे । अब CNN-IBN के हैं ( दोनों ही मुस्लिम+ईसाई supporter चैनल हैं )।
- राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं - सागरिका घोष ।
- सागरिका घोष के पिता हैं । दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक - भास्कर घोष ।
- सागरिका घोष की आंटी - रूमा पॉल हैं।
- रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं ।
- सागरिका घोष की दूसरी आंटी - अरुंधती घोष हैं ।
- अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं ।
- CNN-IBN का " ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क " GBN से व्यावसायिक समझौता है ।
- GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है ।
- NDTV भारत का एकमात्र चैनल है को " अधिकृत रूप से " पाकिस्तान में दिखाया जाता है ।
-  
दिलीप डिसूज़ा PIPFD ( Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy ) के सदस्य हैं ।
- दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं - जोसेफ़ बेन डिसूज़ा ।
- जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं ।
- तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं ।
- तीस्ता सीतलवाड के पति हैं - जावेद आनन्द ।
- जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था " मुस्लिम फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी " चलाते हैं ।
- इस संस्था के प्रवक्ता हैं - जावेद अख्तर ।
- जावेद अख्तर की पत्नी हैं - शबाना आज़मी ।
- करण थापर ITV के मालिक हैं ।
- ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है ।
- करण थापर के पिता थे - जनरल प्राणनाथ थापर ( 1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था ) ।
- करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं ।
- करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है ।
- नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं ।
- विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं ।
- मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं ।
- नबाआं को मदद मिलती है - पैट्रिक मेकुल्ली से । जो कि " इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क " IRN संगठन में हैं ।
- अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्या हैं ।
- अंगना चटर्जी PROXSA ( Progressive South Asian Exchange Network ) की भी सदस्या हैं ।
- PROXSA संस्था FOIL ( Friends of Indian Leftist ) से पैसा पाती है ।
- अंगना चटर्जी के पति हैं - रिचर्ड शेपायरो ।
- FOIL के सह संस्थापक हैं । अमेरिकी वामपंथी - बिजू मैथ्यू ।
- राहुल बोस ( अभिनेता ) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं ।
- खालिद अंसारी " मिड-डे " पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं ।
- खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं ।
- खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं ।
- अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं ।
- एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं ।
- नरसिम्हन राम ( यानी एन राम ) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार " द हिन्दू " के मुख्य सम्पादक हैं ।
- एन राम की पहली पत्नी का नाम है - सूसन ।
- सूसन एक आयरिश हैं । जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं ।
- विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं । वे भी एक पत्रकार हैं ।
- एन राम की हालिया पत्नी - मरियम हैं ।
- त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और के एम रॉय ने भाग लिया है ।
- जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं ।
- जबकि के एम रॉय " द हिन्दू " के संवाददाता हैं ।
- के एम रॉय " मंगलम " पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं ।
- मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एम सी वर्गीज़ ने शुरु किया है ।
- के एम रॉय को " ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़ टाइम अवार्ड " से सम्मानित किया गया है ।
- " ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन " के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं - जॉन दयाल ।
- जॉन दयाल " ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल " ( AICC ) के सचिव भी हैं ।
- AICC के अध्यक्ष हैं - डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा ।
- जोसेफ़ डिसूज़ा ने " दलित फ़्रीडम नेटवर्क " की स्थापना की है ।
- दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है " ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया " ( OM India )।
- OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं - कुमार स्वामी ।
- कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं ।
- OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं - मोजेस परमार ।
- OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है । जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं ।
OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क DFN के साथ काम करती है ।
- DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं ।
- विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो ( अमेरिका ) के पूर्व सीनेटर हैं । और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं । यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है ।
- DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं ।
- उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं ।
- जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था ।
- जोसेफ़ पिट्स " कश्मीर फ़ोरम " के संस्थापक भी हैं ।
- उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल ( राष्ट्रीय एकता परिषद ) के सदस्य भी हैं ।
- उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं ।
- सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं ।
 

- सुहासिनी हैदर, सलमान हैदर की पुत्रवधू हैं ।
- सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं । चीन में राजदूत भी रह चुके हैं ।
- रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं - रामोजी राव ।
- रामोजी राव " ईनाडु " ( सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार ) के संस्थापक हैं ।
- रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं ।
- रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं ।
- डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं - टी वेंकटरमन रेड्डी ।
- रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं ।
- एम जे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज के सम्पादक हैं ।
- एम जे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं ।
- एम जे अकबर की पत्नी हैं - मल्लिका जोसेफ़ ।
- एम जे अकबर अब प्रभु चावला की जगह सीधी बात में आते है ।
- मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं ।
- वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं ।
- सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की ।
- सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि - आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये ।
- सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं - शर्मिला ।
- शर्मिला की शादी हुई है - अनिल कुमार से । अनिल कुमार भी एक धर्म परिवर्तित ईसाई हैं । जिन्होंने " अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म " नामक संस्था शुरु की । और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट ( कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक ) हैं ।
- सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं ।
- जगन रेड्डी " जगति पब्लिकेशन प्रा. लि. " के चेयरमैन हैं ।
- भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं ।
- करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं ।
- चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि " लैंको समूह " को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था ।
- लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है ।
- एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं ।
- एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं ।
- पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं ।
- सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं - कलानिधि मारन ।
- कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक " दिनाकरन " के भी मालिक हैं ।
- कलानिधि के भाई हैं - दयानिधि मारन ।
- दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे ।
- कलानिधि मारन के पिता थे - मुरासोली मारन ।
- मुरासोली मारन के चाचा हैं - एम करुणानिधि ( तमिलनाडु के मुख्यमंत्री )।
- करुणानिधि ने " कैलाग्नार टीवी " का उदघाटन किया ।
- कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं - एम के अझागिरी ।
- एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं ।
- करुणानिधि के एक और पुत्र हैं - एम के स्टालिन ।

- स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया ।
- कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं । और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं ।
- कनिमोझी " द हिन्दू " अखबार में सह सम्पादक भी हैं ।
- कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने माने व्यक्ति हैं ।
- स्टार विजय एक तमिल चैनल है ।
- विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है ।
- स्टार टीवी के मालिक हैं - रूपर्ट मर्डोक ।
- Act Now for Harmony and Democracy ( अनहद ) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं - शबनम हाशमी ।
- शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं ।
- “अनहद” के एक और संस्थापक हैं - के एम पणिक्कर ।
- के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं । जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे ।
- पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला ।
- हर्ष मन्दर भी “अनहद” के संस्थापक हैं । मशहूर हिन्दू विरोधी लेख लिखते हैं । सोनिया गांधी द्वारा गठित nac के मेम्बर हैं । जिसने एक कानून बनाया है । हिंदुओं के खिलाफ - सांप्रदायिक लक्षित हिंसा अधिनियम ।
- हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं ।
- अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं । क्योंकि वे ईसाई हैं । और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोर शोर से धर्म परिवर्तन करवाया गया । और बाद में दिलीप सिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई ।
- कमला भसीन भी “ अनहद ” की संस्थापक सदस्य हैं ।
- फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा “ अनहद ” के ट्रस्टी हैं ।
- मलयालम दैनिक “ मातृभूमि ” के मालिक हैं - एम पी वीरेन्द्र कुमार ।
- वीरेन्द्र कुमार जद ( से ) के सांसद हैं । ( केरल से )
- केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है ।
- शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं ।
- चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं । जो कोलकाता की आनन्द बाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे ।
- चन्द्रन थरूर ने 1959 में " द स्टेट्समैन " की अध्यक्षता की ।
- शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के - ईशान और कनिष्क हैं । ईशान हांगकांग में " टाइम्स " पत्रिका के लिये काम करते हैं ।
- कनिष्क लन्दन में " ओपन डेमोक्रेसी " नामक संस्था के लिये काम करते हैं ।
- शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी ( अमेरिकी पत्रिका ) " इंडिया करंट्स " की सम्पादक हैं ।
- परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं । और वे " रीडर्स डाइजेस्ट " के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं
- शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्षा हैं ।
- शोभना भरतिया के के बिरला की पुत्री और जी ड़ी बिरला की पोती हैं ।
- शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं । जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था ।
- शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है ।
- शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं ।
- करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं ।
- पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है ।
यह बात साबित हो चुकी है कि मीडिया का एक खास वर्ग हिन्दुत्व का विरोधी है । इस वर्ग के लिये भाजपा संघ के बारे में नकारात्मक प्रचार करना । हिन्दू धर्म । हिन्दू देवताओं । हिन्दू रीति रिवाजों । हिन्दू साधु सन्तों सभी की आलोचना करना एक " धर्म " के समान है । इसका कारण हैं । कम्युनिस्ट चर्च परस्त । मुस्लिम परस्त तथाकथित सेकुलरिज़्म परस्त लोगों की आपसी रिश्तेदारी । सत्ता और मीडिया पर पकड़ । और उनके द्वारा एक " गैंग " बना लिया जाना । यदि कोई समूह या व्यक्ति इस गैंग के सदस्य बन जायें । प्रिय पात्र बन जायें । तब उनके और उनकी बिरादरी के खिलाफ़ कोई खबर आसानी से नहीं छपती । जबकि हिन्दुत्व पर ये सब लोग मिलजुल कर हमला बोलते हैं ।
नोट - यह जानकारियाँ नेट पर उपलब्ध विभिन्न वेबसाईट्स, फ़ोरम आदि पर आधारित हैं । इसमें हमारा कोई विशेष योगदान नहीं है । अपनी तरफ़ से कोई और रिश्ता उजागर करना चाहते हों । तो वह भी इसमें जोड़ें

हिंदुत्व:जातिवाद, छुआछूत नहीं है हिन्दू धर्म का हिस्सा:


       धर्म की गलत व्याखाओं का दौर प्राचीन समय से ही जारी है। ऋषि वेद व्यास ब्राह्मण नहीं थे, जिन्होंने पुराणों की रचना की। तब से ही वेद हाशिये पर धकेले जाने लगे और समाज में जातियों की शुरुआत होने लगी। क्या हम शिव को ब्राह्मण कहें? विष्णु कौन से समाज से थे और ब्रह्मा की कौन सी जाति थी? क्या हम कालीका माता को दलित समाज का मानकर पूजना छोड़ दें?
   आज के शब्दों का इस्तेमाल करें तो ये लोग दलित थे- ऋषि कवास इलूसू, ऋषि वत्स, ऋषि काकसिवत, महर्षि वेद व्यास, महर्षि महिदास अत्रैय, महर्षि वाल्मीकि आदि ऐसे महान वेदज्ञ हुए हैं जिन्हें आज की जातिवादी व्यवस्था दलित वर्ग का मान सकती है। ऐसे हजारों नाम गिनाएं जा सकते हैं जो सभी आज के दृष्टिकोण से दलित थे। वेद को रचने वाले, मनु स्मृति को लिखने वाले और पुराणों को गढ़ने वाले ब्राह्मण नहीं थे।
   अक्सर जातिवाद, छुआछूत और सवर्ण, दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर धर्मशास्त्रों को भी दोषी ठहराया जाता है, लेकिन यह बिल्कुल ही असत्य है। इस मुद्दे पर धर्म शस्त्रों में क्या लिखा है यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस मुद्दे को लेकर हिन्दू सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया गया है और किया जा रहा है।
  पहली बात यह कि जातिवाद प्रत्येक धर्म, समाज और देश में है। हर धर्म का व्यक्ति अपने ही धर्म के लोगों को ऊंचा या नीचा मानता है। क्यों? यही जानना जरूरी है। लोगों की टिप्पणियां, बहस या गुस्सा उनकी अधूरी जानकारी पर आधारित होता है। कुछ लोग जातिवाद की राजनीति करना चाहते हैं इसलिए वह जातिवाद और छुआछूत को और बढ़ावा देकर समाज में दीवार खड़ी करते हैं और ऐसा भारत में ही नहीं दूसरे देशों में भी होता रहा है।
दलितों को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया। इसी तरह इससे पूर्व के जो भी नाम थे वह हिन्दू धर्म ने नहीं दिए। आज जो नाम दिए गए हैं वह पिछले 60 वर्ष की राजनीति की उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज है।


बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान है, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। यहां ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया।
भारत ने 900 साल की गुलामी में बहुत कुछ खोया है खासकर उसने अपना मूल धर्म और संस्कृति खो दी है। खो दिए हैं देश के कई हिस्से। यह जो भ्रांतियां फैली है और यह जो समाज में कुरीरियों का जन्म हो चला है इसमें गुलाम जिंदगी का योगदान है। जिन लोगों के अधिन भारतीय थे उन लोगों ने भारतीयों में फूट डालने के हर संभव प्रयास किए और इसमें वह सफल भी हुए।
अब यह भी जानना जरूरी है कि हिन्दू धर्म के शास्त्र कौन से हैं। क्योंकि कुछ लोग उन शास्त्रों का हवाला देते हैं जो असल में हिन्दू शास्त्र नहीं है। हिन्दुओं का धर्मग्रंथ मात्र वेद है, वेदों का सार उपनिषद है जिसे वेदांत कहते हैं और उपनिषदों का सार गीता है। इसके अलावा जिस भी ग्रंथ का नाम लिया जाता है वह हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं है।
मनुस्मृति, पुराण, रामायण और महाभारत यह हिन्दुओं के धर्म ग्रंथ नहीं है। इन ग्रंथों में हिन्दुओं का इतिहास दर्ज है, लेकिन कुछ लोग इन ग्रंथों में से संस्कृत के कुछ श्लोक निकालकर यह बताने का प्रयास करते हैं कि ऊंच-नीच की बातें तो इन धर्मग्रंथों में ही लिखी है। असल में यह काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते समाज का चित्रण है।
कर्म का विभाजन- वेद या स्मृति में श्रमिकों को चार वर्गो- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र-में विभक्त किया गया है, जो मनुष्यों की स्वाभाविक प्रकृति पर आधारित है। यह विभक्तिकरण कतई जन्म पर आधारित नहीं है। आज बहुत से ब्राह्मण व्यापार कर रहे हैं उन्हें ब्राह्मण कहना गलत हैं। ऐसे कई क्षत्रिय और दलित हैं जो आज धर्म-कर्म का कार्य करते हैं तब उन्हें कैसे क्षत्रिय या दलित मान लें? लेकिन पूर्व में हमारे देश में परंपरागत कार्य करने वालों का एक समाज विकसित होता गया, जिसने स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को निकृष्ट मानने की भूल की है तो उसमें हिन्दू धर्म का कोई दोष नहीं है। यदि आप धर्म की गलत व्याख्या कर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं तो उसमें धर्म का दोष नहीं है।
प्राचीन काल में ब्राह्मणत्व या क्षत्रियत्व को वैसे ही अपने प्रयास से प्राप्त किया जाता था, जैसे कि आज वर्तमान में एमए, एमबीबीएस आदि की डिग्री प्राप्त करते हैं। जन्म के आधार पर एक पत्रकार को पुत्र को पत्रकार, इंजीनियर के पुत्र को इंजीनियर, डॉक्टर के पुत्र को डॉक्टर या एक आईएएस, आईपीएस अधिकारी के पुत्र को आईएएस अधिकारी नहीं कहा जा सकता है, जब तक की वह आईएएस की परीक्षा नहीं दे देता।
इस तरह मिला जाति को बढ़ावा- दो तरह के लोग होते हैं- अगड़े और पिछड़े। यह मामला उसी तरह है जिस तरह की दो तरह के क्षेत्र होते हैं विकसित और अविकसित। पिछड़े क्षेत्रों में ब्राह्मण भी उतना ही पिछड़ा था जितना की दलित या अन्य वर्ग, धर्म या समाज का व्यक्ति। पीछड़ों को बराबरी पर लाने के लिए संविधान में प्रारंभ में 10 वर्ष के लिए आरक्षण देने का कानून बनाया गया, लेकिन 10 वर्ष में भारत की राजनीति बदल गई। सेवा पर आधारित राजनीति पूर्णत: वोट पर आधारित राजनीति बन गई।:-


हिन्दू धर्म में वृक्ष पूजा क्यों की जाती है?



   ईश्वरवादियों के अनुसार किसी भी वृक्ष, पौधे, पहाड़, पशु, पत्‍थर आदि की पूजा या प्रार्थना करना पाप है तब सवाल उठता है कि हिन्दू धर्म में वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है? क्या वृक्ष की पूजा करने से .कोई लाभ मिलेगा या वृक्ष हमारी मन्नत पूर्ण करते हैं?
हिन्दू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है।
आखिर वृक्षों की पूजा के पीछे क्या है वैज्ञानिक, धार्मिक और प्राकृतिक कारण?..
*वृक्ष हमारे जीवन और धरती के पर्यावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष से एक और जहां ऑक्सीजन का उत्पादन होता है तो दूसरी ओर यही वृक्ष धरती के प्रदूषण को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, यह धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलन प्रदान करते हैं।
*वृक्ष औषधीय गुणों का भंडार होते हैं। नीम, तुलसी, जामुन, आंवला, पीपल, अनार आदि अनेक ऐसे वृक्ष हैं, जो हमारी सेहत को बरकरार रखने में मददगार सिद्ध होते हैं
*वृक्ष से हमें भरपूर भोजन प्राप्त होता है, जैसे आम, अनार, सेवफल, अंगूर, केला, पपीता, चीकू, संतरा आदि ऐसे हजारों फलदार वृक्षों की जितनी तादाद होगी उतना भरपूर भोजन प्राप्त होगा। आदिकाल में वृक्ष से ही मनुष्य के भोजन की पूर्ति होती थी।
 
*वृक्ष के आसपास रहने से जीवन में मानसिक संतुष्टि और संतुलन मिलता है। वृक्ष हमारे जीवन के संतापों को समाप्त करने की शक्ति रखते हैं। माना कि वृक्ष देवता नहीं होते लेकिन उनमें देवताओं जैसी ही ऊर्जा होती है। हाल ही में हुए शोधों से पता चला है कि नीम के नीचे प्रतिदिन आधा घंटा बैठने से किसी भी प्रकार का चर्म रोग नहीं होता। तुलसी और नीम के पत्ते खाने से किसी भी प्रकार का कैंसर नहीं होता। इसी तरह वृक्ष से सैकड़ों शारीरिक और मानसिक लाभ मिलते हैं।इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्ष से संबंधित अनेक मान्यताओं को प्रचलन में लाया।
उपरोक्त वैज्ञानिक कारणों से हमारे पूर्वज भली-भांति परिचित थे और इस तरह वे पारिस्थितिकी संतुलन के लिए और उपरोल्लिखित उद्देश्यों की रक्षा के लिए वृक्ष को महत्व देते थे, लेकिन उन्हें यह भी मालूम था कि. कि मनुष्य आगे चलकर इन वृक्षों का अंधाधुंध दोहन करने लगेगा इसलिए उन्होंने वृक्षों को बचाने के लिए प्रत्येक वृक्ष का एक देवता नियुक्त किया और जगह-जगह पर प्रमुख वृक्षों के नीचे देवताओं की स्थापना की।
हिंदू धर्म का वृक्ष से गहरा नाता है। हिंदू धर्म को वृक्षों का धर्म कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि हिंदू धर्म में वृक्षों का जो महत्व है वह किसी अन्य धर्म में शायद ही मिले। इस ब्रह्मांड को उल्टे वृक्ष की संज्ञा दी है। पहले यह ब्रह्मांड बीज रूप में था और अब यह वृक्ष रूप में दिखाई देता है। प्रलय काल में यह पुन: बीज रूप में हो जाएगा।

पीपल वृक्ष-
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है।
यहां प्रस्तुत है ऐसे दस वृक्ष जिनकी रक्षा करना हर हिंदू का कर्तव्य है और इनको घर के आसपास लगाने से सुख, शांति और समृद्धि की अनुभूति होती है। किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता।
पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को 'कल्पवृक्ष' की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष में जल अर्पण करने से रोग और शोक मिट जाते हैं।
पीपल के प्रत्येक तत्व जैसे छाल, पत्ते, फल, बीज, दूध, जटा एवं कोपल तथा लाख सभी प्रकार की आधि-व्याधियों के निदान में काम आते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है।  सर्वाधिक ऑक्सीजन निस्सृत करने के कारण इसे प्राणवायु का भंडार कहा जाता है। सबसे अधिक ऑक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों को आत्मसात करने की इसमें अकूत क्षमता है।
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, 'हे पार्थ वृक्षों में मैं पीपल हूं।'
।।मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः। अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।।  
भावार्थ-अर्थात इसके मूल में ब्रह्म, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास होता है। इसी कारण 'अश्वत्त्थ'नामधारी वृक्ष को नमन किया जाता है।-पुराण
पीपल परिक्रमा : स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती 
है। पीपल की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। इसके कई पुरातात्विक प्रमाण भी है।
अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।
पीपल पूजा : शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्तशनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है।

वट वृक्ष -
पीपल में जहां भगवान विष्णु का वास है वहीं बरगद में ब्रह्मा, विश्णु और शिव का वास माना गया है। हालांकि बरगद को साक्षात शिव कहा गया है। बरगद को देखना शिव के दर्शन करना है। हिंदू धर्मानुसार पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को पवित्र वटकी श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गया वट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है
।।तहं पुनि संभु समुझिपन आसन। बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ-अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों, यहां तक कि देवताओं ने भी वट वृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।- रामचरित मानस

आम का पेड़
आम है खास : हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है।
अक्सर धार्मिक पंडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आम के वृक्ष की हजारों किस्में हैं और इसमें जो फल लगता है वह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के रस से कई प्रकार के रोग दूर होते हैं।  
शमी वृक्ष (खेजडा)
भविष्यवक्ता शमी : विक्रमादित्य के समय में सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने अपने 'बृहतसंहिता'नामक ग्रंथ के 'कुसुमलता'नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है।  
वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।   
बिल्व वृक्ष-
हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में 'स्कंदपुराण' में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।
कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हेंमहादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। 'शिवपुराण' में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।

 
अशोक वृक्ष -
अशोक वृक्ष को हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र और लाभकारी माना गया है। अशोक का शब्दिक अर्थ होता है- किसी भी प्रकार का शोक न होना। मांगलिक एवं धार्मिक कार्यों में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है माना जाता है कि अशोक वृक्ष घर में लगाने से या इसकी जड़ को शुभ मुहूर्त में धारण करने से मनुष्य को सभी शोकों से मुक्ति मिल जाती है। अशोक का वृक्ष वात-पित्त आदि दोष, अपच, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, विष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है। यह रसायन और उत्तेजक है। इसके उपयोग से चर्म रोग भी दूर होता है। अशोक का वृक्ष घर में उत्तर दिशा में लगाना चाहिए जिससे गृह में सकारात्मक ऊर्जा का संचारण बना रहता है।
घर में अशोक के वृक्ष होने से सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है एवं अकाल मृत्यु नहीं होती।
अशोक का वृक्ष दो प्रकार का होता है- एक तो असली अशोक वृक्ष और दूसरा उससे मिलता-जुलता नकली अशोक वृक्ष। नकली अशोक वृक्ष देवदार की जाति का लंबा वृक्ष होता है। इसके पत्ते आम के पत्तों जैसे होते हैं। इसकेफूल सफेद, पीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं। असली अशोक का वृक्ष आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है। इसके पत्ते 8-9 इंच लंबे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं। इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं इसीलिए इसे 'ताम्रपल्लव' भी कहते हैं। इसकेनारंगी रंग के फूल वसंत ऋतु में आते हैं, जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं। सुनहरे लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे 'हेमपुष्पा' भी कहा जाता है।

नारियल का पेड़-
नारियल का वृक्ष : हिन्दू धर्म में नारियल के बगैर तो कोई मंगल कार्य संपन्न होता ही नहीं। नारियल का खासा धार्मिक महत्व है। 60 फुट से 100 फुट तक ऊंचा नारियल का पेड़ लगभग 80 वर्षों तक जीवित रहता है। 15 वर्षों के बाद पेड़ में फल लगते हैं।
पूजा के दौरान कलश में पानी भरकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। यह मंगल प्रतीक है। नारियल का प्रसाद भगवान को चढ़ाया जाता है।
पेड़ का प्रत्येक भाग किसी न किसी काम में आता है। ये भाग किसानों के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसे घरों के पाट, फर्नीचर आदि बनाए जाते हैं। पत्तों से पंखे, टोकरियां, चटाइयां आदि बनती हैं। इसकी जटासे रस्सी, चटाइयां, ब्रश, जाल, थैले आदि अनेक वस्तुएं बनती हैं। यह गद्दों में भी भरा जाता है। नारियल का तेल सबसे ज्यादा बिकता है।  
नारियल के पानी में पोटेशियम अधिक मात्रा में होता है। इसे पीने से शरीर में किसी भी प्रकार की सुन्नता नहीं रहती। अगर आप पाचन की समस्या से ग्रसित हैं तो 1 गिलास नारियल का पानी लें, उसमें अन्ननास का जूस मिलाएं और पूरे 9 दिन तक नाश्ते से पहले उसे पीएं। इसे पीने के बाद 2 घंटे तक किसी भी प्रकार का भोजन न करें और न ही कोई अन्य पेय पीएं। नारियल के गूदे का इस्तेमाल नाड़ियों की समस्या, कमजोरी, स्मृति नाश, पल्मनरी अफेक्शन्स (फेफड़ों के रोगों) के उपचार के लिए किया जाता है। यह त्वचा संबंधी तथा आंतड़ियों संबंधी समस्याओं को भी दूर करता है।

अस्थमा से पीड़ित व्यक्तियों को भी नारियल पानी पीने की सलाह दी जाती है।
  
अनार - 
अनार के वृक्ष से जहां सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता हैं वहीं इस वृक्ष के कई औषधीय गुण भी हैं। पूजा के दौरान पंच फलों में अनार की गिनती की जाती है। अनार को दाडम या दाड़िम आदि अलग-अलग नाम से जानते हैं। अनार का वृक्ष भी बहुत ही सुंदर होता है जिसे बगिया की शोभा के लिए भी लगाया जा सकता है। इसकी कली, फूल और फल भी कुछ कम सुंदर नहीं होते।
अनार का प्रयोग करने से खून की मात्रा बढ़ती है। इससे त्वचा सुंदर व चिकनी होती है। रोज अनार का रस पीने से या अनार खाने से त्वचा का रंग निखरता है। अनार के छिलकों के एक चम्मच चूर्ण को कच्चे दूध और गुलाब
जल में मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरा दमक उठता है। अपच, दस्त, पेचिश, दमा, खांसी, मुंह में दुर्गंध आदि रोगों में अनार लाभदायक है। इसके सेवन से शरीर में झुर्रियां या मांस का ढीलापन समाप्त हो जाता है।

 
नीम का वृक्ष -
नीम एक चमत्कारी वृक्ष माना जाता है। नीम जो प्रायः सर्व सुलभ वृक्ष आसानी से मिल जाता है। नीम को संस्कृत में निम्ब कहा जाता है। यह वृक्ष अपने औषधीय गुणों के कारण पारंपरिक इलाज में. बहुपयोगी सिद्ध होता आ रहा है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।  
 निम्ब शीतों लघुग्राही कतुर कोअग्नी वातनुत।
अध्यः श्रमतुटकास ज्वरारुचिक्रिमी प्रणतु ॥  
अर्थात नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वाट, परिश्रम, तृषा, अरुचि, क्रीमी, व्रण, कफ, वामन, कोढ़ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है।  
नीम के पेड़ का औषधीय के साथ-साथ धार्मिक महत्त्व भी है। मां दुर्गा का रूप माने जाने वाले इस पेड़ को कहीं-कहीं नीमारी देवी भी कहते हैं। इस पेड़ की पूजा की जाती है। कहते हैं कि नीम की पत्तियों के धुएं से.बुरी और प्रेत आत्माओं से रक्षा होती है।  
केले का पेड़ : 
केले का पेड़ काफी पवित्र माना जाता है और कई धार्मिक कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है। केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है।
केला हर मौसम में सरलता से उपलब्ध होने वाला अत्यंत पौष्टिक एवं स्वादिष्ट फल है। केला रोचक, मधुर, शक्तिशाली, वीर्य व मांस बढ़ाने वाला, नेत्रदोष में हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन से शरीर पुष्ट होता है। यह कफ, रक्तपित, वात और प्रदर के उपद्रवों को नष्ट करता है।
केले में मुख्यतः विटामिन-ए, विटामिन-सी,थायमिन, राइबो-फ्लेविन, नियासिन तथा अन्य खनिज तत्व होते हैं। इसमें जल का अंश 64.3 प्रतिशत ,प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत है|

5.5.17

बड़ों के पैर छूने के पीछे क्या है विज्ञान ?



पैर छूने का भारतीय रिवाज़ – Indian tradition of Feet touching
हमारे पूर्वजो और प्राचीन समय के विद्वानों की सबसे बड़ी खोज यह थी की उन्होंने प्रक्रति के कई रहस्यों को आज से हजारो सालो पहले ही समझ लिया था, वो भी जब उस दौर में आजकल जैसी सुविधाएँ नहीं थी. न सिर्फ उन्होंने ने इन रहस्यों को समझा, उनके महत्त्व को पहचाना बल्कि साथ ही साथ उन्होंने इन बातों को हमारे दिनचर्या में ऐसे जोड़ा, जिस से की वो हमारे संस्कार बनते चले गए.
अपने गुरुजन बड़े बूढों और माता पिता का पैर छूना (Feet-touching) एक ऐसा ही संस्कार है. आजकल लोग इस संस्कार का महत्व नहीं समझने की वजह से इसे नहीं करते या व्यर्थ की खानापूर्ति मान लेते है.


पैर छूने के पीछे छुपा वैज्ञानिक/मानसिक कारण–Scientific & Psychological Reason behind touching feet
विज्ञानं इस बात को सिद्ध कर चुका है कि हमारे शरीर के चारो तरफ एक आभामंडल (Aura) होता है. लोगों की ऊर्जा-स्तर (energy level) के अनुसार हर मनुष्य का आभा मंडल अलग ऊर्जा और अलग रंग का होता है. जैसे कुछ लोग फुर्त और कुछ आलसी होते है. यह आभा मंडल हमारे ऊर्जा, मानसिक शक्ति, इच्छा-शक्ति (will power) और विचारो के प्रकार पर निर्भर करता है. हमारे विचारो और व्यव्हार से इनमे परिवर्तन आता रहता है.
जब हम किसी का पैर छूते है तो यह दिखाता है की हम अपने अहम् से परे होकर किसी की गुरुता , सम्मान और आदर की भावना से चरण स्पर्श कर रहे है. किसी के समक्ष झुकना समर्पण और विनीत भाव को को दर्शाता है. जिसका हम पैर छूते है इस क्रिया से उसपर तुरंत मनोवैज्ञानिक असर (Psychological effect) पड़ता है, और उसके ह्रदय से प्रेम, आशीर्वाद और संवेदना, सहानुभूति की भावनाएं निकलती है जो उसकी आभामंडल (Aura) में परिवर्तन लाती है
पैर छूने से हम उस व्यक्ति के आभामंडल से अपने आभामंडल में इन ऊर्जाओं को ग्रहण करते है जो की हमारे मनो-मष्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव ( Positive effect ) डालती है और हमारे आभामंडल (Aura) को अधिक ऊर्जावान बनाती है, हमारी नकारात्मक सोच और विचारों से हमें मुक्ति दिलाती है. बड़े लोगों के दिए हुए आशीर्वाद हमारे सौभाग्य में सहायक बनती है.
सही ढंग से अच्छी भावना के साथ पैर छूना चाहिए जिस से की वह व्यक्ति आपके सम्मान और आदर को अनुभव कर सके और उसके मन में आपके प्रति प्रेम और आशीर्वाद की भावनाएं उत्पन्न हो. इसलिए हमें निःसंकोच बड़ो के पैर छूना चाहिए और उनके आशीर्वाद ( Blessings )को ग्रहण करना चाहिए.


हिन्दू शादी के सात फेरे और सात वचन और उनका अर्थ जानिए




हिन्दू शादी में सात वचन और सात फेरे का अर्थ क्या है :
विवाह में वर-वधु सातों फेरे या पद सात वचनों के साथ लेते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवन भर साथ निभाने का वादा करते हैं. विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग (बांई ओर) में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है. हम आपको मूल संस्कृत मंत्र वचन तथा उनका सरल हिंदी अनुवाद बताने जा रहे हैं.
भारतीय विवाह परंपरा यह मानती है कि यह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता. पंडित की उपस्थिति में मंत्रों के उच्चारण के साथ अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो व्यक्ति तन, मन तथा आत्मा के साथ एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं.
हिन्दू धर्म में विवाह का अर्थ और महत्व :
भारत में सनातनी और वैदिक संस्कृति के अनुसार सोलह संस्कारों का बड़ा महत्व है और विवाह संस्कार उन्हीं में से एक है. विवाह का शाब्दिक अर्थ है वि + वाह = विवाह , अर्थात उत्तरदायित्व का वहन करना या जिम्मेदारी उठाना. पाणिग्रहण संस्कार को ही सामान्यतः विवाह के नाम से जाना जाता है.
हमारे यहां पति और पत्नी के बीच के संबंध को शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध माना गया है. विवाह की रस्मों में सात फेरों का भी एक प्रचलन है जिसके बाद ही विवाह संपूर्ण माना जाता है. सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर घूमकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है.
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!

यहाँ कन्या वर से पहला वचन मांग रही है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा करने जाएं तो मुझे भी अपने संग लेकर जाइएगा. यदि आप कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धार्मिक कार्य करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग (बांई ओर) में बिठाएं. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
द्वितीय वचन
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
दूसरे वचन में कन्या वर से मांग रही है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा परिवार की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
तृतीय वचन
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!

तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे. यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
 
चतुर्थ वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!

चौथे वचन में वधू ये कहती है कि अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है. यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
पंचम वचन
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!

पांचवें वचन में कन्या कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाह आदि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी राय लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
षष्ठम वचन
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!

छठवें वचन में कन्या कहती है कि यदि मैं कभी अपनी सहेलियों या अन्य महिलाओं के साथ बैठी रहूँ तो आप सामने किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे. इसी प्रकार यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार की बुराइयों अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.
सप्तम वचन
परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!

आखिरी या सातवें वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को मां समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ.


1.5.17

Anmol Vachan :अनमोल वचन

Anmol Vachan – अनमोल वचन पढ़ने से हमारे दिन की शुरवात अच्छी होती है। अनमोल वचन – हमारे मन को शुद्ध करते है। और सकारात्मक सोचने की शक्ति को बढ़ते है।
1) दान देना ही आमदमी का एकमात्र व्दार है। – स्वामी रामतीर्थ
2) यदि किसी युवती के दोष जानना हों, तो उसकी सखियों में उसकी प्रशंसा करो। – बेंजामिन फ्रैंकलिन
3) पैसा आपका सेवक है। यदि आप उनका उपयोग जानते हैं; वह आपका स्वामी है। यदि आप उसका उपयोग नहीं जानते। – होरेस
4) दुसरे के दोष पर ध्यान देते समय हम स्वयं बहुत भले बन जाते हैं। परंतु जब हम अपने दोषों पर ध्यान देंगे। तो अपने आपको कुटिल और कामी पाएँगे। – महात्मा गांधी
5) जब तक तुममें दूसरों के दोष देखने की आदत मौजूद है। तब तक तुम्हारे लिए ईश्वर का साक्षात्कार करना अत्यन्त कठिन है। – रामतीर्थ


6) ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है। – युरिपिडिज
7) मुँह के सामने मीठी बातें करने और पीठ पीछे छुरी चलानेवाले मित्र को दुधमुँहे विषभरे घड़े की तरह छोड़ दो। – हितोपदेश
8) सच्चे मित्र को दोनों हाथों से पकड़कर रखो। – नाइजिरियन कहावत
9) उस काम को, जिसे तुम दुसरे व्यक्ति में बुरा समझते हो, स्वयं त्याग दो परंतु दूसरों पर दोष मत लगाओ। – स्वामी रामतीर्थ
10) जब जेब में पैसे होते हैं, तो तुम बुद्धिमान और सुंदर लगते हो तथा उस समय तुम अच्छा गाते भी हो। – स्वीडिश कहावत

11) धर्म तो मानव-समाज के लिए अफीम है। – कार्ल मार्स्क
12) जो चीज विकार को मिटा सके। राग-व्देष को कम कर सके। जिस चीज के उपयोग से मन सूली पर चढ़ते समय भी सत्य पर डटा रहे वही धर्म की शिक्षा है। – महात्मा गांधी
13) संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है। – प्लाट्स
14) जिसे धीरज है और जो मेहनत से नहीं घबराता, कामयाबी उसकी दासी है। – स्वामी दयानन्द सरस्वती
 

15) अपने जीवन का ध्येय बनाओ और इसके बाद अपनी सारी शारीरिक और मानसिक शक्ति, जो भगवान ने तुम्हें दी है, उसमें लगा दो। – कार्लाइल
16) महान ध्येय महान मस्तिष्क की जननी है। – इमन्स
17) चाहे धैर्य थकी घोड़ी हो, परंतु फिर भी वह धीरे-धीरे चलेगी अवश्य। – विलियम शेक्सपीयर
18) जो अपने लक्ष्य के प्रति पागल हो गया है, उसे ही प्रकाश का दर्शन होता है। जो थोड़ा इधर, थोड़ा उधर हाथ मारते हैं, वे कोई लक्ष्य पूर्ण नहीं कर पाते। वे कुछ क्षणों के लिए बड़ा जोश दिखाते है; किन्तु वह शीघ्र ठंडा हो जाता है। – स्वामी विवेकानंद
19) हमारा ध्येय सत्य होना चाहिए, न कि सुख। – सुकरात
20) मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है। इसलिए मनुष्य को इस पापरुपिनी निराशा को समूल हटाकर आशावादी बनना चाहिए। – हितोपदेश
 
21) कष्ट और क्षति सहने के पश्चात् मनुष्य अधिक विनम्र और ज्ञानी हो जाता है। – फ्रैंकलिन
22) उड़ने की अपेक्षा जब हम झुकते हैं तब विवेक के ज्यादा नजदीक होते हैं।- वर्ड्सवर्थ
23) अभिमान की अपेक्षा नम्रता से अधिक लाभ होता है। – भगवान् गौतम बुद्ध
24) निराशा आशा के पीछे-पीछे चलती है। – एल. ई लैमडन
25) निराशा निर्बलता का चिह्न है। – स्वामी रामतीर्थ
26) जिस तरह पानी को कोई जल, कोई आब, कोई वाटर कहते हैं, उसी तरह एक ही सच्चिदानंद परमेश्वर को कोई अल्लाह, कोई हरि, कोई गॉड कहकर पुकारते हैं। – रामकृष्ण परमहंस
27) उस अल्लाह की स्तुति करनी चाहिए, जो समस्त संसार का चालक, दयालु, उदार पर अंतिम निर्णय के समय न्यायाधीश भी है। – कुरान
28) ईश्वर की कोई बौद्धिक परिभाषा नहीं दी जा सकती। हाँ, उसका आत्मा के सहारे अनुभव किया जा सकता है। – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
29) पाप एक प्रकार का अँधेरा है, जो ज्ञान का प्रकाश होते ही मिट जाता है। – कालिदास
30) पुस्तकें मन के लिए साबुन का कार्य करती हैं। – महात्मा गांधी


27.4.17

जनसंख्या विस्फ़ोट और धार्मिक रूढियों मे फ़ँसा इन्सान

“भोजन तो जुटाया जा सकेगा क्योंकि अभी भोजन के स्त्रोत बहुत हैं और आगे भी रहेगें लेकिन आदमी की भीड बढने के साथ क्या आदमी की आत्मा खो तो नहीं जायेगी। पहली बात ध्यान मे रखें कि जीवन एक अवकाश चाहता है। जंगल मे जानवर मुक्त है, मीलों के दायरे में घूमता है, अगर पचास बन्दरों को एक कमरे में बन्द कर दें तो उनका पागल होना शुरु हो जायेगा। प्रत्येक बन्दर को एक लिविग स्पेस चाहिये,खुली जगह चाहिये , जहां वह जी सके। बढती हुई भीड एक-एक व्यक्ति पर चारों तरफ़ से अनजाना दबाब डाल रही है, भले ही हम उन दबाबों को देख न पायें। अगर यह भीड बढती चली जाती है तो मनुष्य के विक्षिप्त (neurotic) हो जाने का डर है।” ओशो
   डा साहब, पिछले दिनों जब मै घर गया था तो मेरे घर वालों ने मेरा निकाह कर दिया , अब मेरी आलमियत पूरी हो चुकी है और मै अपने वतन लौट रहा हूँ, मै आप से कुछ सलाह चाहता हूं।” मैने पहले सोचा कि सेक्स से संबन्धित कुछ सलाह माँगने आया होगा। वह बोला , “ मै अभी परिवार को बढाना नहीं चाहता और आगे भी परिवार को छोटा रखना चाहता हूँ,, मुझे बच्चों पर नियन्त्रण रखने के उपाय बतायें।“ मै बहुत हैरान हुआ क्योंकि वह जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा था , उसकी पहुँच मुस्लिम समाज मे बहुत है और वह ऐसी सोच बिल्कुल नहीं रखते। गर्भ निरोधक उपाय बताने के बाद मैने उससे कहा, “ फ़रीद , तुम अपनी इस सोच को अपने तक ही सीमित मत रखना और अगर यही सोच अपने समाज मे दे सको तब शायद अपने समाज मे एक नई पहल कर सकोगे।” मुझे नहीं मालूम कि उसने आगे अपनी इस सोच को कितना बढाया लेकिन बाद के कई सालों मे मुझे कई नये मौलाना मिले जो मुझसे अक्सर गर्भ निरोधक उपायों की जानकारी माँगने आते रहते। क्या मुस्लिम समाज में यह एक नई सोच है या समय का बदलाव, यह तो समय ही बतायेगा।
क्या परिवार नियोजन सिर्फ़ आर्थिक मामला है या धार्मिक मामला। इस लेख में कुछ ऐसे ही विचारणीय प्रश्नों को उठायेगें और उनका सही हल भी ढूँढने की कोशिश करेगें।
आज अगर आप संगरहालयों में रखे हुये कई विलुप्त जानवरों के अस्थि- पजरों को देखकर सोच रहे हों कि यह वक्त के साथ विलुप्त हो गये तो यह शायद आप की भूळ होगी। वे सामप्त हुये तो अपनी संतति के बढने के कारण्। वे इतना बढे कि उनके जीने के लिये जगह , भोजन और पानी की किल्लत हो गयी। डारविन का नियम है , “struggle for exixtence” लेकिन जीने के लिये संघर्ष भी एक दूसरे से कब तक करेगें । प्रकृति के साथ यह खेल लम्बे समय तक चल न पाया, इसलिये उनको सामूल नष्ट होना पडा।
क्या मनुष्य जाति के साथ भी ऐसी ही परिस्थिति आ सकती है? अभी तक नहीं आयी वह इसलिये कि प्रकृति ने जन्म और मृत्यु मे एक संतुलन बना रखा था। अगर पहले के दिनों को याद करे जब एक घर मे दस बच्चे होते थे , उनमे से 8 मरते थे और 2 ही बचते थे । आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। मेडिकल सांइस ने जन्म और मृत्यु के बीच का अंतर बहुत कम कर दिया है। अब 1 मरता है और 9 बचते हैं। लेकिन वक्त के साथ हमने मृत्यु के बहुत से दरवाजे तो बन्द कर दिये लेकिन जन्म के सारे दरवाजे खुले रखे। उसका परिणाम सब के सामने है, बेताहाशा बढती हुयी जनसंख्या, सारा संतुलन ही बिगड गया।
क्या इन्सानों के लिये परिवार नियोजन केवल आर्थिक मामला है, शायद नहीं। ‘ सम्भोग से सम्माधि की ओर’ मे ओशो ने इस पक्ष की व्याख्या कुछ इस तरह की:हाँ, अलबत्ता , परिवार नियोजन का मामला धार्मिक अवश्य बन गया है। किसी एक पक्ष पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा। अलग-2 पक्ष हैं और अलग-2 तर्क वितर्क हैं। एक नजरिया लेते हैं उन पक्षों का-
1-एक पक्ष कहता है कि परिवार नियोजन द्वारा अपने बच्चों की संख्या कम करना धर्म के खिलाफ़ है क्योंकि बच्चे तो ऊपर वाले की देन हैं और खिलाने वाला भी खुदा है। देने वाला वह, करने वाला वह, कराने वाला वह, फ़िर हम क्यों रोक डालें?
2-दूसरा पक्ष यह कहता है कि परिवार नियोजन जैसा अभी चल रहा है उसमें हम देखते हैं कि हिन्दू ही उसका प्रयोग कर रहे हैं, और बाकी धर्म के लोग ईसाई, मुसलिम इसका उपयोग कम कर रहे हैं। तो हो सकता है कि आने वाले कल में इनकी संख्या इतनी बढ जाये कि दूसरा पाकिस्तान मांग लें या पाकिस्तान या चीन जिनकी जनसंख्या अधिक है, वे ताकतवर हो जायें और हम पर हमला करने की चेष्टा करे।
धार्मिक पक्ष के पहले खंड को देखते हैं।
1- सब धर्मों के धर्म गुरूओ ने सब बातें ईश्वर ? पर थोप दीं कि यह सब उसकी मर्जी है और ईश्वर कभी यह जानने नहीं आता कि उसकी मर्जी क्या है। ईश्वर की इच्छा पर हम अपनी इच्छा थोपते हैं । यह तो इन्सान की बुद्दिमता पर निर्भर है कि वह सुख से रहे या दुख से रहे। जब एक बाप अपने 2-3 बच्चों के बाद भी बच्चे पैदा कर रहा है तो वह उन्हें ऐसी दुनिया मे धक्का दे रहा है जहाँ वह सिर्फ़ गरीबी ही बांट सकेगा। आज हमको यह सोचना ही होगा कि जो हम कर रहे हैं , उससे हर आदमी को जीवन की सुविधा कभी नहीं मिल सकती। हमारे धर्म गुरु समझाते हैं कि यह ईश्वर का विरोध है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाय कि ईश्वर चाहता है कि लोग दीन और फ़टेहाल रहें। लेकिन अगर यही ईश्वर की चाह है तो ऐसे ईश्वर को भी इंकार करना पडेगा।
एक बात और अगर खुदा बच्चे पैदा कर रहा है तो बच्चों को रोकने की कल्पना कौन पैदा कर रहा है? अगर एक चिकित्सक के भीतर से ईश्वर बच्चे की जान को बचा रहा है तो चिकित्सक के भीतर से उन बच्चों को आने से रोक भी रहा है। अगर सभी कुछ उस खुदा का है तो यह परिवार नियोजन का ख्याल भी उस खुदा का ही है। परिवार नियोजन का सीधा सा अर्थ है कि पृथ्वी कितने लोगों को सुख दे सकती है। उससे ज्यादा लोगों को पृथ्वी पर खडे करना , अपने हाथो से नरक बनाना है। दूसरी बात कि ईश्वर कोई स्पाईवेएर नहीं है जो इन्सान की रतिक्रियाओं पर नजर रखे कि वह किसी साधनों का प्रयोग तो नही कर रहा ।
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जो समाज जितना समृद्द है , उसकी जनसंख्या उतनी ही कम है। अपने देश, मुस्लिम देशों और पश्चिम देशों मे यह अन्तर साफ़ दिख सकता है। बढती हुई जनसंख्या मे सबसे बुरी मार बेचारे गरीब आदमी की हुई, वह इसलिये गरीब नहीं है क्योंकि उसकी आय के साधन कम है, बलिक इसलिये कि उसकी बुद्दि को भ्रष्ट करने मे उसके तथाकथित धर्मगुरुओं का साथ मिला । एक समृद्द इनसान अपने सेक्स की उर्जा को दूसरे कामों मे लगा देता है -मसलन संगीत, साहित्य, खेल, लेखन आदि। लेकिन एक गरीब के पास सेक्स ही उसके मनोरजंन का साधन मात्र रह जाता है। भारत में अगर अधिक बच्चों का अनुपात देखें तो इस वर्ग मे अधिक मिलता है, और फ़िर वह हिन्दू हो या मुस्लिम , इससे फ़र्क नही पडता। मुस्लिमों में अधिक इसलिये भी है वह अपनी बुद्दि पर कम और अपने धर्मगुरुओं की बुद्दि पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। हिन्दू समाज मे वक्त के साथ उनके धर्मगुरुओं का प्रभाव कम होता गया जिसकी वजह से इन लोगों की पकड अब इतनी मजबूत नहीं दिखती।
2-जब हम दूसरे पक्ष के बारे मे बात करें कि क्या परिवार नियोजन को किसी की स्वेच्छा पर छोडा जाना उचित है? यह तो ऐसा ही सवाल है जैसे कि हम हत्या को या डाके को स्वेच्छा पर छोड दें कि जिसे करनी हो करे। अत: परिवार नियोजन को अनिवार्य, कम्पलसरी कर देना ही उचित है। और जब हम इस जीवंत सवाल को अनिवार्य कर देगें तो यह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का सवाल नहीं रह जायेगा। आज के हालातों पर जरा नजर दौडायें तो इन सबके धर्मगुरु समझा रहे हैं कि तुम कम हो जाओगे या फ़लाने जयादा हो जायेगें। और हकीकत यह है कि ये सब जो सोच रहे हैं , इनके सोचने की वजह से भी अनिवार्य परिवार नियोजन का विचार समाप्त हो रहा है।.
एक और सवाल कि ऐसा हो सकता है कि अगर मुस्लिमों की आबादी इतनी बढ जाय कि वह दूसरे पाकिस्तान की माँग करने लगें। आज के वैज्ञानिक युग में जनसंख्या का कम होना, शक्ति का कम होना नहीं है। बल्कि जिन मुल्कों की जनसंख्या जितनी अधिक है वह टैकनोलोजी दृष्टिकोण से उतने ही कमजोर है। क्योंकि इतनी बडी जनसंख्या के पालन पोषण मे इनकी अतिरिक्त सम्पति बचने वाली नही है। वह जमाना गया ,जब आदमी ताकतवर था, अब युग दिमाग और मशीन का है। और मशीन उसी देश के पास हो सकेगी, जिस देश के पास संपन्नता होगी और संपन्नता उसी देश के अधिक पास होगी जिस देश के पास प्राकृतिक साधन ज्यादा और जनसंख्या कम होगी।
दूसरी बात यह बात समझने जैसी है कि संख्या कम होने से उतना बडा दुर्माग्य नहीं टूटेगा, जितना बडा दुर्भाग्य संख्या के बढ जाने से बिना किसी हमले के टूट जायेगा। आज के दौर में युद्द इतना बडा खतरा नहीं है जितना कि जनसंख्या विस्फ़ोट का है।
आज हर धर्मावलंबी को यह निर्णय लेना है कि सवाल उनकी गिनती का है या देश का। और अगर गिनती का है तो मुल्क का मर जाना निशचित है। और अगर यह साहसिक निर्णय देश का है तो किसी को तो लेना ही है। जो समाज इस निर्णय को लेगा , वह संपन्न हो जायेगा। मुसलमानों मे उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ ,अधिक शिक्षित होगें, ज्यादा अच्छी तरह जीवन निर्वाह करेगें। वे दूसरे समाजों और खासकर अपने ही समाज मे जिनकी संख्या कीडे-मकोडों की तरह है, उनको छोडकर आगे बढ जायेगें। और, इसका परिणाम यह भी होगा कि दूसरे समाजों और उनके ही समुदायों मे भी स्पर्धा पैदा होगी इस ख्याल से कि वे गलती कर रहे हैं।
यह सब तब ही संभव है जब हमारी सरकारें वोट-बैंक की राजनीति से परे हट कर परिवार नियोजन को स्वेच्छित नहीं , बल्कि अनिवार्य बनायेंगी ।

आत्मविश्वास बढ़ाने वाले चमत्कारी उपाय/Miraculous measures to increase confidence


आत्मविश्वास बढ़ाने के वास्तु शास्त्र से सम्बंधित उपाय :* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप हमेशा पूर्व दिशा की तरफ मुहं करके ही खाना खाए.

* अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए आप सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य पर कम से कम 5 मिनट तक ध्यान करे.
*आप रोज़ सुबह जल्दी उठ कर उगते सूर्य के सामने सूर्य के बारह नामो को जपे, इससे सूर्य देव खुश होते है और आप पर अपनी कृपा दृष्टी बनाये रखते है.
* आप रोज़ सुबह गायत्री मंत्र का भी उच्चारण करे इससे आपका मन शांत होगा और धीरे धीरे आपका आत्मविश्वास भी बढ़ने लगेगा
* आप अपने दाये हाथ की अंगुली में सोने से बनी अंगूठी पहने.
* आप सूरजमुखी के फूल को पूर्व दिशा में रखे, इससे आपके आत्मविश्वास मे बढ़ोतरी होती है.
आत्मविश्वास बढ़ने के मनोवैज्ञानिक उपाय :
आप अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए वास्तु शास्त्र के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक उपायों को भी अपना सकते है क्योकि अगर आपका मन ठीक होता है तो आपके चेहरे पर चमक आती है और आप अपने जीवन की हर कठिन चुनोतियो को भी हँसते हुए पार कर लेते हो. अपने आत्मविश्वास को बढ़ने के लिए आप इन मनोवैज्ञानिक उपायों को अपना सकते है –
· आपको हर बात को उसके उचित अर्थ के साथ देखना चाहिए और उसके यथार्थ को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
· साथ ही आपको अपनी क्षमताओ पर भी पूर्ण विश्वास होना चाहिए.
· अगर आपके जीवन में कुछ उतार चढाव की परिस्तिथियाँ आती है तो आपको उस समय संयम से काम लेना चाहिए और हमेशा आशावादी रहना चाहिए.
आपको अपने आपको इस तरह तैयार करना चाहिए कि आप अपने कार्यो में असफलता पाने के बाद भी उम्मीद न छोड़ो और पुनः प्रयास करने लगो.
· आपको अपने निर्णयों पर भी पूरा भरोसा होना चाहिए, नाकि आप किसी की बातो को सुन कर अपने निर्णय को बदल दो.
· अगर आपको लगता है कि आप आपको दिए गए कार्यो को कर सकते हो तो आप खुद ही पहल करके उन कार्यो की जिम्मेदारियों को ले और उनमे सफलता प्राप्त करके दिखाए.
· आप किसी भी चीज़ को अत्यधिक निजी रूप से और अत्यधिक गंभीरता से न ले क्योकि किसी भी चीज़ की अति अच्छी नही होती.
· आप अपने बारे में अच्छा सोचे और साथ ही अपने साथियो के बारे में भी अच्छा सोचे और उनकी मदद करके उनको खुशियाँ दें.
· एक आत्मविश्वास से भरा इंसान हमेशा जिज्ञासा से भरा होता है तो आप भी अपने अंदर की जिज्ञासा को बढाइये.
· आप कभी भी अपनी सफलताओ पर घमंड ना करे बल्कि अपनी सफलताओ से प्रेरित होकर अपने भविष्य के लिए और लक्ष्य बनाये.